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आनन्द मठ/2.1

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आनन्द मठ  (1922) 
द्वारा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, अनुवाद ईश्वरीप्रसाद शर्मा

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पहला परिच्छेद

बड़ी ही छोटी उमरमें शान्तिकी मां मर गयी थी। जिन अवस्थाओंमें शान्तिका चरित्र-गठन हुआ था, उनमें एक प्रधान है। उसके पिता पण्डित और अध्यापक थे। उनके घर में और कोई स्त्री नहीं थी।

शान्तिके पिता जब पाठशालामें पढ़ाने जाते, तो शान्ति भी उन्हींके पास बैठी रहती थी। पाठशालामें बहुतसे लड़के रहते थे। जब पाठका समय न रहता, शान्ति उन लोगोंके साथ खेलती कूदती थी, किसीके कन्धेपर चढ़ती तो किसीकी गोदमें बैठ जाती। वे लोग भी शान्तिको बहुत प्यार करते थे। इस प्रकार लड़कपनसे ही पुरुषोंके संसर्गमें रहनेका पहला फल तो यह हुआ, कि शान्तिने स्त्रियोंकी तरह कपड़ा पहनना नहीं सीखा अथवा यों कहिये, कि सीखकर भी भूल गयी। वह ठीक पुरुषोंकी तरह लांग कसने लगी। यदि कभी कोई उसे लड़कियों की तरह कपड़ा पहना देता, तो वह उसे झट खोल देती और फिर मर्दानी धोती पहन लेती थी। पाठशालाके विद्यार्थी सिरके बाल नहीं बाँधते, इसीलिये वह भी बालोंक खोले रहती थी। विद्यार्थी लोग उसके बालोंको लकड़ीकी कंघीसे संवार देते थे। उसके वे घूघरवाले वाल उसकी पीठ, कन्धों, भुजाओं और गालोंपर लहराते रहते थे। छात्रगण ललाटमें चन्दन लगाकर बीचमें लाल बिन्दी लगाते थे। इसलिये शान्ति भी वैसा ही करती थी। उसे कोई यज्ञोपवीत पहननेको नहीं देता था, इसलिये वह बहुत रोया करती थी। परन्तु संन्ध्यापूजनके समय छात्रोंके पास बैठकर वह उनका अनुकरण जरूर करती थी। छात्रगण अध्यापकजीके न रहनेपर अश्लील संस्कृतकी [ ७५ ] थोड़ीसी बधार देकर कुछ शृङ्गाररसकी बातें छेड़ दिया करते थे। शान्ति भी तोतेकी तरह उन्हीं बातोंको कहने लगती थी; पर तोतेहीकी तरह वह भी उन बातोंका अर्थ नहीं समझती थी।

दूसरा फल यह हुआ, कि शान्ति जब कुछ बड़ी हुई, तब विद्यार्थीलोग जो कुछ पढ़ते थे, उसे पढ़ने लगती थी। व्याकरण वह भले हो एक अक्षर न जानती हो, तोभी भट्टि, रघुवंश, कुमार, नैषध आदिके श्लोकोंको व्याख्या सहित याद करने लगी यह सब देख सुनकर, शान्ति के पिता भाग्यपर विश्वास कर उसे मुग्धबोध पढ़ाने लगे शान्ति बहुत जल्दी जल्दी पढ़ने लगी। यह देख अध्यापकजीको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने व्याकरणके साथ साथ साहित्यके भी दो-एक ग्रन्थ पढ़ाये। इसके बाद ही सारा मामला उलट-पुलट गया। उसके पिताका परलोकवास हो गया।

शान्ति निराश्रय हो गयी, पाठशाला टूट गयी। छात्र अपने अपने घर चले गये। पर उनमेंसे कुछ उसे बहुत प्यार करते थे, इसलिये उनमें शान्तिको छोड़कर जाते नहीं बना। उनमें से एक दया करके उसे अपने घर ले गये। यही आगे चलकर सन्तान सम्प्रदायमें जा मिले और जीवानन्द कहलाने लगे। सदा जीवानन्द ही कहा करेंगे।

उस समय जीवानन्दके माता-पिता जीवित थे।

जीवानन्दने उनसे उस कन्याका सारा हाल कह सुनाया। मातापिताने पूछा “इस समय इस परायी लड़कीका बोझा कौन अपने सिरपर लेगा?"

जीवानन्दने कहा,-"मैं इसे ले आया हूं, मैं ही इसका भार उठाऊंगा।

मां-बापने कहा,-"अच्छा, यही सही।"

जीवानन्द उस समयतक कुंवारे थे। शान्ति भी व्याह करने [ ७६ ] योग्य हो गयी थी अतएव जीवानन्दने उसके साथ अपना विवाह कर लिया।

विवाहके बाद सब लोग हाथ मल मलकर पछताने लगे। सभी समझ गये कि यह काम अच्छा नहीं हुआ। शान्तिने किसी भी तरह स्त्रियोंकेसे कपड़े नहीं पहने, सिरके बाल नहीं बाँधे। वह घरमें रहकर पड़ोसके बालकोंके साथ खेला करतीथी। जीवानन्दके घरके पास ही जंगल था। शान्ति जंगल में जा मोर, हरिण और दुर्लभ फल और फूलोंको खोजा करती। सास ससुरने पहले तो मना किया पीछे डाँट-डपट की, इसके बाद पीटा और अन्तमें उसे घरमें बन्द करके सांकल चढ़ा दी। इस प्रकारके अत्याचारसे शान्ति ऊब उठी। एक दिन दरवाजा खुला था। वह बिना किसीसे कुछ कहे-सुने चुपचाप घरसे बाहर हो गयी।

जंगलके भीतर जा उसने चुन-चुनकर फूल तोड़े और उन्हींके रसमें कपड़े रंगकर उसने नवजवान संन्यासीका रूप बनाया। उन दिनों सारे बंगालमें दलके दल संन्यासी फिरा करते थे। शान्ति भीख मांगती खाती हुई जगन्नाथजीके रास्तेमें जा पहुँची। थोड़े ही दिन बाद वहां संन्यासियोंका एक दल आ पहुंचा। शान्ति भी उसी दल में मिल गयी।

उस समयके संन्यासी आजकलके संन्यासियोंकी तरह नहीं थे। वे सुशिक्षित, बलवान और अनेक गुणोंसे युक्त होते थे और दल बाँधकर चलते थे। वे एक प्रकारसे पक्के राजविद्रोही थे। सरकारी खजाना लूट खाना उनका काम था। वे हृष्टपुष्ट बालकोंको चुरा ले जाते थे और उन्हें खूब पढ़ा लिखाकर अपने दलमें मिला लेते थे। इससे लोग उन्हें लड़िक धरवा" कहा करते थे

शान्ति बालक संन्यासीके रूपमें ऐसेहो एक दलमें जा मिली। पहले तो वे लोग उसके कोमल शरीरको देखकर उसे अपने दलमें [ ७७ ] मिलाना नहीं चाहते थे, पर पीछे उसकी बुद्धि की प्रखरता, चतुरता और कार्यदक्षता देख, उन्होंने उसे बड़े आदरसे दलमें मिला लिया। शान्ति उनके साथ रहकर कसरत करती और हथियार चलाना सीखती थी, इसीसे वह धीरे धीरे बड़ी मिहनती हो गयी। उनके साथ रहकर उसने बहुतसे देश देखे, बहुतसी लड़ाइयां देखीं। वह हथियार चलाने में भी निपुण हो गयी।

क्रमशः उसमें जवानीके चिह्न दिखायी देने लगे। बहुतसे संन्यासियोंको यह मालूम हो गया, कि यह तो वेश बदले कोई स्त्री है, पर संन्यासी लोग आमतौरसे जितेन्द्रिय हुआ करते हैं। इसीसे किसीने उससे कुछ नहीं कहा।

संन्यासियोंमें बहुतसे पण्डित भी थे। शांतिको संस्कृतमें व्युत्पन्न देखकर एक पण्डित संन्यासी उसे पढ़ाने लगे।

हम पहले लिख आये हैं कि आमतौरसे संन्यासी लेग जितेन्द्रिय हुआ करते हैं; पर सभी ऐसे नहीं होते। ये पण्डितजी भी वैसे नहीं थे अथवा हो सकता है, कि वे शान्तिको नयी जवानीके उमंगसे खिले लावण्यको देखकर मुग्ध हो गये हों और इन्द्रियां उन्हें सताने लगी हों। उन्होंने अपनी शिष्याको श्रृंगाररसके काव्य पढ़ाने आरम्भ किये और जो व्याख्या सुनाने योग्य न भी होती, उसे भी सुनाने लगे। उससे शान्तिकी कुछ हानि तो नहीं हुई भलाई हुई। अबतक शान्ति यह नहीं जानती थी, कि लजा किसे कहते हैं? अब स्त्री स्वभाव-सुलभ लज्जा आपही आ उपस्थित हुई। पुरुषचरित्रके ऊपर निर्मल स्त्रीचरित्रकी अपूर्व आभा शान्ति के गुणोंको और भी चमकाने लगी। शान्तिने पढ़ना छोड़ दिया।

व्याघ्र जिस प्रकार हरिणीके पीछे दौड़ पड़ता है, उसी प्रकार शान्ति के अध्यापक भी उसके पोछे दौड़ने लगे। शान्तिने ब्यायाम आदिके द्वारा पुरुषोंसे भी अधिक बल संचय कर लिया था, इसलिये वह अध्यापकजीके पास आते ही थप्पड़ों और [ ७८ ] घूसोंसे उनकी पूजा करने लगती थी, वे थप्पड़ और घूसे भी हलके नहीं होते थे खब तौल तौलकर लगाये जाते थे। एक दिन संन्यासीजीने शान्तिको अकेले में पाकर जबरदस्ती उसका हाथ पकड़ लिया। शान्ति किसी तरह अपना हाथ न छुड़ा सको, किन्तु संन्यासीके दुर्भाग्यसे वह हाथ शान्तिका बायाँ हाथ था, इसलिये उसने दाहिने हाथसे संन्यासीके सिरमें इस जोरका घुसा मारा कि वे मूर्छित हो गिर पड़े। उसी दिन शान्ति सन्यासी दल छोड़कर भाग गयी।

शान्ति बड़ी निडर थी। वह अकेली हो अपने देशकी ओर भाग चली। साहस और बाहुबलके प्रभावले वह निर्विघ्न रही। भीख मांगती और जंगली फलोंसे उदर-पोषण करती; मारपीट कर लोगोंको परास्त करती, वह ससुरालमें आ पहुंची। यहां आकर उसने देखा, कि ससुर स्वर्गवासी हो गये हैं। उसकी सासने जातिच्युत होनेके डरसे उसे अपने घरमें न रखा। शान्ति घरसे बाहर चली गयी।

जीवानन्द घरपर ही थे। वे भी शान्तिके पीछे लगे। उन्होंने बीच रास्तेमें उसे जा पकड़ा और उससे पूछा,-"तुम क्यों घरसे भाग गयी थी? इतने दिन कहां थी?"

इसके उत्तरमें शान्तिने सब कुछ सचसच सुना दिया। जीवानन्दको सच झूठकी अच्छी पहचान थी। उन्होंने शान्तिकी बातोंका विश्वास कर लिया।

अप्सराओंकी सी बांकी भौंहोंवाली तिरछी चितवनकी ज्योति लेकर जो 'सम्मोहन' नामका तीर बड़े यत्नसे बनाया गया है, उसे कामदेव विवाहित दम्पतिके लिये व्यर्थ ही खर्च करना नहीं चाहते। अंगरेज़ पूनोंकी रातमें भी सड़कोंपर गैस बत्ती जलाते हैं, बंगाली जिसके सिरमें तेल लगा होता है, उसीके सिरमें और तेल लगाते हैं मनुष्योंकी बात तो दर किनार, चन्द्रदेव सूर्यदेवके बाद हो आकाशमें उदित हुआ करते [ ७९ ] हैं, इन्द्र समुद्र में ही वृष्टि करता है, जिस सन्दूकमें रुपये भरे होते हैं, कुबेर उसीमें और रुपये डाल देते हैं। यमराज जिसके सब किसीको चौपट कर चुके होते है, उसीके बाकी बचे हुए लोगोंको भी उठा ले जाते हैं। केवल कामदेव ही ऐसी निर्बुद्धिताका काम करते हुए नहीं दिखाई पड़ते। जहाँ गठजोड़ा बधा कि उन्होंने वहां परिश्रम करना छोड़ दिया। वहांका भार प्रजापतिको देकर वे ऐसी जगह चले जाते हैं, जहां वे किलीके हृदयका रक्त पान कर सकें। परन्तु आज शायद पुष्पधन्याको और कोई काम नहीं था, इसीसे उन्होंने दो पुष्प-वाणोंका अपव्यय कर डाला। एक तो आकर जीवानन्दके कलेजेमें चुभ और दूसरा शान्तिके हृदयमें। उसीने शान्तिको आज पहले पहल इस बातका बोध कराया, कि उसका हृदय स्त्रीका हो हृदय है-बड़ी ही कोमल वस्तु है। नवप्रेषके प्रथम जल कणोंसे सींची हुई फलकी कलीकी तरह शान्ति एकाएक खिल गयी और आनन्दभरी आंखोंसे जीवानन्दके मुखकी ओर देखने लगी।

जीवानन्दने कहा, "मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकता। देखो, जबतक मैं लौटकर नहीं आता। तबतक तुम यहीं खड़ी रहना।"

शान्तिने कहा, "तुम लौटकर आओगे तो?"

जीवानन्दने कुछ उत्तर न दे, बिना किसी ओर देखे, उसी राहकी एक तरफवाली नारियलकी कुञ्जने चुपकेसे शान्तिके होंठ चूम लिये। आज मानों अमृत ही पीनेको मिल गया; यही सोचते हुए वे घर चले आये।

जीवानन्द मांको समझा-बुझाकर उनसे बिदा मांग चले आये। भैरवीपुरमें उनकी बहन निमाईका व्याह हुआ था। बहनोईके साथ उनकी बड़ी गहरी दोस्ती थी। इसलिये वे शान्तिको लिए हुए वहीं आ धमके। उनके बहनोईने उन्हें थोड़ी सी जमीन दी जिसमें एक झोपड़ी बनाकर वे शान्तिके साथ सुखसे रहने लगे। स्वामीके साथ रहते रहते शान्तिके चरित्र में [ ८० ] जो मर्दानगी थी; वह धोरे धीरे लुप्त हो गयी। रमणीके रमणीय चरित्रका नित्य नया विकास होने लगा। पहले कुछ दिनों तक तो उसका जीवन एक सुख-स्वप्नकी तरह बीता, पर यकायक सुख-स्वप्न टूट गया। जीवानन्द सत्यानन्दके हाथमें पड़ गये और सन्तान धर्म ग्रहण कर शान्तिको छोड़कर चल दिये। इस परित्यागके बाद निमाईकी बदौलत जो प्रथम साक्षात् इन दोनों स्त्री-पुरुषका हुआ था, उसका हाल पिछले परिच्छेदमें वर्णन किया गया है।