कर्मभूमि/पाँचवाँ भाग १०

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कर्मभूमि  (1932) 
द्वारा प्रेमचंद

[ ३९९ ]

१०

इधर सकीना ज़नाने जेल में पहुँची, उधर सुखदा, पठानिन और रेणुका की रिहाई का परवाना भी आ गिरा। उसके साथ ही नैना की हत्या का [ ४०० ]संवाद भी पहुँचा। सुखदा सिर झुकाये मूर्तिवत् बैठी रह गयी, मानो अचेत हो गयी हो। कितनी महँगी विजय थी!

रेणका ने लम्बी साँस लेकर कहा--दुनिया में ऐसे-ऐसे आदमी भी पड़े हए है, जो स्वार्थ के लिये अपनी स्त्री की हत्या कर सकते है!

सुखदा आवेश में आकर बोली--नैना की उसने हत्या नहीं की अम्मा, यह विजय उसी देवी के प्राणों का वरदान है।

पठानिन ने आँसू पोंछते हुए कहा--मुझे तो यही रोना आता है कि भैया को कितना दु:ख होगा। भाई बहन में इतनी मोहब्बत मैंने नहीं देखी।

जेलर ने आकर सूचना दी, आप लोग तैयार हो जायँ। शाम की गाड़ी से सुखदा, रेणुका और पठानिन इन महिलाओं को जाना है। देखिये, हम लोगों से जो खता हुई हो उसे मुआफ़ कीजियेगा।

किसी ने इसका जवाब न दिया, मानो किसी ने सुना ही नहीं। घर जाने में अब आनन्द न था। विजय का आनन्द भी इस शोक में डूब गया था।

सकीना ने सुखदा के कान में कहा--जाने के पहले बाबूजी से मिल लीजियेगा। यह खबर सुनकर न जाने दुश्मनों पर क्या गुज़रे। मुझे तो डर लग रहा है।

बालक रेणुकान्त सामने सहन में कीचड़ से फिसलकर गिर गया था और पैरों से ज़मीन को इस शरारत की सज़ा दे रहा था। साथ ही साथ रोता भी जाता था। सकीना और सुखदा दोनों उसे उठाने दौड़ी, और वृक्ष के नीचे खड़ी होकर उसे चुप कराने लगीं।

सकीना कल सुबह आयी थी; पर अब तक सुखदा और उसमें मामूली शिष्टाचार के सिवा और कोई बात न हुई थी। सकीना उससे बातें करते झेंपती थी कि कहीं वह गुप्त प्रसंग न उठ खड़ा हो। और सुखदा इस तरह उससे आँखें चुराती थी, मानो अभी उसकी तपस्या उस कलंक को धोने के लिए काफ़ी नहीं हुई।

सकीना की सलाह में जो सहृदयता भरी थी, उसने सुखदा को पराभूत कर दिया। बोली--हाँ, विचार तो है। तुम्हारा भी कोई संदेशा कहना है?

सकीना ने आँखों में आँसू भरकर कहा---मैं क्या सन्देशा कहूँगी? [ ४०१ ]बहूजी आप इतना ही कह दीजियेगा---नैना देवी चली गयीं; पर जब तक सकीना ज़िन्दा है, आप उसे नैना ही समझते रहिये।

सुखदा ने निर्दय मुसकान के साथ कहा--उनका तो तुमसे दूसरा रिश्ता हो चुका है!

सकीना ने जैसे इस वार को काटा--तब उन्हें औरत की ज़रूरत थी, आज बहन की ज़रूरत है।

सूखदा तीव्र स्वर में बोली--मैं तो तब भी ज़िन्दा थी।

सकीना ने देखा, जिस अवसर से वह काँपती रहती थी, यह सिर पर आ ही पहुँचा। अब उसे अपनी सफ़ाई देने के सिवा और कोई मार्ग न था।

उसने पूछा--मैं कुछ कहूँ, बुरा तो न मानियेगा?

'बिल्कुल नहीं।'

'तो सुनिये--तब आपने उन्हें घर से निकाल दिया था। आप पूरब को जाती थीं वह पच्छिम को जाते थे। अब आप और वह एक दिल हैं, एक जान हैं। जिन बातों की उनकी निगाह में सबसे ज़्यादा क़दर थी वह आपने सब पूरी कर दिखायीं। वह जो आपको पा जायँ, तो आपके क़दमों का बोसा ले लें।'

सुखदा को इस कथन में वही आनन्द आया, जो एक कवि की दूसरे कवि की दाद पाकर आता है। उसके दिल में जो संशय था, वह कैसे आप ही आप उसके हृदय से टपक पड़ा--यह तो तुम्हारा खयाल है सकीना! उनके दिल में क्या है, यह कौन जानता है। मरदों पर विश्वास करना मैंने छोड़ दिया! अब वह चाहे मेरी इज्जत करने लगें--इज्ज़त तो तब भी कम न करते थे--लेकिन तुम्हें वह दिल से निकाल सकते हैं, इसमें मुझे शक है। तुम्हारी शादी मियाँ सलीम से हो ही जायगी; लेकिन दिल में वह तुम्हारी उपासना करते रहेंगे।

सकीना की मुद्रा गंभीर हो गयी। वह भयभीत हो गयी। जैसे कोई शत्रु उसे दम देकर उसके गले में फन्दा डालने जा रहा हो। उसने मानों गले को बचाकर कहा--तुम उनके साथ फिर अन्याय कर रही हो बहनजी! वह उन आदमियों में नहीं हैं, जो दुनिया के डर से कोई काम करें। उन्होंने खुद सलीम से मेरी ख़त किताबत करवाई। मैं उनकी [ ४०२ ]मन्शा समझ गयी। मुझे मालूम हो गया, तुमने अपने रूठे हुए देवता को मना लिया। मैं दिल में काँपी जा रही थी कि मुझ जैसी गँवारिन उन्हें कैसे खुश रख सकेगी। मेरी हालत उस कँगले की-सी हो रही थी, जो खज़ाना पाकर बौखला गया हो कि अपनी झोपड़ी में उसे कहाँ रखे, कैसे उसकी हिफ़ाजत करे। उनकी यह मन्शा समझकर मेरे दिल का बोझ हलका हो गया। देवता तो पूजा करने की चीज़ है। वह हमारे घर में आ जाय, तो उसे कहाँ बैठायें, कहाँ सुलायें, क्या खिलायें। मन्दिर में जाकर हम एक छन के लिए कितने दीनदार, कितने परहेज़गार बन जाते हैं। हमारे घर में आकर यदि देवता हमारा असली रूप देखे, तो शायद हमसे नफरत करने लगे। सलीम को मैं सँभाल सकती हूँ। वह इसी दुनिया के आदमी हैं और मैं उन्हें समझ सकती हूँ।

उसी वक्त जनाने वार्ड के द्वार खुले और तीन कैदी अन्दर दाखिल हुए। तीनों घुटनों तक जाँघिए और आधी बाँह के ऊँचे कुरते पहने हुए थे। एक के कन्धे पर बाँस की सीढ़ी थी, एक के सिर पर चूने का बोरा। तीसरा चूने की हड़ियाँ, कूंची और बालटियाँ लिये हुए था। आज से जनाने जेल की पुताई होगी। सालाना सफाई और मरम्मत के दिन आ गये हैं।

सकीना ने कैदियों को देखते ही उछलकर कहा---यह तो जैसे बाबूजी हैं, डोल और रस्सी लिये हुए। सलीम सीढ़ी उठाये हुए हैं।

यह कहते हुए उसने बालक को गोद में उठा लिया और उसे भेंच-भेंचकर प्यार करती हुई द्वार की ओर लपकी। बार-बार उसका मुँह चूमती और कहती जाती थी---चलो, तुम्हारे बाबूजी आये हैं।

सुखदा भी आ रही थी; पर मन्द गति से। उसे रोना आ रहा था। आज इतने दिनों के बाद मुलाकात भी हुई, तो इस दशा में!

सहसा मुन्नी एक ओर से दौड़ती आयी और अमर के हाथ से डोल और रस्सी छीनती हुई बोली---अरे! यह तुम्हारा क्या हाल है, लाला, आधे भी नहीं रहे! चलो आराम से बैठो, में पानी खींचे देती हूँ।

अमर ने डोल को मजबूत पकड़कर कहा---नहीं, नहीं तुमसे न बनेगा। छोड़ दो डोल। जेलर देखेगा, तो मेरे ऊपर डाँट पड़ेगी। [ ४०३ ]मन्नी ने डोल छीनकर कहा--मैं जेलर को जवाब दे लूँगी। ऐसे ही थे तुम वहाँ?

एक तरफ से सकीना और सुखदा, दूसरी ओर से पठानिन और रेणुका आ पहुँची; पर किसी के मुँह से बात न निकलती थी। सबों की आँखें सजल थीं और गले भरे हुए। चली थी हर्ष के आवेश में, पर हर पग के साथ मानो जल गहरा होते-होते अन्त को सिरों पर आ पहुँचा।

अमर इन देवियों को देखकर विस्मय भरे गर्व से फूल उठा। उनके सामने वह कितना तुच्छ था, किन शब्दों में उनकी स्तुति करे, उनको भेंट क्या चढ़ाये। उसके आशावादी नेत्रों में भी राष्ट्र का भविष्य कभी इतना उज्ज्वल न था। उसके सिर से पाँव तक स्वदेशाभिमान की एक बिजली-सी दौड़ गयी। भक्ति के आँसू आँखों में छलक आये।

औरों की जेल-यात्रा का समाचार तो वह सुन चुका था; पर रेणका को वहाँ देखकर वह जैसे उन्मत्त होकर उनके चरणों पर गिर पड़ा।

रेणुका ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए कहा--आज चलते-चलाते तुमसे खूब भेंट हो गयी बेटा। ईश्वर तुम्हारी मनोकामना सफल करे। मुझे तो आये आज पाँचवाँ ही दिन है; पर हमारी रिहाई का हुक्म आ गया। नैना ने हमें मुक्त कर दिया।

अमर ने धड़कते हुए हृदय से कहा---तो क्या वह भी यहाँ आयी है? उसके घरवाले तो बहुत बिगड़े होंगे।

सभी देवियाँ रो पड़ीं। इस प्रश्न ने जैसे उनके हृदय को मसोस लिया। अमर ने चकित नेत्रों से हरेक के मुँह की ओर देखा। एक अनिष्ट-शंका से उसकी सारी देह थरथरा उठी। इन चेहरों पर विजय-दीप्ति नहीं, शोक की छाया अंकित थी। अधीर होकर बोला--कहाँ है नैना, यहाँ क्यों नहीं आती? उसका जी अच्छा नहीं है क्या?

रेणका ने हृदय को सँभालकर कहा---नैना को आकर चौक में देखना बेटा, जहाँ उसकी मूर्ति स्थापित होगी। नैना आज तुम्हारे नगर की रानी है। हरेक हृदय में तुम उसे श्रद्धा के सिंहासन पर बैठी पाओगे।

अमर पर जैसे वज्रपात हो गया। वह भूमि पर बैठ गया और दोनों हाथों से मुंह ढाँपकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसे जान पड़ा, अब संसार [ ४०४ ]में उसका रहना वृथा है। नैना स्वर्ग की विभूतियों में जगमगाती, मानो उसे खड़ी बुला रही थी।

रेणुका ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा---बेटा, उसके लिए क्या रोते हो, वह मरी नहीं, अमर हो गयी। उसी के प्राणों से इस यज्ञ की पूर्णाहुति हुई है।

सलीम ने गला साफ करके पूछा--बात क्या हुई? क्या कोई गोली लग गयी?

रेणुका ने इस भाव का तिरस्कार करके कहा--नहीं भैया, गोली क्या चलती, किसी से लड़ाई थी? जिस वक्त वह मैदान से जलूस के साथ म्युनिसिपैलिटी के दफ्तर की ओर चली, तो एक लाख आदमी से कम न थे। उसी वक्त मनीराम ने आकर उस पर गोली चला दी। वहीं गिर पड़ी। कुछ मुँह से कहने न पाई। रात-दिन भैया ही में उसके प्राण लगे रहते थे। वह तो स्वर्ग गयी। हाँ, हम लोगों को रोने के लिए छोड़ गयी।

अमर को ज्यों-ज्यों नैना के जीवन की बातें याद आती थीं, उसके मन में जैसे विषाद का एक नया सोता खुल जाता था। हाय! उस देवी के साथ उसने एक भी कर्तव्य का पालन न किया। यह सोच-सोचकर उसका जी कचोट उठता था। वह अगर घर छोड़कर न भागा होता, तो लालाजी क्यों उसे उस लोभी मनीराम के गले बाँध देते। और क्यों उसका यह करुणाजनक अन्त होता!

लेकिन सहसा इस शोक सागर में डूबते हए उसे ईश्वरीय विधान की नौका-सी मिल गयी। ईश्वरीय प्रेरणा के बिना किसी में सेवा का ऐसा अनुराग कैसे आ सकता है। जीवन का इससे शुभ उपयोग और क्या हो सकता है। गृहस्थी के संचय में, स्वार्थ की उपासना में तो सारी दुनिया मरती है। परोपकार के लिए मरने का सौभाग्य तो संस्कारवालों ही को प्राप्त होता है। अमर की लोकमग्न आत्मा ने अपने चारों ओर ईश्वरीय दया का चमत्कार देखा--व्यापक, असीम, अनन्त।

सलीम ने फिर पूछा--बेचारे लालाजी को तो बड़ा रंज हुआ होगा?

रेणुका ने गर्व से कहा--वह तो पहले ही गिरफ्तार हो चुके थे बेटा, और शांतिकुमार भी। [ ४०५ ]अमर को जान पड़ा, उसकी आँखों की ज्योति दुगुनी हो गयी है, उसकी भुजाओं में चौगुना बल आ गया। उसने वहीं ईश्वर के चरणों में सिर झुका दिया और अब उसकी आँखों से जो मोती गिरे वह विषाद के नहीं उल्लास और गर्व के थे। उसके हृदय में ईश्वर की ऐसी निष्ठा का उदय हुआ, मानो वह कुछ नहीं है, जो कुछ है, ईश्वर की इच्छा है, जो कुछ करता है, वही करता है, वही मंगल मूल और सिद्धियों का दाता है। सकीना और मुन्नी दोनों उसके सामने खड़ी थीं। उनकी छवि को देखकर उनके मन में वासना की जो आँधी-सी चलने लगती थी, उसी छवि में आज उसने निर्मल प्रेम के दर्शन पाये, जो आत्मा के विकारों को शान्त कर देता है, उसे सत्य प्रकाश से भर देता है। उसमें लालसा की जगह उत्सर्ग, भोग की जगह तप का संस्कार कर देता है। उसे ऐसा आभास हुआ, मानो वह उपासक है और ये रमणियाँ उसकी उपास्य देवियाँ हैं। उनकी पदरज को माथे पर लगाना ही मानो उसके जीवन की सार्थकता है।

रेणुका ने बालक को सकीना की गोद से लेकर अमर की ओर उठाते हुए कहा--यही तेरे बाबूजी हैं बेटा, इनके पास जा।

बालक ने अमरकान्त का वह कैदी का बाना देखा, तो चिल्लाकर रेणुका से चिपट गया। फिर उसकी गोद में मुँह छिपाये कनखियों से उसे देखने लगा, मानो मेल तो करना चाहता है, पर भय यह है कि कहीं यह सिपाही पकड़ न ले; क्योंकि इस वेश के आदमी को अपना बाबूजी समझने में उसके मन को सन्देह हो रहा था।

सूखदा को बालक पर क्रोध आया। कितना डरपोक है, मानो इसे वह खा जाते। उसकी इच्छा हो रही थी कि यह भीड़ टल जाय, तो एकान्त में अमर से मन की दो चार बातें कर ले। फिर न जाने कब भेंट हो।

अमर ने सुखदा की ओर ताकते हए कहा---आप लोग इस मैदान में भी हमसे बाजी ले गयीं। आप लोगों ने जिस काम का बीड़ा उठाया, उसे पूरा कर दिखाया। हम तो अभी जहाँ खड़े थे, वहीं खड़े हैं। सफलता के दर्शन होंगे भी या नहीं, कौन जाने। जो थोड़ा बहुत आन्दोलन यहाँ हुआ है, उसका गौरव भी मुन्नी बहन और सकीना बहन को है। इन दोनों बहनों के हृदय में देश के लिए जो अनुराग और कर्तव्य के लिए जो उत्सर्ग है, उसने [ ४०६ ]हमारा मस्तक ऊँचा कर दिया। सुखदा ने जो कुछ किया, वह तो आप लोग मुझसे ज्यादा जानती हैं। आज लगभग तीन साल हुए, मैं विद्रोह करके घर से भागा था। मैं समझता था, इनके साथ मेरा जीवन नष्ट हो जायगा; पर आज मैं उनके चरणों की धूल माथे पर लगाकर अपने को धन्य समझूँगा। मैं सभी माताओं और बहनों के सामने उनसे क्षमा माँगता हूँ।

सलीम ने मुसकराकर कहा---यों जबानी नहीं, कान पकड़कर एक लाख मरतबा उठो-बैठो।

अमर ने उसे कनखियों से देखा और बोला---अब तुम मैजिस्ट्रेट नहीं हो भाई, भूलो मत। ऐसी सजाएँ अब नहीं दे सकते।

सलीम ने फिर शरारत की। सकीना सें बोला---तुम चुपचाप क्यों खड़ी हो सकीना? तुम्हें भी तो इनसे कुछ कहना है, या मौका तलाश कर रही हो?

फिर अमर से बोला---आप अपने क़ौल से फिर नहीं सकते जनाब! जो वादे किये हैं, वह पूरे करने पड़ेंगे!

सकीना का चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया। जी चाहता था, जाकर सलीम के चुटकी काट ले! उसके मुख पर आनन्द और विजय का ऐसा गाढ़ा रंग था, जो छिपाये न छिपता था। मानो उसके मुख पर बहुत दिनों से जो कालिमा लगी हुई थी, वह आज घुल गयी हो, और वह संसार के सामने अपनी निष्कलंकता का ढिंढोरा पीटना चाहती हो। उसने पठानिन को ऐसी आँखों से देखा, जो तिरस्कार भरे शब्दों में कह रही थीं--अब तुम्हें मालूम हुआ, तुमने कितना घोर अनर्थ किया था! अपनी आँखों में वह कभी इतनी ऊँची न उठी थी। जीवन में उसे इतनी श्रद्धा और इतना सम्मान मिलेगा, इसकी तो उसने कभी कल्पना न की थी।

सुखदा के मुख पर भी कुछ कम गर्व और आनन्द की झलक न थी! यहाँ जो कठोरता और गरिमा छाई रहती थी, उसकी जगह जैसे माधुर्य खिल उठा है। आज उसे कोई ऐसी विभूति मिल गयी है, जिसकी कामना अप्रत्यक्ष होकर भी उसके जीवन में एक रिक्ति, एक अपूर्णता की सूचना देती रहती थी। आज उस रिक्ति में जैसे मधु भर गया है, वह अपूर्णता जैसे पल्लवित हो गयी है। आज उसने पुरुष के प्रेम में अपने नारीत्व को [ ४०७ ]पाया है। उसके हृदय से लिपटकर अपने को खो देने के लिए आज उसके प्राण कितने व्याकुल हो रहे हैं। आज उसकी तपस्या मानो फलीभूत हो गयी है।

रही मुन्नी, वह अलग विरक्त भाव से सिर झुकाये खड़ी है। उसके जीवन की सूनी मुंडेर पर एक पक्षी न जाने कहाँ से उड़ता हुआ आकर बैठ गया था। उसे देखकर वह अंचल में दाना धरे, आ! आ! कहती, पाँव दबाती हुई उसे पकड़ लेने के लिए लपककर चली। उसने दाना जमीन पर बिखेर दिया। पक्षी ने दाना चुगा, उसे विश्वास-भरी आँखों से देखा, मानो पूछ रहा हो--तुम मझे स्नेह से पालोगी, या चार दिन मन बहलाकर फिर पर काटकर निराधार छोड़ दोगी! लेकिन उसने ज्यों ही पक्षी को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, पक्षी उड़ गया, और तब दूर की एक डाली पर बैठा हुआ उसे कपट-भरी आँखों से देख रहा था, मानो कह रहा हो---मैं आकाशगामी हूँ, तुम्हारे पिंजरे में मेरे लिए सूखे दाने और कुल्हिया में पानी के सिवा और क्या था!

सलीम ने नाँद में चूना डाल दिया। सकीना और मुन्नी ने एक-एक डोल उठा लिया और पानी खींचने चलीं।

अमर ने कहा—बाल्टी मुझे दे दो, मैं भरे लाता हूँ!

मुन्नी बोली---तुम पानी भरोगे और हम बैठे देखेंगे?

अमर ने हँसकर कहा--और क्या तुम पानी भरोगी, मैं तमाशा देखूँगा?

मुन्नी बाल्टी लेकर भागी। सकीना भी उसके पीछे दौड़ी।

रेणुका जमाई के लिए कुछ जलपान बना लाने चली गयी थी। यहाँ जेल में बेचारे को रोटी-दाल के सिवा और क्या मिलता है। वह चाहती थी, सैकड़ों चीज बनाकर विधि-पूर्वक जमाई को खिलाये। जेल में भी रेणुका को घर के सभी सुख प्राप्त थे। लेडी जेलर, चौकीदारिनें और अन्य कर्मचारी सभी उसके गुलाम थे। पठानिन खड़ी खड़ी थक जाने के कारण जाकर लेट रही थी। मुन्नी और सकीना पानी भरने चली गयीं। सलीम को भी सकीना से बहुत-सी बातें कहनी थीं। वह भी बम्बे की तरफ चला। यहाँ केवल अमर और सुखदा रह गये।

अमर ने सुखदा के समीप आकर बालक को गले लगाते हुए कहा--[ ४०८ ]यह जेल तो मेरे लिए स्वर्ग हो गया सुखदा। जितनी तपस्या की थी, उससे कहीं बढ़कर वरदान पाया। अगर हृदय दिखाना संभव होता तो दिखाता कि मुझे तुम्हारी कितनी याद आती थी। बार-बार अपनी ग़लतियों पर पछताता था।

सुखदा ने बात काटी---अच्छा, अब तुमने बातें बनाने की कला भी सीख ली। तुम्हारे हृदय का हाल कुछ मुझे भी मालूम है। उसमें नीचे से ऊपर तक क्रोध ही क्रोध है। क्षमा या दया का कहीं नाम भी नहीं। मैं विलासिनी सही; पर उस अपराध का इतना कठोर दण्ड और जब यह जानते थे कि वह मेरा दोष नहीं, मेरे संस्कारों का दोष था।

अमर ने लज्जित होकर कहा---यह तुम्हारा अन्याय है सुखदा!

सूखदा ने उसकी ठोड़ी को ऊपर उठाते हए कहा---मेरी ओर देखो। मेरा ही अन्याय है! तुम न्याय के पुतले हो? तुमने सैकड़ों पत्र भेजे, मैंने एक का भी जवाब न दिया, क्यों! मैं कहती हूँ, तुम्हें इतना क्रोध आया कैसे? आदमी को जानवरों से भी प्रीति हो जाती है। मैं तो फिर भी आदमी थी। रूठ कर ऐसा भुला दिया मानो मैं मर गयी।

अमर इस आक्षेप का कोई जवाब न दे सकने पर भी बोला--तुमने भी तो कोई पत्र नहीं लिखा और में लिखता भी तो तुम जबाब देतीं? दिल से कहना।

'तो तुम मुझे सबक़ देना चाहते थे?'

अमरकान्त ने जल्दी से इस आक्षेप को दूर किया--नहीं, यह बात नहीं है, सुखदा! हज़ारों बार इच्छा हुई कि तुम्हें पत्र लिखूं लेकिन...

सुखदा ने वाक्य को पूरा किया---लेकिन भय यह था कि शायद मैं तुम्हारे पत्रों को हाथ न लगाती। अगर नारी-हृदय का तुम्हें यही ज्ञान है, तो मैं कहूँगी, तुमने उसे बिल्कुल नहीं समझा।

अमर ने अपनी हार स्वीकार की---तो मैंने यह दावा कब किया था कि में नारी-हृदय का पारखी हूँ।

वह यह दावा न करे, लेकिन सुखदा ने तो धारणा कर ली थी कि उसे यह दावा है। मीठे तिरस्कार के स्वर में बोली--पुरुष की बहादुरी तो इसमें नहीं है कि स्त्री को अपने पैरों पर गिराये। मैंने अगर तुम्हें पत्र न [ ४०९ ]लिखा, तो इसका यह कारण था कि मैं समझती थी, तुमने मेरे साथ अन्याय किया है, मेरा अपमान किया है। लेकिन इन बातों को जाने दो; यह बताओ, जीत किसकी हुई, मेरी या तुम्हारी?

अमर ने कहा---मेरी।

'और मैं कहती हूँ---मेरी।'

'कैसे?'

'तुमने विद्रोह किया था, मैंने दमन से ठीक कर दिया।'

'नहीं तुमने मेरी माँगें पूरी कर दीं।'

उसी वक्त सेठ धनीराम जेल के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ अन्दर दाखिल हुए। लोग कुतूहल से उन लोगों को ओर देखने लगे। सेठ इतने दुर्बल हो गये थे कि बड़ी मुश्किल से लकड़ी के सहारे चल रहे थे। पग पग पर खाँसते भी जाते थे।

अमर ने आगे बढ़कर सेठजी को प्रणाम किया। उन्हें देखते ही उसके मन में उनकी ओर से जो ग़ुबार था, वह जैसे धुल गया।

सेठजी ने उसे आशीर्वाद देकर कहा---मुझे यहाँ देखकर तुम्हें आश्चर्य हो रहा होगा बेटा? तुम समझते होगे, बुड्ढ़ा अभी तक जीता जा रहा है, इसे मौत क्यों नहीं आती। यह मेरा दुर्भाग्य है कि मुझे संसार ने सदा अविश्वास की आँखों से देखा। मैंने जो कुछ किया, उस पर स्वार्थ का आक्षेप लगा। मुझमें भी कुछ सच्चाई है, कुछ मनुष्यता है, इसे किसी ने भी स्वीकार नहीं किया। संसार की आँखों में मैं कोरा पशु हूँ, इसीलिए कि मैं समझता हूँ, हरेक काम का समय होता है। कच्चा फल पाल में डाल देने से पकता नहीं। तभी पकता है, जब पकने के लायक हो जाता है। जब मैं अपने चारों ओर फैले हुए अन्धकार को देखता हूँ, तो मुझे सूर्योदय के सिवाय उसके हटाने का कोई दूसरा उपाय नहीं सूझता। किसी दफ्त़र में जाओ, बिना रिश्वत के काम नहीं चल सकता। किसी घर में जाओ, वहाँ द्वेष का राज्य देखोगे। स्वार्थ, अज्ञान, आलस्य ने हमें पकड़ रखा है। इसे ईश्वर की इच्छा ही दूर कर सकती है। हम अपनी पुरानी संस्कृति को भूल बैठे हैं। वह आत्मा-प्रधान संस्कृति थी। जब तक ईश्वर की दया न होगी, उसका पुनर्विकास न होगा और जब तक उसका पुनर्विकास न होगा, हम लोग [ ४१० ]कुछ नहीं कर सकते। इस प्रकार के आन्दोलनों में मेरा विश्वास नहीं है। इनसे प्रेम की जगह द्वेष बढ़ता है। जब तक रोग का ठीक निदान न होगा, उसकी ठीक औषधि न होगी, केवल बाहरी टीम-टाम से रोग का नाश होगा।

अमर ने इस प्रलाप पर उपेक्षा-भाव से मुसकराकर कहा—--तो फिर हम लोग उस शुभ समय के इन्तजार में हाथ धरे बैठे रहें?

एक वार्डर दौड़कर कई कुरसियाँ लाया। सेठ जी और जेल के दो अधिकारी बैठे। सेठजी ने पान निकालकर खाया और इतनी देर में इस प्रश्न का जवाब भी सोचते जाते थे। तब प्रसन्नमुख होकर बोले--—नहीं, यह मैं नहीं कहता। यह आलसियों और अकर्मण्यों का काम है। हमें प्रजा में जाग्रति और संस्कार उत्पन्न करने की चेष्टा करते रहना चाहिए। हमारी पूरी शक्ति जाति की आत्मा को जगाने में लगनी चाहिए। मैं इसे कभी नहीं मान सकता कि आज आधी मालगुजारी होते ही प्रजा सुख के शिखर पर पहुँच जायेगी। उसमें सामाजिक और मानसिक कितने ही दोष हैं कि आधी तो क्या, पूरी मालगुजारी भी छोड़ दी जाय, तब भी उसकी दशा में कोई अन्तर न होगा। फिर मैं यह भी स्वीकार न करूँगा कि फ़रियाद करने की जो विधि सोची गयी और जिसका व्यवहार किया गया, उसके सिवा कोई दूसरी विधि न थी।

अमर ने उत्तेजित होकर कहा---हमने अन्त तक हाथ-पाँव जोड़े, आखिर मजबूर होकर हमें यह आन्दोलन शुरू करना पड़ा।

लेकिन एक क्षण में वह नम्र होकर बोला--संभव है हमसे ग़लती हुई हो; लेकिन उस वक्त हमें यही सूझ पड़ा।

सेठजी ने शान्ति-पूर्वक कहा---हाँ, ग़लती हुई और बहुत बड़ी गलती हुई। सैकड़ों घर बरबाद हो जाने के सिवा और कोई नतीजा न निकला। इस विषय पर गवर्नर साहब से मेरी बातचीत हुई है और वह भी यही कहते हैं कि ऐसे जटिल मुआमले में विचार से काम नहीं लिया गया। तुम तो जानते हो, उनसे मेरी कितनी बेतकल्लुफी है। नैना की मृत्यु पर उन्होंने खुद मातमपुरसी का तार दिया था। तुम्हें शायद मालूम न हो, गवर्नर साहब ने खुद उस इलाके का दौरा किया और वहाँ के निवासियों से मिले। पहले तो कोई उनके पास आता ही न था। साहब बहत हँस रहे थे कि ऐसी सूखी [ ४११ ]अकड़ कहीं नहीं देखी। देह पर साबित कपड़े नहीं है; लेकिन मिजाज यह है कि हमें किसी से कुछ नहीं कहना है। बड़ी मुश्किल से थोड़े-से आदमी जमा हुए। जब साहब ने उन्हें तसल्ली दी और कहा--—तुम लोग डरो मत, हम तुम्हारे साथ अन्याय नहीं चाहते, तब बेचारे रोने लगे। साहब इस झगड़े को जल्द तय कर देना चाहते हैं। और इसलिए उनकी आज्ञा है कि सारे कैदी छोड़ दिये जायँ और एक कमेटी करके निश्चय कर लिया जाय कि हम क्या करना है। उस कमेटी में तुम और तम्हारे दोस्त मियाँ सलीम तो होंगे ही, तीन आदमियों को चुनने का तुम्हें और अधिकार होगा। सरकार की ओर से केवल दो आदमी होंगे। बस मैं यही सूचना देने आया हूँ। मुझे आशा है, तुम्हें इसमें कोई आपत्ति न होगी।

सकीना और मुन्नी में कनफुसकियाँ होने लगीं। सलीम के चेहरे पर भी रौनक आ गयी; पर अमर उसी तरह शांत, विचारों में मग्न खड़ा रहा।

सलीम ने उत्सुकता से पूछा—--हमें अखतियार होगा, जिसे चाहें चुनें?

'पूरा।'

'उस कमेटी का फैसला अन्तिम होगा?'

सेठजी ने हिचकिचाकर कहा--—मेरा तो ऐसा ही खयाल है।

'हमें आपके खयाल की जरूरत नहीं। हमें इसकी तहरीर मिलनी चाहिए।'

'और तहरीर न मिले?'

'तो हमें मुआहदा मंजूर नहीं ?'

'नतीजा यह होगा कि यहीं पड़े रहोगे और रिआया तबाह होती रहेगी।'

'जो कुछ भी हो।'

'तुम्हें तो कोई खास तकलीफ नहीं है, लेकिन ग़रीबों पर क्या बीत रही है, वह सोचो।'

'खूब सोच लिया है।'

'नहीं सोचा।'

'सोच लिया है।'

'अच्छी तरह सोच लो।'

'खूब अच्छी तरह सोच लिया है।' [ ४१२ ]'सोचते तो ऐसा न कहते।'

'सोचा है इसीलिए ऐसा कह रहा हूँ।'

अमर ने कठोर स्वर में कहा—क्या कर रहे हो सलीम! क्यों हुज्जत कर रहे हो? इससे फायदा?

सलीम ने तेज़ होकर कहा—मैं हुज्जत कर रहा हूँ? वाह री आपकी समझ! सेठजी मालदार हैं हुक्कामरस हैं, इसलिए वह हुज्जत नहीं करते। 'मैं गरीब हूँ, कैदी हूँ, इसलिए हुज्जत करता हूँ!

सेठजी बुजर्ग हैं।'

'यह आज ही सुना कि हुज्जत करना बुजुर्गी की निशानी है।'

अमर अपनी हँसी को न रोक सका, बोला—यह शायरी नहीं है भाईजान कि जो मुंह में आया बक गये। ये ऐसे मुआमले हैं, जिन पर लाखों आदमियों की जिन्दगी बनती-बिगड़ती है। पूज्य सेठजी ने इस समस्या को सुलझाने में हमारी मदद की है, जैसा उनका धर्म था। और इसके लिए हमें उनका मशकूर होना चाहिए। हम इसके सिवा और क्या चाहते हैं कि गरीब किसानों के साथ इन्साफ़ किया जाय और जब उस उद्देश्य को पूरा करने के इरादे से एक ऐसी कमेटी बनाई जा रही है, जिससे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह किसानों के साथ अन्याय करे, तो हमारा धर्म है कि उसका स्वागत करें।

सेठजी ने मुग्ध होकर कहा—कितनी सुन्दर विवेचना है! वाह! लाट साहब ने खुद तुम्हारी तारीफ की।

जेल के द्वार पर मोटर का हार्न सुनायी दिया। जेलर ने कहा—लीजिए देवियों के लिए मोटर आ गयी। आइए, हम लोग चलें। देवियों को अपनी-अपनी तैयारियांँ करने दें। बहनो, मुझसे जो कुछ खता हुई हो, मुआफ़ कीजिएगा। मेरी नीयत आपको तकलीफ़ देने की न थी हाँ, सरकारी नियमों से मजबूर था।

सब-के-सब एक ही लारी में जायँ, यह तय हुआ। रेणुका देवी का आग्रह था। महिलाएँ अपनी तैयारियांँ करने लगीं। अमर और सलीम के कपड़े भी यही मँगवा लिये गये। आधे घण्टे में सब-के-सब जेल से निकले।

सहसा एक दूसरी मोटर आ पहुँची और उस पर से लाला समरकान्त, हाफ़िज़ हलीम, डा० शांतिकुमार और स्वामी आत्मानन्द उतर पड़े। [ ४१३ ]अमर दौड़कर पिता के चरणों पर गिर पड़ा। पिता के प्रति आज उसके हृदय में असीम श्रद्धा थी। नैना मानो आँखों में आँसू भरे उससे कह रही थी—भैया, दादा को कभी दुखी न करना, उनकी रीति-नीति तुम्हें बुरी भी लगे, तो भी मुँह मत खोलना। वह उनके चरणों को आँसुओं से धो रहा था, और सेठजी उसके ऊपर मोतियों की वर्षा कर रहे थे।

सलीम भी पिता के गले से लिपट गया। हाफिजजी ने आशीर्वाद देकर कहा—खुदा का लाख-लाख शुक्र है कि तुम्हारी कुरबानियाँ सुफल हुई। कहाँ है सकीना, उसे भी देखकर कलेजा ठंडा कर लूँ।

सकीना सिर झुकाये आयी और उन्हें सलाम करके खड़ी हो गयी। हाफिजजी ने उसे एक नज़र देखकर समरकान्त से कहा—सलीम का इन्तखाब तो बुरा नहीं मालूम होता।

समरकान्त मुसकराकर बोले—सूरत के साथ दहेज में देवियों के जौहर भी हैं।

आनन्द के अवसर पर हम अपने दुःखों को भूल जाते हैं। हाफिज़ जी को सलीम के सिविल सर्विस से अलग होने का, समरकान्त को नैना की मृत्यु का और सेठ धनीराम को पुत्र-शोक का रंज कुछ कम न था; पर इस समय सभी प्रसन्न थे। किसी संग्राम में विजय पाने के बाद योद्धागण मरनेबालों के नाम को रोने नहीं बैठते। उस वक्त तो सभी उत्सव मनाते हैं। शादियाने बजते हैं, महफिलें जमती हैं, बधाइयाँ दी जाती है। रोने के लिए हम एकान्त ढूंढ़ते हैं, हँसने के लिए अनेकांत।

मगर सब प्रसन्न थे। केवल अमरकान्त मन मारे हुए उदास था।

सब लोग स्टेशन पर पहुंचे, तो सुखदा ने उससे पूछा-तुम उदास क्यों हो?

अमर ने जैसे जागकर कहा——मैं! उदास तो नहीं हूँ।

'उदासी भी कहीं छिपाने से छिपती है?'

अमर ने गंभीर स्वर में कहा-उदास नहीं है, केवल यह सोच रहा हूँ, कि मेरे हाथों इतनी जान-माल की क्षति अकारण ही हुई। जिस नीति से अब काम लिया गया, क्या उस नीति से काम न लिया जा सकता था? उस जिम्मेदारी का भार मुझे दबाये डालता है। [ ४१४ ]सुखदा ने शान्त कोमल स्वर में कहा-मैं तो समझती हूँ, जो कुछ हुआ, अच्छा ही हुआ। जो काम अच्छी नीयत से किया जाता है, वह ईश्वरार्थ होता है। नतीजा कुछ भी हो। यज्ञ का अगर कुछ फल न मिले, तो भी यज्ञ का पुण्य तो मिलता ही है। लेकिन मैं तो इस निर्णय को विजय समझती हूँ, ऐसी विजय जो अभूतपूर्व है। हमें जो कुछ बलिदान करना पड़ा, वह उस जाग्रति के देखते हुए कुछ भी नहीं है, जो जनता में अंकुरित हो गयी है। क्या तुम समझते हो, इन बलिदानों के बिना यह जाग्रति आ सकती थी, और क्या इस जाग्रति के बिना यह समझौता हो सकता था ? मुझे तो इसमें ईश्वर का हाथ साफ नजर आ रहा है।

अमर ने श्रद्धा-भरी आँखों से सुखदा को देखा। उसे ऐसा जानपड़ा कि स्वयं ईश्वर इसके मन में बैठे बोल रहे हैं। वह क्षोभ और ग्लानि निष्ठा के रूप में प्रज्वलित हो उठी, जैसे कड़े-करकट का ढेर आग की चिनगारी पड़ते ही तेज और प्रकाश की राशि बन जाता है। ऐसी प्रकाशमय शान्ति उसे कभी न मिली थी।

उसने प्रेम-गद्गद कण्ठ से कहा--सुखदा, तुम वास्तव में मेरे जीवन का दीपक हो।

उसी वक्त लाला समरकान्त बालक को कन्धे पर बिठाये हुए आकर बोले--अभी तक तो काशी ही चलने का विचार है न?

अमर ने कहा---मुझे तो अभी हरिद्वार जाना है।

सुखदा बोली--तो हम सब वहीं चलेंगे।

समरकान्त ने कुछ हताश होकर कहा-- अच्छी बात है। तो जरा में बाजार से सलोनी के लिए साड़ियाँ लेता आऊँ।

सुखदा ने मुस्कराकर कहा--सलोनी ही के लिए क्यों ? मुन्नी भी तो है।

मुन्नी इधर ही आ रही थी। अपना नाम सुनकर जिज्ञासा-भाव से बोली--क्या मुझे कुछ कहती हो बहूजी ?

सुखदा ने उसकी गरदन में हाथ डालकर कहा--मैं कह रही थी, अब मुन्नी देवी भी हमारे साथ काशी रहेंगी !

मन्त्री ने चौंककर कहा--तो क्या तुम लोग काशी जा रहे हो? [ ४१५ ]सुखदा हँसी--और तुमने क्या समझा था?

'मैं तो अपने गाँव जाऊँगी।

'हमारे साथ न रहोगी ?'

'तो क्या लाला काशी जा रहे हैं ?'

'और क्या ? तुम्हारी क्या इच्छा है ?

मुन्नी का मुंह लटक गया--कुछ नहीं, यों ही पूछती थी।

अमर ने उसे आश्वासन दिया—नहीं मुन्नी, यह तुम्हें चिढ़ा रही हैं। हम सब हरिद्वार चल रहे हैं।

मुन्नी खिल उठी।

'तब तो बड़ा आनन्द आयेगा। सलोनी काकी मूसलों ढोल बजायेगी।'

अमर ने पूछा--अच्छा, तुम इस फैसले का मतलब समझ गयीं ? 'समझी क्यों नहीं ? पाँच आदमियों की एक कमेटी बनेगी, वह जो कुछ करेगी, उसे सरकार मान लेगी। तुम और सलीम दोनों उस कमेटी में रहोगे। इससे अच्छा और क्या होगा !' ..

'बाकी तीन आदमियों को भी हमी चुनेंगे।'

'तब और भी अच्छा हुआ।

'गवर्नर साहब की सज्जनता और सहृदयता है।'

'तो लोग उन्हें व्यर्थ बदनाम कर रहे थे ?'

'बिल्कुल व्यर्थ ।'

'इतने दिनों के बाद हम फिर अपने गाँव में पहुँचेंगे। और लोग भी तो छूट आये होंगे?'

'आशा है। जोन आये होंगे उनके लिए लिखा-पढी करेंगे।'

'अच्छा, उन तीन आदमियों में कौन-कौन रहेगा?'

'और कोई रहे या न रहे, तुम अवश्य रहोगी।'

'देखती हो बहूजी, यह मुझे इसी तरह छेड़ा करते हैं।'

यह कहते-कहते उसने मुंह फेर लिया। आँखों में आँसू भर आये थे।