कर्मभूमि/पहला भाग 1१

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कर्मभूमि  (१९३२) 
द्वारा प्रेमचंद

[ ७४ ]अमर ने कहा--अँग्रेजों के समाज में तो जलसे नहीं होते।

लालाजी ने बिल्ली की तरह चूहे पर झपटकर कहा--अंग्रेजों के यहां रंडियां नहीं, घर की बहू-बेटियां नाचती हैं, जैसे हमारे चमारों में होता है। बहूबेटियों को नचाने से तो यह कहीं अच्छा है कि रडियां नाचें। कम-से-कम मैं और मेरी तरह के और बुड्ढे अपनी बहू-बेटियों को नचाना कभी पसन्द न करेंगे।

अमरकान्त को कोई जवाब न सूझा। सलीम और दूसरे दोस्त आयेंगे। खासी चहल-पहल रहेगी। उसने ज़िद भी की लो क्या नतीजा। लालाजी मानने के नहीं। फिर एक उसके करने से तो नाच का बहिष्कार हो नहीं जाता।

वह बैठकर तखमीना लिखने लगा।


११

सलीम ने मामूल से कुछ पहले उठकर काले खां को बुलाया और रात का प्रस्ताव उसके सामने रखा। दो सौ रुपये की रकम कुछ कम नहीं होती! काले खां ने छाती ठोंककर कहा--भैया, एक-दो जूते की क्या बात है, कहो तो इजलास पर पचास गिनकर लगाऊँ। ६ महीने से बेसी तो होती नहीं, २००) बाल-बच्चों के खाने-पीने के लिए बहुत है।

सलीम ने सोचा अमरकान्त रुपये लिये आता होगा; पर आस बजे, नौ का अमल हुआ और अमर का कहीं पता नहीं। आया क्यों नहीं? कहीं बीमार तो नहीं पड़ गया। ठीक है, रुपये का इन्तजाम कर रहा होगा। बाप तो न देंगे। सास से जाकर कहेगा, तब मिलेंगे। आखिर दस बज गये। अमरकान्त के पास चलने को तैयार हुआ कि प्रो० शान्तिकुमार आ पहुंचे। सलीम ने द्वार तक जाकर उनका स्वागत किया। डाक्टर शान्तिकुमार ने कुरसी पर लेटते हुए पंखा चलाने का इशारा करके कहा--तुमने कुछ सुना है, अमर के घर लड़का हुआ है। वह आज न जा सकेगा; उसकी सास भी वहीं हैं। समझ में नहीं आता, आज का इन्तजाम कैसे होगा ! उसके बगैर हम किसी तरह का डिमांस्ट्रेशन (प्रदर्शन) कर सकेंगे ? रेणुका देवी आ जाती, तो भी बहुत कुछ हो जाता ; पर उन्हें भी फुरसत नहीं है। [ ७५ ]सलीम ने काले खां की तरफ देखकर कहा--यह तो आपने बुरी खबर सुनाई। उसके घर में आज ही लड़का होना था। बोलो काले खां, अब?

काले खां ने अविचलित भाव से कहा था--तो कोई हरज नहीं भैया ? तुम्हारा काम मैं कर दूंगा। रुपये फिर मिल जायेंगे। अब जाता हूँ, दो-चार रुपये का सामान लेकर घर में रख दूँ। मैं उधर ही से कचहरी चला जाऊँगा। ज्योंही तुम इशारा करोगे, बस।

वह चला गया, तो शान्तिकुमार ने सन्देहात्मक स्वर में पूछा--यह क्या कह रहा था, मैं न समझा ?

सलीम ने इस अन्दाज़ से कहा मानों यह विषय गंभीर विचार के योग्य नहीं है--कुछ नहीं, जरा काले खां को जवांमर्दी का तमाशा देखना है। अमरकान्त की यह सलाह है, कि जज साहब आज फैसला सुना चुके, तो उन्हें थोड़ा सा सबक़ दे दिया जाय।

डाक्टर साहब ने लंबी साँस खींचकर कहा--तो यह कहो, तुम लोग बदमाशी पर उतर आये। यह अमरकान्त की सलाह है, यह और भी अफ़सोस की बात है। वह तो यहाँ है ही नहीं; मगर तुम्हारी सलाह से यह तजवीज हुई है इसलिए तुम्हारे ऊपर भी उतनी ज़िम्मेदारी है ही। मैं इसे कमीनापन कहता हूँ। तुम्हें यह समझने का कोई हक नहीं है कि जज साहब अपने अफसरों को खश करने के लिए इन्साफ़ का खून कर देंगे। जो आदमी इल्म में, अक्ल में, तजरवे में, इज्जत में तुमसे कोसों आगे है, वह इन्साफ़ में दोनों को शरीफ़ और बलीस समझता है।

सलीम का मुंह जरा सा निकल आया। ऐसी लताड़ उसने उम्र में कभी नपायी थी। उसके पास अपनी सफाई देने के लिए एक भी तर्क, एक भी शब्द न था। अमरकान्त के सिर इसका भार डालने की नीयत से बोला--मैंने तो अमरकान्त को मना किया था; पर जब वह न माने तो मैं क्या करता।

डाक्टर साहब ने डाँटकर कहा--तुम झूठ बोलते हो। मैं यह नहीं मान सकता। यह तुम्हारी शरारत है।

'आपको मेरा यक़ीन न आये, तो क्या इलाज।'

'अमरकान्त के दिल से ऐसी बात हरगिज नहीं पैदा हो सकती।'

सलीम चुप हो गया। डाक्टर साहब कह सकते थे--मान लें, अमरकान्त [ ७६ ]ने ही यह प्रस्ताव पास किया, तो तुमने इसे क्यों मान लिया ? इसका उसके पास कोई जवाब न था।

एक क्षण के बाद डाक्टर साहब घड़ी देखते हुए बोले--आज इस लौंडे पर ऐसा गुस्सा आ रहा है, कि गिनकर पचास हंटर जमाऊँ ? इतने दिनों तक इस मुकदमे में सिर पटकता फिरा, और आज जब फैसले का दिन आया तो लड़के का जन्मोत्सव मनाने बैठा रहा। न जाने हम लोगों में अपनी जिम्मेदारी का खयाल कब पैदा होगा। पूछो, इस जन्मोत्सव में क्या रखा है। मर्द का काम है, संग्राम में डटे रहना, खुशियाँ मनाना तो विलासियों का काम है। मैंने फटकारा, तो हँसने लगा। आदमी वह है जो जीवन का एक लक्ष्य बना ले और जिन्दगी-भर उसके पीछे पड़ा रहे। कभी कर्तव्य से मुंह न मोड़े! यह क्या कि कटे हुए पंतग की तरह जिधर हवा उड़ा ले जाय, उधर चला जाय। तुम तो कचहरी चलने को तैयार हो ? हमें और कुछ नहीं करना है। अगर फैसला अनुकूल है, तो भिखारिन को जुलूस के साथ गंगा-तट तक लाना होगा; वहाँ सब लोग स्नान करेंगे और अपने घर चले जायेंगे। सजा हो गयी, तो उसे बधाई देकर बिदा करना होगा। आज ही शाम को 'तालीमी इसलाह' पर मेरी स्पीच होगी। उसकी भी फिक्र करनी है। तुम भी कुछ बोलोगे?

सलीम ने सकुचाते हुए कहा--मैं ऐसे मसले पर क्या बोलूँगा ?

'क्यों, हर्ज क्या है। मेरे खयालात तुम्हें मालूम है। यह किराये की तालीम हमारे कैरेक्टर को तबाह किये डालती है। हमने तालीम को भी एक व्यापार बना लिया है। व्यापार में ज्यादा नफा होगा। तालीम में ज्यादा खर्च करो, ज्यादा ऊँचा ओहदा पाओगे। मैं चाहता हूँ, ऊँची-से-ऊँची तालीम सबके लिए मुआफ़ हो; ताकि ग़रीब-से-ग़रीब आदमी भी ऊँची-से-ऊँची लियाकत हासिल कर सके और ऊँचे-से-ऊँचे ओहदा पा सके। युनिवर्सिटी के दरवाजे मैं सबके लिये खुले रखना चाहता हूँ। सारा खर्च गवर्नमेंट पर पड़ना चाहिए। मुल्क को तालीम की उससे कहीं ज्यादा जरूरत है, जितनी फौज की।'

सलीम ने शंका की--फौज न हो, तो मुल्क की हिफाजत कौन करे ?

डाक्टर साहब ने गंभीरता के साथ कहा--मुल्क की हिफाजत करेंगे हम और तुम, मुल्क के दस करोड़ जवान, जो अब भी बहादुरी और हिम्मत [ ७७ ]में दुनिया की किसी क़ौम से पीछे नहीं हैं। उसी तरह, जैसे हम और तुम रात को चोरों के आ जाने पर पुलिस को नहीं पुकारते; बल्कि अपनी-अपनी लकड़ियाँ लेकर घरों से निकल पड़ते हैं।

सलीम ने पीछा छुड़ाने के लिए कहा--मैं बोल न सकूँगा, लेकिन जाऊंगा जरूर।

सलीम ने मोटर मंगवाई और दोनों आदमी कचहरी चले। आज वहाँ और दिनों से कहीं ज्यादा भीड़ थी; पर जैसे बिना दूल्हा की बरात हो। वहाँ कोई शृंखला न थी। सौ-सौ पचास-पचास की टोलियाँ जगह-जगह खड़ी या बैठी शून्य दृष्टि से ताक रही थीं। कोई बोलने लगता था, तो सौ-दो-सौ आदमी इधर-उधर से आकर उसे घेर लेते थे। डाक्टर साहब को देखते ही हजारों आदमी उनकी तरफ दौड़े। डाक्टर साहब मुख्य कार्यकर्ताओं को आवश्यक बातें समझा कर वकालतखाने की तरफ चले, तो देखा लाला समरकान्त सबको निमन्त्रण-पत्र बाँट रहे हैं। वह उत्सव उस समय वहाँ सबसे आकर्षक विषय था। लोग बड़ी उत्सुकता से पूछ रहे थे, कौन-कौन सी तबायफे बुलाई गयी हैं ? भाँड़ भी है या नहीं ? मांसाहारियों के लिए भी कुछ प्रबन्ध है ? एक जगह दस-बारह सज्जन नाच पर वाद-विवाद कर रहे थे। डाक्टर साहब को देखते ही एक महाशय ने पूछा--कहिए, उत्सव में आयेंगे, या आपको आपत्ति है ?

डाक्टर शान्तिकुमार ने उपेक्षा-भाव से कहा--मेरे पास इससे ज्यादा जरूरी काम है।

एक साहब ने पूछा--आखिर आपको नाच से क्यों एतराज़ है ?

डाक्टर ने अनिच्छा से कहा--इसलिए कि आप और हम नाचना ऐब समझते हैं। नाचना विलास की वस्तु नहीं,भक्ति और आध्यात्मिक आनन्द की वस्तु है; पर हमने इसे लज्जासद बना रखा है। देवियों को विलास और भोग की वस्तु बनाना अपनी माताओं और बहनों का अपमान करना है। हम सत्य से इतनी दूर हो गये है कि उसका यथार्थ रूप भी हमें नहीं दिखाई देता। नृत्य जैसे पवित्र...

सहसा एक युवक ने समीप आकर डाक्टर साहब को प्रणाम किया। लम्बा सा दुबला-पतला आदमी था, मुख सूखा हुआ, उदास; कपड़े मैले और [ ७८ ]
जीर्ण, बालों पर गर्द पड़ी हुई। उसकी गोद में एक साल-भर का हृष्ट-पुष्ट बालक था, बडा चंचल; लेकिन कुछ डरा हुआ।

डाक्टर ने पूछा--तुम कौन हो। मुझसे कुछ काम है ?

युवक ने इधर-उधर संशय-भरी आँखों से देखा, मानो इन आदमियों के सामने वह अपने विषय में कुछ कहना नहीं चाहता, और बोला---मैं तो ठाकुर हूँ। यहाँ से छः सात कोस पर एक गाँव है महुली, वहीं रहता हूँ।

डाक्टर साहब ने तीव्र नेत्रों से देखा, और समझ गये। बोले---अच्छा वही गाँव, जो सड़क के पश्चिम तरफ़ है। आओ मेरे साथ।

डाक्टर साहब उसे लिये पास वाले बगीचे में चले गये और एक बेंच पर बैठकर उसकी ओर प्रश्न की निगाहों से देखा, कि अब वह उसकी कथा सुनने को तैयार हैं।

युवक ने सकुचाते हुए कहा---इस मुकदमे में जो औरत है, वह इसी बालक की माँ है। घर में हम दो प्राणियों के सिवा और कोई नहीं है। मैं खेती-बारी करता हूँ। वह बाज़ार में कभी-कभी सौदा सुलुफ लाने चली जाती थी। उस दिन गाँववालों के साथ अपने लिये एक साड़ी लेने गयी थी। लौटती बार यह वारदात हो गयी ; गाँव के सब आदमी छोड़कर भाग गये। उस दिन से वह घर नहीं गयी। मैं कुछ नहीं जानता, कहाँ घूमती रही। मैंने भी उसकी खोज नहीं की। अच्छा ही हुआ कि वह उस समय पर नहीं गयी, नहीं तो हम दोनों में एक की या दोनों की जान जाती। इस बच्चे के लिए मुझे विशेष चिन्ता थी। बार-बार माँ को खोजता; पर मैं इसे बहलाता रहता था। इसी की नींद सोता और इसी की नींद जागता। पहले तो मालूम होता था, बचेगा ही नहीं, लेकिन भगवान की दया थी। धीरे-धीरे मां को भूल गया। पहले मैं इसका बाप था, अब तो माँ-बाप दोनों में ही हूँ। बाप कम, माँ ज्यादा। मैंने मन में समझा था, वह कहीं डूब मरी होगी। गाँव के लोग कभी-कभी कहते---उसकी तरह की एक औरत छाबनी की ओर है; पर मैं कभी उन पर विश्वास न करता।

जिस दिन मुझे खबर मिली, कि लाला समरकान्त की दूकान पर एक औरत ने दो गोरों को मार डाला और उसपर मुकदमा चल रहा है, तब मैं समझ गया कि वही है। उस दिन से हर पेशी में आता हूँ और सब के पीछ
[ ७९ ]खड़ा रहता हूँ। किसी से कुछ कहने की हिम्मत नहीं होती। आज मैंने समझा, अब उससे सदा के लिए नाता टूट रहा है; इसलिए बच्चे को लेता आया, कि इसको देखने की उसे लालसा न रह जाय। आप लोगों ने तो बहुत खरचबरच किया; पर भाग्य में जो लिखा था, वह कैसे टलता। आपसे यही कहना है, कि जज साहब फैसला सुना चुकें, तो एक छिन के लिए उससे मेरी भेंट करा दीजिएगा। मैं आपसे सत्य कहता हूँ बाबूजी, वह अगर बरी हो जाय तो मैं उसके चरण धो-धोकर पीऊँ और घर ले जाकर उसकी पूजा करूँ। मेरे भाई-बन्द अब भी नाक-भौं सिकोड़ेगे; पर जब आप लोग जैसे बड़े-बड़े आदमी मेरे पक्ष में हैं, तो मुझे बिरादरी की परवाह नहीं।

शान्तिकुमार ने पूछा -- जिस दिन उसका बयान हुआ, उस दिन तुम थे ?

युवक ने सजल-नेत्र होकर कहा--हाँ, बाबूजी, था। सबके पीछे द्वार पर खड़ा रो रहा था। यही जी में आता था, कि दौड़कर उसके चरणों से लिपट जाऊँ और कहूँ--मुन्नी, मैं तेरा सेवक हूँ, तू अब तक मेरी स्त्री थी, आज से मेरी देवी है। मुन्नी ने मेरे पुरुखों को तार दिया बाबूजी, और क्या कहूँ।

शान्तिकुमार ने फिर पूछा--मान लो, आज वह छूट जाय तो तुम उसे घर ले जाओगे?

युवक ने पुलकित कंठ से कहा--यह पूछने की बात नहीं है बाबूजी ! मैं उसे आँखों पर बैठा कर ले जाऊँगा और जब तक जिऊँगा उसका दास बना रहकर अपना जन्म सुफल करूँगा।

एक क्षण के बाद उसने बड़ी उत्सुकता से पूछा--क्या छूटने की कुछ आशा है बाबूजी ?

'औरों को तो नहीं है ; पर मुझे हैं।'

युवक डाक्टर साहब के चरणों पर गिरकर रोने लगा। चारो ओर निराशा की बातें सुनने के बाद आज उसने आशा का शब्द सुना है और यह निधि पाकर उसके हृदय की समस्त भावनाएँ मानो मंगल गान कर रही हैं। और हर्ष के अतिरेक में मनुष्य क्या आँसुओं को संयत रख सकता है ?

मोटर का हार्न सुनते ही दोनों ने कचहरी की तरफ देखा। जज साहब आ गये। जनता का वह अपार सागर चारों ओर से उमड़कर अदालत के सामने जा पहुँचा। फिर भिखारिन लाई गई। जनता ने उसे देखकर जय-

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[ ८० ]घोष किया। किसी-किसी ने पुष्प-वर्षा भी की। वकील, बैरिस्टर, पुलिस, कर्मचारी, अफसर सभी आकर यथास्थान बैठ गये।

सहसा जज साहब ने एक उड़ती हुई निगाह से जनता को देखा। चारों तरफ सन्नाटा हो गया। असंख्य आँखें जज साहब की ओर ताकने लगीं, मानो कह रही थीं--आप ही हमारे भाग्य-विधाता हैं।

जज साहब ने सन्दूक से टाइप किया हुआ फैसला निकाला और एक बार खाँसकर उसे पढ़ने लगे। जनता सिमटकर और समीप आ गयी। अधिकांश लोग फैसले का एक शब्द भी न समझते थे; पर कान सभी लगाये हुए थे। चावल और बताशों के साथ न जाने कब रुपये लूट में मिल जायें।

कोई पन्द्रह मिनट तक जज साहब फैसला पढ़ते रहे, और जनता चितामय प्रतीक्षा से तन्मय होकर सुनती रही।

अन्त में जज के मुख से निकला--'यह सिद्ध है कि मुन्नी ने हत्या की...' कितनों ही के दिल बैठ गये। एक दूसरे की ओर पराधीन नेत्रों से देखने लगे।

जज ने वाक्य की पूर्ति की--'लेकिन यह भी सिद्ध है, कि उसने यह हत्या मानसिक अस्थिरता की दशा में की--इसलिए मैं उसे मुक्त करता हूँ।'

वाक्य का अन्तिम शब्द आनन्द की उस तूफ़ानी उमंग में डूब गया। आनन्द महीनों चिन्ता के बन्धनों में पड़े रहने के बाद आज जो छूटा, तो छूटे हुए बछड़े की भांति कुलांचे मारने लगा। लोग मतवाले हो-होकर एक-दूसरे के गले मिलने लगे। घनिष्ट मित्रों में धौल-धप्पा होने लगा। कुष्ट लोगों ने अपनी-अपनी टोपियां उछाली। जो मसखरे थे, उन्हें जूते उछालने की सूझी। सहसा मुन्नी, डाक्टर शांतिकुमार के साथ, गम्भीर हास्य से अलंकृत बाहर निकली, मानो कोई रानी अपने मन्त्री के साथ आ रही है। जनता को वह सारी उद्दण्डता शान्त हो गई। रानी के सम्मुख बेअदबी कौन कर सकता है।

प्रोग्राम पहले ही निश्चित था। पुष्प वर्षा के पश्चात् मुन्नी के गले में जय-माल डालना था। यह गौरव जज-साहब की धर्म-पत्नी को प्राप्त हुआ, जो इस फैसले के बाद जनता की श्रद्धा-पात्री हो चकी थीं। फिर बैंड बजने

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[ ८१ ]लगा। सेवा-समिति के दो सौ नवयुवक केसरिया बाने पहने जुलस के साथ चलने के लिए तैयार थे। राष्ट्रीय सभा के सेवक भी खाकी वर्दियां पहने झण्डियां लिये जमा हो गये। महिलाओं की संख्या एक हजार से कम न थी। निश्चित किया गया कि जुलूस गंगातट जाय, वहां एक विराट् सभा हो, मुन्नी को एक थैली भेंट दी जाय और सभा भंग हो जाय।

मुन्नी कुछ देर तक तो शान्तभाव से यह समारोह देखती रही, फिर शान्तिकुमार से बोली--बबूजी, आप लोगों ने मेरा जितना सम्मान किया मैं उसके योग्य नहीं थी; अब मेरी आप से यही विनती है कि मुझे हरद्वार या किसी दूसरे तीर्थ-स्थान में भेज दीजिए। वहीं भिक्षा मांगकर यात्रियों की सेवा करके दिन काटूंगी। यह जुलूस और धूम-धाम मुझ-जैसी अभागिन के लिए शोभा नहीं देता। इन सभी भाई-बहनों से कह दीजिये, अपने-अपने घर जायें। मैं धूल में पड़ी हुई थी। आप लोगों ने मुझे आकाश पर चढ़ा दिया। अब उससे ऊपर जाने की मुझमें सामर्थ्य नहीं है, मेरे सिर में चक्कर आ जायगा। मुझे यहीं से स्टेशन भेज दीजिए। आपके पैरों पड़ती हूँ।

शान्तिकुमार इस आत्म-दमन पर चकित होकर बोले--यह कैसे हो सकता है बहन, इतने स्त्री-पुरुष जमा है। इनकी भक्ति और प्रेम का तो विचार कीजिये। आप जुलूस में न जायेंगी, तो इन्हें कितनी निराशा होगी। मैं तो समझता हूँ, कि यह लोग आपको छोड़कर कभी न जायेंगे।

'आप लोग मेरा स्वांग बना रहे हैं।'

"ऐसा न कहो बहन ! तुम्हारा सम्मान कर रहे हैं। और हरद्वार जाने की ज़रूरत क्या है। तुम्हारा पति तुम्हें साथ ले जाने के लिए आया हुआ है।'

मुन्नी ने आश्चर्य से डाक्टर की ओर देखा--मेरा पति ! मुझे अपने साथ ले जाने के लिए आया हुआ है ? आपने कैमे जाना ?

'मुझसे थोड़ी देर पहले मिला था।'

'क्या कहता था ?'

'यही कि मैं उसे अपने साथ ले जाऊँगा और उसे अपने घर की देवी समझूँगा।'

'उसके साथ कोई बालक भी था ?'

'हाँ तुम्हारा छोटा बच्चा उसकी गोद में था।'

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[ ८२ ]'बालक बहुत दुबला हो गया होगा ?'

'नहीं, मझे वह हृष्ट-पुष्ट दीखता था।'

'प्रसन्न भी था ?' 'हा खुब हँस रहा था।'

'अम्मा-अम्मा तो न करता होगा?'

'मेरे सामने तो नहीं रोया।'

'अब तो चाहे चलने लगा हो?'

'गोद में था; पर ऐसा मालूम होता था, कि चलता होगा।'

'अच्छा, उसके बाप की क्या हालत थी? बहुत दुबले हो गये हैं ?'

'मैंने उन्हें पहले कब देखा था ? हाँ दुःखी जरूर थे। यहीं कहीं होंगे, कहो तो तलाश करूँ। शायद खुद आते हों!'

मन्नी ने एक क्षण के बाद सजल-नेत्र होकर कहा--उन दोनों को मेरे पास न आने दीजिएगा बाबूजी। मैं आप के पैरों पड़ती हूँ। इन आदमियों से कह दीजिए अपने-अपने घर जाय। मझे आप स्टेशन पहुँचा दीजिए। मैं आज ही यहां से चली जाऊँगी। पति और पुत्र के मोह में पड़कर उनका सर्वनाश न करूँगी। मेरा यह सम्मान देखकर पतिदेव मुझे ले जाने पर तैयार हो गये होंगे; पर उनके मन में क्या है, यह मैं जानती हूँ ! वह मेरे साथ रहकर सन्तुष्ट नहीं रह सकते। मैं अब इसी योग्य हूँ कि किसी ऐसी जगह चली जाऊँ, जहाँ मुझे कोई न जानता हो। वहीं मजूरी करके या भिक्षा मांगकर अपना पेट पालुंगी।

वह एक क्षण चुप रही। शायद देखती थी कि डाक्टर क्या जवाब देते हैं। जब डाक्टर साहब कुछ न बोले, तो उसने ऊँचे, पर कांपते हुए स्वर में लोगों से कहा--बहनों और भाइयो ! आपने मेरा जो सत्कार किया है, इसके लिए आपकी कहां तक बड़ाई करूँ। आपने एक अभागिनी को तार दिया। अब मुझे जाने दीजिये। मेरा जुलूस निकालने के लिये हठ न कीजिये। मैं इसी योग्य हूँ, कि अपना काला मुँह छिपायें किसी कोने में पड़ी रहूँ। इस योग्य नहीं हूँ, कि मेरी दुर्गति का माहात्म्य किया जाय।

जनता ने बहुत शोर-गुल मचाया, लीडरों ने समझाया, देवियों ने आग्रह किया, पर मुन्नी जुलूस पर राजी न हुई और बराबर यही कहती रही, कि

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मुझे स्टेशन पर पहुंचा दो। आख़िर मजबूर होकर डाक्टर साहब ने जनता को विदा किया और मुन्नी को मोटर पर बैठाया।

मुन्नी ने कहा--अब यहां से चलिए और किसी दूर के स्टेशन पर ले चलिए, जहां यह लोग एक भी न हों।

शान्तिकुमार ने इधर-उधर प्रतीक्षा की आंखों से देखकर कहा--इतनी जल्दी न करो बहन, तुम्हारा पति आता ही होगा। जब यह लोग चले जायेंगे, तब वह जरूर आयेगा।

मन्त्री ने अशान्त भाव से कहा--मैं उनसे मिलना नहीं चाहती बाबजी,कभी नहीं। उनके मेरे सामने आते ही मारे लज्जा के मेरे प्राण निकल जांयगे। मैं सच कहती हूँ मैं मर जाऊँगी। आप मुझे जल्दी से ले चलिए। अपने बालक को देखकर मेरे हृदय में मोह की ऐसी आंधी उठेगी, कि मेरा सारा विवेक और विचार उसमें तृण के समान उड़ जायगा। उस मोह में मैं भल जाऊँगी कि मेरा कलंक उसके जीवन का सर्वनाश कर देगा। मेरा मन न-जाने कैसा हो रहा है। आप मुझे जल्दी यहां से ले चलिए। मैं उस बालक को देखना नहीं चाहती, मेरा देखना उसका विनाश है।

शान्तिकुमार ने मोटर चला दी; पर दस ही बीस गज गये होंगे कि पीछे से मुन्नी का पति बालक को गोद में लिये दौड़ता और 'मोटर रोको ! मोटर रोको !'पुकारता चला आता था। मुन्नी की उस पर नजर पड़ी। उसने मोटर की खिड़की से सिर निकाल कर हाथ से मना करते हुए चिल्लाकर कहा--नहीं, नहीं, तुम मत आओ, मेरे पीछे मत आओ ! ईश्वर के लिए मत आओ।

फिर उसने दोनों बाहें फैला दी, मानों बालक को गोद में ले रही हो और मूर्छित होकर गिर पड़ी।

मोटर तेजी से चली जा रही थी, युवक ठाकुर बालक को लिये खड़ा रो रहा था और कई हजार स्त्री-पुरुष मोटर की तरफ ताक रहे थे।


१२

मुन्नी के बरी होने का समाचार आनन-फानन सारे शहर में फैल गया। इस फैसले की आशा बहुत कम आदमियों को थी। कोई कहता था--जज माहब की स्त्री ने पत्ति से लड़कर फैसला लिखाया। रूठकर मैके चली जा रही थी। स्त्री जब किसी बात पर अड़ जाय, तो पुरुष कैसे नहीं कर दे।


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