कोड स्वराज/ दी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स (भारत) के समक्ष भाषण के बाद की अतिरिक्त टिप्पणियां

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कोड स्वराज
द्वारा कार्ल मालामुद

[ १५ ]दी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स (भारत) के समक्ष भाषण के बाद की अतिरिक्त टिप्पणियां


सैम पित्रोदा, अहमदाबाद, 3 अक्टूबर 2016


[भाषण निष्कर्ष]


धन्यवाद!


[तालियाँ]


मेरा एक मित्र हैं जो पिछले 25 या 30 वर्षों से इंटरनेट पर काम कर रहे हैं। इंटरनेट पर पहला रेडियो स्टेशन कार्ल ने बनाया था।


[तालियाँ]


कार्ल एक सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं। वे सरकारी जानकारी जुटाते हैं और उसे सार्वजिनक तौर पर सुलभ कराते हैं। सरकार नहीं चाहती है कि उसकी सूचना सार्वजनिक हो, इसलिए कार्ल एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी संस्था चलाते हैं।


उदाहरण के लिए, भारत में निर्माण, सुरक्षा, बच्चे के खिलौने और मशीन के लिए भारतीय मानक ब्युरो की ओर से 19,000 मानक हैं। ये मानक भारतीय मानक ब्यूरो की ओर से । प्रकाशित किए जाते हैं, लेकिन ये जनता के लिए उपलब्ध नहीं हैं। जनता को इन्हें खरीदना पड़ता है।


हम मानकों को पूरे विश्व में सार्वजनिक बनाने का प्रयास कर रहे हैं। हमने भारत में कुछ मानक खरीदें और कार्ल ने उन्हें इंटरनेट पर डाल दिया। भारत सरकार घबरा गई, कहा कि, “आप ऐसा नहीं कर सकते हैं। ये कॉपीराइट का उल्लंघन है।" यह मानक सुलभ हैं। पर यह मानक उनका नहीं है। ये जनता के मानक हैं क्योंकि जनता ने इस पर पैसा लगाया है और अपेक्षा की जाती है कि जनता को इसकी जानकारी हो।


वे सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं, आप ऐसा नहीं कर सकते हैं। इसके लिए आपको भुगतान करना होगा।” यदि आप कोई निर्माण मानक खरीदना चाहते हैं, तो आपको 16,000 रुपये भुगतान करना होगा। यदि आप भारत के बाहर रहकर भारतीय निर्माण मानक खरीदना चाहते हैं तो 1,60,000 रुपये देने होंगे।


यदि मैं सिविल इंजीनियरिंग का छात्र होता और निर्माण मानकों को सीखना चाहता तो मुझे भारत सरकार से मानकों को खरीदने की जरूरत होती। हम कह रहे हैं, “नहीं, यह सूचना जनता की है।” कार्ल ने भारत सरकार पर मकदमा किया है। मामला अभी भी न्यायालय में
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विचाराधीन है। हम कह रहे हैं, “यह स्थिति हरेक देश की है और पूरी तरह से सत्य है। यह अमेरिका में भी सत्य है क्योंकि सरकार नहीं चाहती है कि आप इन सब बारे में जानें।”


प्रत्येक स्तर पर यह लड़ाई चलती रहती है। हम इस संघर्ष को यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में भी कर रहे हैं।


[तालियाँ]


डिजिटल डेपलपमेंट की क्रांति में शामिल होने के लिए हमें ऐसे लोगों की जरूरत है। डिजिटल डेवलमेंट, सिर्फ हार्डवेयर या सॉफ़्टवेयर नहीं है, बल्कि यह इसी तरह की कोशिश भी इसमें शामिल है। आपके स्वास्थ्य डाटा पर किसका स्वामित्व होता है? यह वैश्विक स्तर पर एक बड़ा मुद्दा है। आप अपने स्वास्थ्य डाटा की गोपनीयता और चोरी के मुद्दे के बारे में क्या करेंगे? लेकिन मुख्य चुनौती ओपन सिस्टम, ओपन सरकार, ओपन प्लेटफोर्म, और ओपन सॉफ्टवेयर की हैं।


कल मैंने गांधी आश्रम में पूरे दिन अहिंसा पर बात की। गांधीजी ओपन गवर्नमेंट प्लेटफॉर्म को पसंद करते। गांधीजी जरुर ही ओपन-सोर्स सॉफ्वेयर को विशेष महत्व देते। अगर गांधीजी आज होते तो वे ट्वीट कर रहे होते और फेसबुक पर भी होते। गांधीजी ने ब्लॉग लिखा होता क्योंकि यह मीडिया, प्रकाशन, प्रिटिंग और समाचार-पत्र से जुड़ा है।


हम बात कर रहे हैं कि सरकार इस सूचना को कैसे अपने पास संजो के रख सकती है? हमें इसके लिए लड़ना होगा। हमें आज की डिजिटल दुनिया में सत्याग्रह और गांधीवादी दृष्टिकोण अपनानी होगी। सत्याग्रह का अर्थ, कोर्ट केस और याचिका दायर करना है और सरकार को यह बताना है कि, “आप गलत हैं, जनता सही है।” यह सूचना जनता की है, न कि आपकी अपनी निजी सूचना है। यह डिजिटल डेवलपमेंट का भी हिस्सा है। मुझपर भरोसा करें कई लोग इसे भलि-भांति समझते हैं।


पूरे विश्व में मुट्ठी भर लोग ही ऐसे है जो इस महत्वपूर्ण मुद्दे को समझ सकते हैं। इन सबकी कुछ न कुछ भूमिका है। हमलोगों के दोस्तों का एक समूह है और मैं ‘वर्ल्ड वाइड वेब' के बोर्ड में हूँ। मेरे साथ इस बोर्ड में, वेब के निर्माता टिम बर्नर्स-ली' (Tim Berners-Lee) भी हैं। । मैं इनके साथ वेब के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने में कार्यरत हूँ।


हमारे साथ काम करने वाले एक और मित्र 'विनटन सर्फ' (Vinton Cerf) हैं जो इंटरनेट के जनक हैं। जहाँ टिम बर्नर्स ली वेब के जनक हैं वहीं और विनटन सर्फ इंटरनेट के जनक हैं।


आपको इन सभी लोगों के साथ काम करने की जरूरत है। आपको इन मुद्दों को भली-भांति से समझने के लिए भी उनके साथ काम करने की जरूरत है। और ये सभी आपके प्रिय कार्य (labor of love) होने चाहिये। यह नौकरी नहीं है। कोई भी आपको नौकरी में विंट सर्फ के साथ काम करने नहीं भेजेगा। यह कोई सरकारी पद नहीं है जहाँ कोई यह कहेगा कि "जाओं, अब तुम वेब के आविष्कारक को अपना दोस्त बनाओ।" लेकिन आपको इस तरह का काम करना होगा। किसी न किसी को तो यह काम करना ही होगा। [ १७ ]दी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स (भारत)


कार्ल और मैंने एक लम्बा समय एक साथ बिताया है। वे पिछले 6-7 साल से मेरे साथ रह रहे हैं। उनके लिए भारत में केस दायर करना, उनका काम नहीं है। वे यहां केस लड़ने के लिए नहीं आना चाहते हैं, लेकिन किसी न किसी को तो ऐसा काम करना होगा।


यह लोकहित में है। यह एक जनहित याचिका है। लेकिन यहाँ ऐसा काम नहीं हो पा रहा है। डिजिटल इंडिया को साकार करने के लिए हमें ऐसे गांधीवादी सत्याग्रहियों की जरूरत है। धन्यवाद।


कार्ल, क्या आप यहां मंच पर आएगें? कुछ लोग आपको एक भेट देना चाहते हैं -


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मैं भूल गया, कार्ल के पास यह छोटा सा पैकेट भी है। इस पैकेट में एक डिस्क है, जिसमें भारतीय स्वतंत्रता काल की 90,000 तस्वीरें हैं।


[प्रशंसा]


गांधीजी के साथ, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस जैसे सभी लोग की तस्वीरें हैं। इनके अलावा स्वराज इंडिया पर 4,00,000 पृष्ठों के दस्तावेज हैं।


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इनमें 19,000 भारतीय मानक (स्टैन्डर्स) भी हैं।


[तालियाँ]


ये सब 435 GB (गीगाबाइट) मेमोरी में है। मैं चाहता हूँ कि कार्ल उन सभी को यह, उपहार स्वरूप दे।


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[इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स को, डिस्क ड्राइव उपहार स्वरूप प्रदान किया गया]


[कार्ल को फूलों की प्रस्तुति]


[सभा के अंतिम के प्रश्नोत्तर सत्र में, कार्ल के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उन्हें अन्य अतिथियों के साथ मंच पर बुलाया गया।] [ १८ ]

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दी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स (भारत) परिचर्चा के बाद सैम पित्रोदा ने फोटो खिंचवाएं।
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चर्चा के बाद की अनूठी भीड़
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सैम के पास एक टेराबाइट डिस्क ड्राइव है, जिसमें ‘हिंद स्वराज' के संकलन के साथ 19,000 भारतीय मानक भी है।
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‘गांधी ड्राइव' के 10 ड्राइवों में से 4 को बनाई जा रही है। प्रत्येक एक टेराबाइट ‘वेस्टर्न डिजिटल ड्राइव में 19,000 मानक, महात्मा गांधी का संग्रहित लेख, 129 ‘एयर इंडिया ब्रॉडकास्ट्स' और 12,000 फोटो भी शामिल हैं।
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प्रत्येक ड्राइव सूती कपड़े से ढकी है और उस पर गांधी जी की पैदल यात्रा की तस्वीर है, फिर उसे प्रामाणित लाल-फीते में रखा जाता है।
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कार्ल मालामुद ने गुजरात विद्यापाठ के कुलपति अनामिक शाह को 'गांधी डिस्क ड्राइव' भेंट की।

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राजस्थान के केंद्रीय विश्वविद्यालय के उप-कुलपति को उपहार की प्रस्तुति (प्रेजेंटेशन)
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'बेयरफुट कॉलेज' के संस्थापक श्री बंकर राय को उपहार की प्रस्तुति
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‘गांधी डिस्क ड्राइव' के साथ साबरमती आश्रम की दीना पटेल।


PD-icon.svg यह कार्य भारत में सार्वजनिक डोमेन है क्योंकि यह भारत में निर्मित हुआ है और इसकी कॉपीराइट की अवधि समाप्त हो चुकी है। भारत के कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के अनुसार लेखक की मृत्यु के पश्चात् के वर्ष (अर्थात् वर्ष 2021 के अनुसार, 1 जनवरी 1961 से पूर्व के) से गणना करके साठ वर्ष पूर्ण होने पर सभी दस्तावेज सार्वजनिक प्रभावक्षेत्र में आ जाते हैं।

यह कार्य संयुक्त राज्य अमेरिका में भी सार्वजनिक डोमेन में है क्योंकि यह भारत में 1996 में सार्वजनिक प्रभावक्षेत्र में आया था और संयुक्त राज्य अमेरिका में इसका कोई कॉपीराइट पंजीकरण नहीं है (यह भारत के वर्ष 1928 में बर्न समझौते में शामिल होने और 17 यूएससी 104ए की महत्त्वपूर्ण तिथि जनवरी 1, 1996 का संयुक्त प्रभाव है।

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