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आनन्द मठ/2.4

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आनन्द मठ  (1922) 
द्वारा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, अनुवाद ईश्वरीप्रसाद शर्मा

[ ८७ ]

चौथा परिच्छेद

संध्या पूजा समाप्त कर सत्यान दने महेंद्रको बुलाकर कहा-"तुम्हारी स्त्री और कन्या जीवित हैं।"

महेंद्र-"कहां हैं, महाराज?"

सत्या०-"तुम मुझे महाराज क्यों कहते हो?"

महेंद्र-"सभी कहते हैं, इसीलिये मैं भी कहता हूं। मठके अधिकारी राजा कहलाते ही हैं। महाराज, मेरी कहां कहां है?"

सत्या-"इसका जवाब पानेके पहिले एक बातका ठीक-ठीक जवाब दो। क्या तुम संतानधर्म ग्रहण करना चाहते हो?

महेंद्र-"हाँ, पक्का इरादा कर चुका हूं।"

सत्या०-"तब यह न पूछो कि तुम्हारी स्त्री कन्या कहाँ हैं।

महेंद्र-"क्यों महाराज?"

सत्या०-"जो मनुष्य यह व्रत ग्रहण करता है, उसे स्त्री, [ ८८ ] पुत्र, कन्या और सगे-सम्बन्धियोंसे नाता तोड़ देना पड़ता है। स्त्री, पुत्र, कन्या आदिका मुंह देखना भी पाप है। उसके लिये प्रायश्चित्त करना पड़ता है। जबतक संतानोंका मनोरथ सिद्ध नहीं होता, तबतक तुम अपनी कन्याका मुंह न देखने पाओगे। इसलिये यदि तुमने संतानधर्म ग्रहण करनेका पक्का इरादा कर लिया हो, तो फिर कन्याका हाल न पूछो पूछकर ही क्या करोगे? क्योंकि तुम उसे देखने तो पाओगे ही नहीं।"

महेंद्र-"ऐसा कठिन नियम क्यों प्रभो?"

सत्या०-"संतानोंका का बड़ा ही कठिन है। जो सर्वत्यागी हैं, उसके सिवा दूसरेसे यह काम नहीं हो सकता। जिसका चित्त माथाके जालमें फसा है, वह डोरीमें बंधे हुए पतङ्गकी तरह पृथ्वी छोड़कर स्वर्ग नहीं जा सकता।"

महेंद्र-महाराज! आपकी बात अच्छी तरह मेरी समझमें नहीं आती। जो स्त्री-पुत्रका मुंह देखता है, वह क्या किसी गुरुतर कार्यका अधिकारी नहीं हो सकता?"

सत्या०-"पुत्र कलत्रको देखते ही हमलोग देवताकी बात भूल जाते हैं। संतानधर्मका यह नियम है कि जब भी प्रयोजन हो, तभी संतानगण प्राण त्याग दें। तुम यदि अपनी कन्याका मुंह देख लोगे, तो क्या उसे छोड़कर तुमसे प्राण दिये जायंगे?"

महेंद्र-"न देखनेपर ही क्या उसे भूल जाऊंगा?"

सत्यानंद-"अगर न भूल सकोगे तो यह व्रत मत ग्रहण करो।"

महेंद्र-"क्या सभी संतानोंने इसी तरह स्त्री पुत्रकी मोह-माया त्यागकर यह व्रत ग्रहण किया है? तब तो संतानोंको संख्या बहुत ही कम होगी?"

सत्या०-"संतान दो तरहके हैं एक दीक्षित दूसरे अदीक्षित। जो दीक्षित नहीं हैं, वे संन्यासी या भिखारी हैं। वे केवल युद्धके [ ८९ ] समय चले आते हैं और लूट के मालमें हिस्सा इनाम पाकर चले जाते हैं। जो दीक्षित हैं, वे सब कुछ छोड़े बैठे हैं। वे हो इस संप्रदायके कर्ता-धर्ता हैं। मैं तुम्हें अदीक्षित संतान नहीं बनाना चाहता; क्योंकि लड़ने-भिड़नेके लिये भाले-बर्छी और लाठी सोटेवाले तो बहुतसे हैं। दीक्षित हुए बिना तुम सम्प्रदायका कोई गुरुतर कार्य न कर सकोगे।"

महेंद्र-दीक्षा कैसी? मैं दीक्षा क्यों लूं? मैं तो पहले ही मंत्र ले चुका हूं।"

सत्या०-"वह मंत्र छोड़कर मुझसे फिर दूसरा मंत्र लेना होगा।"

महेंद्र--"वह मंत्र कैसे त्याग कर सकता हूं?"

सत्या०-"उसकी विधि मैं तुम्हें बतला दूंगा।"

महेन्द्र-नया मन्त्र क्यों लेना पड़ेगा?"

सत्या०-"संतान लोग वैष्णव हैं।"

महेंद्र-“यह तो मेरी समझमें नहीं आता। ये संतान लोग कैसे वैष्णव हैं? वैष्णवों के लिये तो अहिंसा ही बड़ा भारी सत्या अहिंसावाले चैतन्यदेवके अनुयायी वैष्णव हैं। नास्तिक बौद्धधर्मके अनुकरणपर जो अप्राकृतिक वैष्णवधर्म उत्पन्न हुआ था, यह उलीका लक्षण है; परन्तु सच्चे वैष्णवधर्मका लक्षण दुष्टोंका दमन और धरित्रीका उद्धार है, क्योंकि विष्णु ही संसारके पालनकर्ता हैं। उन्होंने दस बार शरीर धारणकर पृथ्वीका उद्धार किया है। केशी, हिरण्यकशिपु, मधुकैटभ, मुर, नरक आदि दैत्यों, रावणादि राक्षसों और कंस तथा शिशुपाल आदि राजाओंको उन्होंने ही युद्ध में मार गिराया था। वे हो जेता, जयदाता, पृथ्वीके उद्धरकर्ता और सन्तानोंके इष्ट देवता हैं। चैतन्यदेवका वैष्णवधर्म तो अधूरा है। वह सच्चा वैष्णवधर्म नहीं है। चैतन्यदेवके विष्णु प्रेममय हैं, किन्तु भगवान केवल प्रेममय ही नहीं अनन्त शक्तिमय भी हैं। धर्म है।” [ ९० ] चैतन्यके विष्णु केवल प्रेममय हैं सन्तानोंके विष्णु केवल शक्तिमय हैं। हम दोनों ही वैष्णव हैं, पर साधे ही वैष्णव हैं। बात समझमें आयी कि नहीं?"

महेन्द्र-“नहीं, यह तो बिलकुल नयी बातें मालूम पड़ती कासिमबाजारमें एक बार एक पादरी मिला था। वह भी कुछ ऐसी ही बातें कहता था। कहता था कि ईश्वर प्रेममय हैं, तुम लोग ईसामसीहको प्यार करो। आपकी बातें भी उसी कीसी मालुम पड़ती हैं।"

सत्या-"जैसी बातें हमारे बाप-दादे कहते चले आये हैं, वैसी ही बातें तो मैं कह रहा हूं। तुमने यह सुना है या नहीं कि ईश्वर त्रिगुणात्मक है?"

महेन्द्र-"हां, सुना है। सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण है।"

सत्या०—“बहुत ठीक। इन तीनों गुणोंकी अलग-अलग उपासना होती है। सत्त्वगुणसे उनकी दया, दाक्षिण्य आदिकी उत्पत्ति होती है। उसकी उपासना भक्तिद्वारा करनी चाहिये। चैतन्यका सम्प्रदाय यही करता है। रजोगुणसे उनकी शक्ति उत्पन्न होती है। इसकी उपासना युद्धद्वारा की जाती है, देवताके शत्रुओंको मारकर की जाती है। हम लोग ऐसा ही करते हैं। और तमोगुणसे भगवान्ने शरीर धारण कर, चतुर्भुज आदि रूप इच्छानुसार धारण किये हैं। माला, चन्दन आदि उपहारोंके द्वारा इस गुणकी पूजा की जाती है। सर्वसाधारण ऐसा ही करते हैं। अब समझे या नहीं?"

महेंद्र-“समझा। तब तो सन्तानगण भी एक प्रकारके उपासक ही हैं।"

सत्या०-“अवश्य। हम लोग राज्य नहीं चाहते, पर चूँकि ये मुसलमान भगवान्से द्वेष करते हैं, इसीलिये हम उनको निर्मूल कर डालना चाहते हैं।"