खग्रास/गुप्त बातचीत
लिजा अपने सुसज्जित कमरे मे तरुण को ले गई। अलस भाव से वह एक सोफे पर पड़ गया। ऐसा प्रतीत हुआ कि वर्षों बाद उसे इस तरह आराम से बैठना नसीब हुआ जबकि उसके सब अग उन्मुक्त थे। लिजा ने वोदका का जाम उसके होठों पर लगा दिया, और वह एक ही सास मे उसे पी गया।
इसके बाद एक बार उसने जाकर अपने कमरो का भी निरीक्षण किया जिन्हें उसने हर तरह व्यवस्थित और आराम-देह पाया। भारत की राजधानी का यह अशोक होटल अद्वितीय होटल है। सब आधुनिक साज सज्जा से सज्जित है। फिर लिजा की पसन्द, सुरुचि और व्यवस्था के क्या कहने। लिजा के किसी काम मे कोई कैसे मीन मेख निकाल सकता था। लिजा के कमरे से लौट कर तरुण ने कहा--"लिजा, मैं धन्य हूँ कि मुझे तुम्हारा सहयोग मिला। किन्तु क्या यह अच्छा नही होगा कि तुम अपनी सहायता के लिए किसी को नौकर रख लो।"
"तुमने मास्को मे भी यही बात कहीं थी। पर तुम जानते हो कि हम छद्मनाम से कितनी महत्वपूर्ण और नितान्त गोपनीय कार्यवाइया कर रहे है, केन्द्र से हमे सब कुछ नितान्त गोपनीय रखने के सख्त आदेश प्राप्त हैं। फिर ऐसी हालत में किसी तीसरे व्यक्ति का हमारे बीच रहना सर्वथा अवाच्छनीय है। किसी भी क्षण कोई अनहोनी घटना हो सकती है। उससे यदि हम दोनों की या किसी एक की तत्काल मृत्यु भी हो जाए तो वह योही कोई प्रेम का मामला या और साधारण व्यक्तिगत बात कह कर उड़ा दी जा सकती है, पर यदि किसी तीसरी आँख का जरा भी शक शुबहा हुआ तो सोवियत विज्ञान सघ के महान् आविष्कारो का भण्डाफोड़ हो जाएगा।"
“यह तो, डालिङ्ग, तुमने ठीक कहा, परन्तु क्या तुम्हें किसी बात का यहाँ खटका है?"
"खटका? तुम खटके की बात कहते हो, मैं कहती हूँ कि हमारे प्राण किसी भी क्षण लिए जा सकते है। हमारे पीछे पृथ्वी और आकाश में जासूसो का जाल बिछा है।" "क्या वे अमेरिकन है?"
"खामोश, जबान मे कोई शब्द निकालने से प्रथम अच्छी तरह सोचविचार लिया करो। हमे इस बात से क्या सरोकार है कि वे किस देश के हैं। हमारे लिए यही जानना यथेष्ट है कि वे हमारे शत्रु ओ द्वारा तैनात है।"
"तुम ठीक कहती हो डार्लिंग, हकीकत मे मै बड़ा असावधान हूँ। लेकिन अब मुझे तुम आध घन्टे का अवकाश दो ताकि मैं मास्को अपनी रिपोर्ट भेज सकू।"
लिजा ने एक नज़र अपनी कलाई की घड़ी पर डाली और उठते हुए कहा, "बहुत ठीक, तब तक डिनर का वक्त भी हो जाएगा। हम सार्वजनिक भोजनालय ही मे चल कर भोजन करेगे।"
ज़ोरोवस्की भी उठ खड़ा हुआ। उसने कहा, "ठीक है, लेकिन माई लव, एक चुम्बन तो मै अवश्य लूगा।" उसने खीचकर लिजा को अपने वक्ष से सटा लिया और उसके लाल-लाल अधरो पर अपने जलते हुए ओठ रख दिए। लिजा ने अपनी भुजवल्लरी उसके कण्ठ मे डालकर प्रतिचुम्बन लिया और हसते हुए कहा, 'मैं उधार खाता नहीं रखती, बस लेन-देन बराबर।"
लेकिन ज़ोरोवस्की ने बिजली की भाति लपककर उसे ऊपर उठा लिया और तडाक से एक और चुम्बन लेकर कहा, "मुझे तो उधार खाते की पुरानी आदत है, डार्लिंग। लेनदेन बराबर करना ठीक नही है।"
लिजा हस दी। एक शरारत भरी नज़र उसने तरुण पर डाली और द्वार तक उसे छोड़ गई।
अपने गुप्त कमरे मे जाकर जब ज़ोरोवस्की भीतर से ताले मे चाभी घुमाने लगा, तो उसने किवाड़ की दगर से मुस्करा कर कहा, "सावधान रहना प्रिये।"
"निश्चिन्त रहो, तुम्हारे द्वार पर मेरी एक हजार आँखें है और यह यन्त्र मेरे कानो पर लगा है जिससे मुझे यह पता लगता रहेगा कि विश्व में कही कोई गुप्त रहकर तो तुम्हारी बात नही सुन रहा। और तुम इत्मीनान रखो कि वह चोर पृथ्वी पर चाहे जहा भी हो, तत्क्षण मौत का शिकार हो जायगा। उसने जेब से हाथ बाहर निकाल कर अपने हाथो का एक छोटा सा यन्त्र दिखाया तथा आँखो-आँखों मे एक गुप्त सकेत किया।
अभिप्राय समझकर जोरोवस्की ने कहा, "किन्तु प्रिये, जल्दी न करना। जितनी अनिवार्यत आवश्यक हो उतनी हीव कार्यवाही हमें करनी चाहिए। केन्द्र का हमे यही आदेश है।"
"ओह, वह मैं जानती हूँ। और मुझे, ससार मे हमारे कौन-कौन और कहाँ कहाँ मित्र है, यह भी ज्ञात है। तुम निश्चिन्त रहो।" जोरोवस्की ने द्वार मे चाभी धुमादी और लिजा क्षणभर वही खड़ी रही। फिर एक सूक्ष्म तार का सिरा कार्पेट उठाकर उसने अपने यन्त्र से जोड़ा और अपने कमरे मे तेजी के साथ चली गई।
सार्वजनिक भोजनगृह मे इस असाधारण युगल मूत्ति ने सब लोगो के साथ भोजन किया। भोजन का कमरा देश विदेश के सम्भ्रान्त स्त्री पुरुषों से खचाखच भरा था। छुरी कॉंटे की खटाखट के साथ आरकेस्ट्रा वाद्य ध्वनि, और लोगों की धीरे धीरे बात करने की मर्मर ध्वनि सब मिलकर वहाँ के धीमे पीले वातावरण को अत्यन्त प्रभावशाली बना रहे थे। सब लोगों की भाँति ये दोनो भी ऋतु तथा दिल्ली की दर्शनीय वस्तुप्रो के सम्बन्ध मे जबतब बातें कर लेते थे। लिजा ने जर्द रङ्ग का अमेरिकन स्टाइल का झाक पहना था। इस वेश मे वह भोजनालय के उस मन्द पीत प्रकाश मे अत्यन्त मोहक अँच रही थी। जोरोवस्की ने जरा झुककर सूप का सिप लेते हुए मन्द स्वर से कहा--"लिजा डार्लिंग, क्या तुम कह सकती हो कि यहां बैठे हुए कुछ लोगो की हम मे दिलचस्पी है?"
"तुम मे दिलचस्पी है या नहीं, परन्तु दो व्यक्ति यहाँ ऐसे बैठे हैं जो मुझमे गहरी दिलचस्पी रखते है। उनमे एक वह उस कोने मे टेबल पर तुम्हारे दाहिनी बाजू पीछे की ओर बैठा है मगर तुम मुँह फेर कर देखने मत लगना।"
"नहीं, पर वह" मेरे सामने भी एक आदमी बैठा है, जो नज़र छिपाकर हमे घूर रहा है।"
"वह लम्बा आदमी न, जिसकी तरासी हुई छोटी छोटी मूँछे है। सुर्ख टाई बाँधे है।"
"वही है। उसे कुछ अचरज और गुस्सा भी हो रहा है।"
"जरूर होगा। तीन दिन से वह मेरे साथ इसी टेबल पर खाना खाता था। आज भी उसे यही आशा थी। पर उसके आने से पहले ही तुमने उसकी कुर्सी दखल कर ली।"
"ठीक है। गुस्सा होने की बात ही है। लेकिन मेरे पीछे कौन है?"
"उठने के बाद देख लेना, वह ज्यादा गहरा आदमी प्रतीत होता है, वह मोटा ठिगना-सा आदमी काला अमेरिकन सूट पहने बैठा है।"
"क्या अमेरिकन है?" ठीक नही कह सकती। उच्चारण तो उसका अंग्रेज़ जैसा है।" "तुम्हारी उससे मुलाकात कहाँ हुई?"
"हागकाग में। तुम्हे तो मालूम है, मैं कोरिया और चीन की राह आ रही हूँ। वह दिल्ली तक मेरे साथ ही आया है।"
"हाँ, हाँ, खैर मैं उसे देख लूँगा। लेकिन अब हमे शायद यहाँ से जल्द ही रवाना होना पड़ेगा। और इसी बीच इन दोनो दोस्तो को खूब जाँच परख लेना है। लो वह तो इधर ही आ रहा है।"
थोड़ी ही देर मे उस लाल टाई वाले व्यक्ति ने लिजा को झुककर अभिवादन किया और जोरोवस्की की ओर तनिक झुककर कहा—"मुझे क्षमा कीजिए महाशय। लेकिन मिस, आप शायद यह रूमाल कल टेबल पर ही भूल गई थी।"
"बहुत बहुत धन्यवाद मिस्टर स्मिथ, कृपा कर बैठ जाइए। इनसे मिलिए मेरे साथी हैं जोरोवस्की।" दोनो आदमियों ने खड़े होकर हाथ मिलाया। लिजा उठ खड़ी हुई। उसने कहा—"आप लोग गप्पे लडाइये। मैं जरा आराम करूँगी।" वह चली गई। नए दोस्त खूब हँस हँसकर गप्पे लडाने और शराब पीने लगे।
स्मिथ ने हॅसते हुए कहा—"आपके स्पूतनिक की तो दुनियाँ मे खूब धूम मची हुई है साहब, हकीकत मे रशियन वैज्ञानिको ने कमाल कर दिखाया है।"
"मैं तो समझता था कि अमेरिका भी पीछे न रहेगा। सुना है, अमेरिका जल्द ही फिर उपग्रह छोड़ रहा है" जोरोवस्की ने मुस्कराकर कहा।
"दुर्भाग्य से हमारे दो प्रयोग असफल हुए। परन्तु हम निरन्तर उद्योग कर रहे है।"
"कामना करता हूँ कि अमेरिका को सफलता मिले। देखिए, वह महिला इधर ही को आ रही है।"
दोनो बाते बन्द करके उसी की ओर देखने लगे। वह स्त्री जब उनके पास से गुजरी तो स्मिथ ने उठकर नमस्कार किया। उसने मुस्कराकर प्रतिनमस्कार किया और चली गई।
जोरोवस्की ने कहा—"बहुत सुन्दर है। क्या आप उसे जानते है?"
"यह कोई रानी है। खूब ठाठ है इसके।"
"मैने तो सुना है कि भारतीय राजा रानियो के बड़े ठाठ-बाट होते थे?"
"वे दिन तो अब लद गए, पर अब भी आप इन रानी साहिबा के ठाठ देखेंगे तो दङ्ग रह जायेगे।"
"क्या आप इनसे परिचित है?"
"यो ही थोड़ा बहुत। इनके कमरे उसी मजिल पर है जिस पर मेरे है।"
"तब तो आप बड़े खुशकिस्मत है, मिस्टर स्मिथ। क्या आपको कभी किसी राजा महाराजा का मेहमान बनने का अवसर मिला है?" "नही, कभी नही। लेकिन मै हीरो का व्यापार करता हू। उस सिलेसिले मे बहुधा मेरी भेट राजा महाराजाओ से हो जाती थी, पर अब वे सब बाते तो हवा हो गई।"
"क्यो? यह रानी साहिबा जो मोतियो का नेकलेस गले मे पहने है, वह दो लाख से कम कीमत का क्या होगा?"
"अच्छा! देखता हूँ आप भी अच्छे खासे जौहरी है। पर यह कीमत आपने खालिस नेकलेस की लगाई है या जिस गले मे वह पडा है, उसकी कीमत भी इसमे सम्मिलित है।"
जोरोवस्की ने हँसते हुई कहा--"जैसा आप समझे। लेकिन घोडी के साथ ही जीन की भी कीमत होती है।"
"बहुत खासे। समझ गया, आप है दिलफेक। मुझे ऐसे आदमी पसन्द है। कहिये तो आपकी इनसे मुलाकात करा दूं?"
"क्या हर्ज है। एक बार फिर उनके कीमती मोतियो को देखने का अवसर मिल जायेगा।"
"खैर देखा जाएगा। लीजिए, ये फिर इधर ही को आ रही है।" स्मिथ कुर्सी छोडकर उठ खडा हुआ। जोरोवस्की भी उठ खडा हुआ।
वह सुन्दरी जब निकट आई तो एक मधुर मुस्कान डालती हुई चलने लगी। स्मिथ ने जरा आगे बढकर कहा--"आप कुछ परेशान नजर आ रही है, क्या मैं कुछ आपकी सहायता कर सकता हूँ?"
"धन्यवाद। आपकी बडी कृपा है। बात यह है कि मेरे नौकर का पता ही नही लग रहा। न जाने कहाँ गायब हो गया है। मुझे यह चिट्ठी अभी डाक मे भेजनी है।"
"तो मुझे दीजिए, मै अभी पोस्ट कर पाता हूँ।"
"नही, नही, आप क्यो कष्ट करेंगे, न होगा तो मैं खुद"
अब जोरोवस्की ने आगे बढकर कहा--"मेरी बेअदबी माफ हो, यह सेवा मुझे करने की प्रतिष्ठा दीजिए।"
युवती हँस दी। उस हास्य मे उसके मोतियो को लजानेवाले दाँतो की बहार युवक की ऑखो मे चकाचौध मचा गई। स्मिथ ने अवसर पाकर कहा--"ये है मेरे रूसी युवक मित्र जोरो."
"जोरोवस्की।"
"जी हॉ, ये आपके अद्भुत मोतियो की अभी अभी सराहना कर रहे थे और चाहते थे कि एक बार अच्छी तरह उन्हे देखे। ये बडे अच्छे रत्न पारखी है।"
"तो ये और आप आज रात मेरे साथ भोजन करने की कृपा करे।"
"बहुत खुशी से, लेकिन एक शर्त पर।"
"वह कौनसी?"
"कि यह चिट्ठी पोस्ट करने को मुझे दे दे।" जोरोवस्की ने कहा।
"लीजिये," युवती ने हँसते हँसते चिट्ठी युवक के हाथ मे पकडाकर कहा, "ठीक आठ बजे हम यहाँ लाउन्ज मे मिलेंगे।"
"बहुत अच्छा, नमस्कार।"
युवती ने भारतीय पद्धति से दोनो को नमस्कार किया और उसी तरह इठलाती हुई चली गई।
रानी के चले जाने पर भी ये दोनो नवीन दोस्त बडी देर तक शराब और सिगरेट पीते रहे। थोडी देर बाद स्मिथ, जैसे एकाएक कोई बात याद हो आई हो, इस तरह कहने लगा--"माफ कीजिये, मुझे एक जरूरी काम याद आ गया, अब आज्ञा चाहता हूँ। भोजन के समय हमारी फिर मुलाकत होगी।"
"जरूर, जरूर।"
स्मिथ नमस्कार करके चला गया। जोरोवस्की ने होटल के प्रधान वेटर को बुलाकर कुछ बाते पूंछी और वह भी फिर वहाँ से उठकर चला गया। मास्को का खब्ती वैज्ञानिक
अब से कोई पचास बरस पूर्व मास्को के एक खराब खस्ता मकान की चौथी मजिल मे एक तग और अधेरे कमरे मे, जिसकी खिडकियो के शीशे टूटे हुए थे, एक अधेड अवस्था का पुरुष अस्तव्यस्त कपडे पहने किसी धुन मे एक साधारण मेज के पास बैठा पेन्सिल से एक कागज पर टेढी-मेढी रेखाएँ खीच रहा था। कभी उसके माथे पर बल आ जाते, कभी होठो पर मुस्कान फैल जाती, कभी वह बेचैन सा होकर कुर्सी पर से उछल कर खड़ा हो जाता था। यह अर्द्धविक्षिप्त-सा व्यक्ति महान् वैज्ञानिक स्त्यत्कोव्स्की था। वर्षों से यह व्यक्ति वायुमण्डलीय सीमा पार ब्रह्माण्ड यात्रा सम्बन्धी प्रश्नो का हल करने मे लगा था। वह आम तौर पर उससे मिलने आने वाले मित्रो से राकेट के द्वारा ब्रह्माण्ड की उडानो की चर्चा किया करता और वे उसकी बाते सुनकर खूब हंसते थे। मित्रो की हँसी पर कभी वह क्रुद्ध हो जाता और कभी गम्भीर होकर उन्हे समझाता कि अन्तर-तारक समस्याओ का समाधान करके किस प्रकार कृत्रिम उपग्रह छोडा जा सकता है।
धीरे-धीरे वैज्ञानिक उसकी बातो मे सत्यता का आभास पाने लगे और उनका एक दल स्त्यत्कोव्स्की के साथ मिलकर विविध वैज्ञानिक और इन्जीनियरिंग सम्बन्धी जटिल समस्या का समाधान करने लगा। बहुधा वे सब मिलकर रात रात भर बहस करते रहते। जारशाही का जमाना था जब बडी से बडी शक्तियां ऐश, मौजो और शराबखोरी मे लगी थी। जनता निरीह, दरिद्र और भुखमरी का शिकार हो रही थी। एकतन्त्री शासन था, जहाँ मनुष्य के प्राणो का मूल्य मक्खी के बराबर भी न था। कौन इस खब्ती वैज्ञानिक को सहारा देता? वे लोग बहुधा एक कृत्रिम ग्रह के डिजाइन और उसे आकाश कक्षा मे ले जाने वाले वाहक राकेट की चर्चा करते। अन्तत उन्होंने एक इतने बडे शक्तिशाली इजन का डिजाइन बना ही लिया जो आकाश की तीव्रतम-ताप-अवस्थामो मे भी काम कर सके। राकेट की गति और उसके सफल प्रयोग के लिए अधिक से अधिक अवस्थाओ का हिसाब लगाया गया और अत्यन्त सूक्ष्म शक्तिशाली, अपने आप चलने और नियन्त्रण रखने वाले यन्त्रो की रूपरेखा रची गई जो राकेट को प्रक्षेप-वक्र द्वारा आकाश मे ले जा सके।
समय बीतता चला गया। पृथ्वी पर दो महा भीषण सग्राम हुए। रूस मे महान् क्रान्ति के दर्शन हुए और महान् वैज्ञानिक स्त्वत्कोव्स्की के स्वप्न सोवियत संघ मे क्रियात्मक रूप मे साकार होते चले गए। विज्ञान और इजीनियरिग के क्षेत्रो मे असाधारण सयुक्त प्रयोग हुए और राकेट-निर्माण टेक्नीकल उन्नति की चरम सीमा तक पहुंचा। सोवियत संघ मे उच्च वैज्ञानिक विचारणा, अन्वेषण सस्थाओ का सुसगठन, डिजाइनिग विभागो और व्यावसायिक औद्योगिकता के विकास ने अन्तत एक उपग्रह का निर्माण सचमुच ही कर डाला। इसके छोडे जाने से पूर्व इसके डिजाइन के बारे में बड़े व्यापक परीक्षण किए गए। ऐसी व्यवस्था की गई कि वह अपने पृथक् पृथक् भागो और उनके समूह रूप मे एक सुसचालित यन्त्र के रूप मे काम कर सके। उपग्रह की सफल यात्रा से सम्बन्धित गणित के हिसाबो और वाहक-राकेट और उपग्रह की डिजाइनिंग सम्बन्धी टेक्नीकल समस्याओ की मूलभूत शुद्धता का अत्यन्त सावधानी से विचार किया गया।
उपग्रह का यह निर्माण अन्तर-तारक आकाश और ब्रह्माण्ड उडान सम्बन्धी समस्याओ की विजय की ओर पहला कदम था। अन्तत ४ अक्टूबर १९५७ के दिन सारे ससार ने सोवियत संघ द्वारा छोडे हुए इस कृत्रिम भू-उपग्रह को देखा। जब इसके वाह्य अन्तरिक्ष मे छोडने की घोषणा ससार ने सुनी तो ससार के सब महाद्वीपीय निरीक्षको ने इसकी व्योम मण्डल की यात्रा को अकित किया। वह क्षण मानव जाति की उत्सुकता का महानतम क्षण था। इस घटना ने मानव मस्तिष्क को विज्ञान के एक नए शुभ और रचनात्मक दृष्टिकोण पर केन्द्रित कर दिया। और उसकी ध्वसात्मक भीषणतम विभीषिकाएँ, जिनमे विश्व की महत्तम शक्तियाँ व्यस्त थी, फीकी पड़ गई। मानव मस्तिष्क एक नए उत्थान, नई भावना, नई आशा से भर उठा।
इस कृत्रिम भू-उपग्रह का आकार गोल था। यह एक वाहक-राकेट के अगले भाग मे लगा था तथा उसका रक्षा-शकु ढका हुआ था। इस वाहकराकेट को आकाश मे शिरोबिन्दु की ओर छोडते ही यह धीरे-धीरे ऊपर लम्ब की ओर एक विशेष कक्षा मे कई सौ किलोमीटरो की ऊँचाई पर पहुच कर ८ हजार मीटर प्रति सेकेण्ड की गति से पृथ्वी के समानान्तर चक्कर काटने लगा। जब इसके इजनो ने काम करना बन्द कर दिया तो रक्षा-शकु उससे अलग हो गया और उससे लगा कृत्रिम भू-उपग्रह स्वतन्त्र रूप से अन्तरिक्ष मे विचरण करने लगा।
स्पूतनिक
इस भू-उपग्रह का नाम स्पूतनिक था।
इसकी कक्षा लगभग ऊनेन्द्र थी जिसके नाभीफनो मे से एक एक पृथ्वी केन्द्र मे थी। इस उपग्रह के प्रक्षेप-वक्र की ऊँचाई स्थायी न थी। समय-समय पर वह १ हजार किलोमीटर तक के उच्चतम बिन्दु पर पहुँच जाती थी। उसके छोडने के और अन्तरिक्ष मे पृथ्वी के चारो ओर विचरण करने के समय उसकी कक्षा का भू-समीपतम बिन्दु उत्तरीय गोलार्द्ध मे, और भू-दूरतम बिन्दु दक्षिणी गोलार्द्ध मे था। स्थिर-तारको के सम्बन्ध मे कक्षा-पृष्ठ का अनुस्थिति ज्ञान लगभग स्थिर था। क्योकि पृथ्वी अपने धुरे पर घूम रही थी, यह कृत्रिम भू-उपग्रह प्रत्येक अगले परिभ्रमण मे प्रति बार लगभग २४° दूरी पर रहने के कारण पृथक् पृथक् स्थानो पर दिखाई दिया। कक्षा-पृष्ठ केन्द्र से गुरुत्वाकर्षण-क्षेत्रो के विस्थापन के कारण पृथ्वी की गति की विपरीत दिशा मे हुआ। कक्षा-पृष्ठ की इस गति का महत्व न था। रेखाश-दिशा मे वह प्रत्येक चक्कर मे लगभग चौथाई अश था। पृथ्वी और कक्षा-पृष्ठ की सापेक्षिक गति के कारण यह उपग्रह कक्षा-पृष्ठ विषवत् तल से ६५° के कौण पर झुका हुआ था और मास्को की अक्षाश-रेखा से वह प्रत्येक पूर्ववर्ती चक्कर से लगभग १५०० किलोमीटर की ऊँचाई पर पश्चिम मे दीखता था। तथा इसका प्रक्षेप-वक्र लगभग उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवीय गोलो के ऊपरी प्रदेश पर था। पृथ्वी के अपने धुरे पर चक्कर काटने के कारण विषवत् रेखा से इसका प्रक्षेप-वक्र कोण कक्षा-पृष्ठ के कोण से भिन्न था। उत्तरीय गोलार्द्ध को पार करते हुए प्रक्षेप-वक्र विषुवत्-तल से उत्तर पश्चिम की ओर ७१ ५° से गुजरकर धीरे-धीरे पूर्व की ओर मुड़ता था और फिर ६५° उत्तरीय अंक्षाश पर पहुँच कर दक्षिण की ओर मुड़ जाता था। फिर दक्षिण पूर्व दिशा में ५९° अंश कोण से विषवत तल को पार कर जाता था। दक्षिणी गोलार्द्ध मे प्रक्षेप-वक्र ६५° दक्षिणी अंक्षाश पर पहुच, उत्तर की ओर झुक, पुन उत्तरी गोलार्द्ध को पार करता था।
समयान्तर तथा पृथ्वी वायुमण्डल की ऊपरी सतहो में प्रतिरोध के कारण उपग्रह-कक्षा का रूप और आकार धीरे-धीरे बदलता रहा। क्योकि वायु-मण्डल की इन परम ऊँचाइयो का घनत्व कम है, प्रारम्भ में उपग्रह कक्षा के भ्रमण बिल्कुल मन्द रहे। भू-दूरतम बिन्दु की ऊँचाई अपेक्षातया भू-समीपतम बिन्दु की ऊँचाई से गिरी और उपग्रह कक्षा वृत्ताकार बन गई। इसके बाद जब भू उपग्रह ने वायुमण्डल के सघन स्तरो मे प्रवेश किया तो उसका प्रतिरोध अत्यन्त बढ गया, जिससे वह अत्यन्त उत्तप्त होकर भस्म हो गया और अन्तर-तारकीय आकाश मे गिर कर पृथ्वी के वायुमण्डल में नष्ट हो गया।
इसके बाद ३ नवम्बर को रूस ने दूसरा उपग्रह छोड़ा जिसमे एक जीवित कुत्ता भी था। व्योम अभियान की यातनाएँ बहुत थी। जैसे पानी में रहने वाली मछली को समुद्र की सतह पर लाने पर वह तड़पने लगती है क्योकि वह पानी में ही जीवित रह सकती है उसी प्रकार पृथ्वी पर और पृथ्वी की परिस्थिति में रहने के आदी मनुष्य को व्योम में अजीब परिस्थिति का सामना करना था। व्योम की अज्ञात परिस्थितियो का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, यही जानने के लिए रूस ने कुत्ते को भेजा था, क्योकि कुत्ते के अंग प्रत्यग अच्छी तरह विकसित होते है। कुत्ते को भेजने से पूर्व अन्य जानवरो पर भी परीक्षण किए गए थे कुत्तो को एक दवाब कक्ष में रखा गया था जिसमे हवा का दवाब कम कर दिया गया था। तीस सैकेण्ड बाद देखा गया तो सब कुत्तो के शरीर मे सूजन हो गई थी। यह भी देखा गया कि पाँच मील तक ऊपर जाने में शरीर के तंतुओ में जो नाइट्रोजन घुली हुई होती है, वह गैस में बदल गई थी। कोषो पर फोड़े उठने लगे थे। लगभग बारह मील की ऊँचाई पर सभी तन्तु वाष्प बनने लगे थे। शरीर के सब अंगो में वाष्प नाइट्रोजन व कार्बन-डाइ-आक्साइड पैदा हो जाती थी। जैसे-जैसे प्राणी ऊपर जाता था, वैसे-वैसे तेजी से ये विनाशक प्रक्रिया होने लगती थी। इन प्रक्रियाओ का पशु या मनुष्य के शरीर पर कोई प्रभाव न पड़े, इसके लिए यह आवश्यक था कि उड़ान एयर-कण्डीशन्ड कक्षो मे की जाए। इसीलिए कुत्तो को भी एयर कण्डीशन्ड कक्षो में रखा गया था। उनके शरीर में विभिन्न यन्त्र लगाए गए थे जिससे उसके तापमान, दवाब, श्वास क्रिया-प्रक्रिया व दूसरी बातो का पता लग सके।
दूसरे उपग्रह में जो यन्त्र रखे गए थे, वे पहले उपग्रह में रखे गए यन्त्रो से संख्या में अधिक तथा भिन्न प्रकार के थे। इन यन्त्रो में सूर्य का विकिरण (रेडियेशन) ब्रह्माण्ड किरणो, तापमान दबावमापक यन्त्र जिनसे अनेक रहस्यो का पता लगाना था। इन सब बातो के लिए असाधारण परीक्षण ये दोनो राष्ट्र कर रहे थे जिनमे से कुछ प्रकट किए गए थे पर कुछ नितान्त गोपनीय रखे गए थे।
भेद की बाते
अपने कमरे में पहुँचकर लिज़ा ने एक छोटा-सा चमड़े का बक्स अपने सूटकेस से निकालकर सामने टेबल पर रख लिया फिर उसे खोला। बक्स में असंख्य छोटे-मोटे यन्त्र और तार लगे थे। साधारणतया वह एक छोटा-सा रेडियोसैट जैसा प्रतीत हो रहा था। उसे खास ढङ्ग से सामने टेबल पर रख लिज़ा ने एक स्विच खोल दिया। स्विच खोलते ही एक बहुत छोटा-सा नीले रङ्ग का बल्व मन्द प्रकाश से जल उठा और यन्त्र से एक अति मन्द झकार निकलने लगी। इसी समय जोरोवस्की भी आ गया। लिज़ा ने कमरे का भीतर से ताला बन्द कर लिया। और सोफे पर इत्मीनान से बैठकर कहा---"बड़ी देर लगाई तुमने, मैं तो काफी देर से प्रतीक्षा कर रही हूँ।"
"मैं एक दिलचस्प शाही डिनर का आनन्द ले रहा था। जिन राजारानियो की बातें कहानियो में सुनी जाती है ऐसी ही एक रानी के साथ डिनर था।" जोरोवस्की ने हँसते-हँसते पूरा किस्सा कह सुनाया। सुनकर लिज़ा ने व्यंग्य से कहा--"क्या बहुत खूबसूरत थी वह रानी?" जोरोवस्की लिज़ा का व्यंग्य समझकर जोर से हँस दिया।
लिज़ा ने कहा---"खैर, वह कैफियत पीछे लूँगी, अभी तुम सुनायो तुम पर कैसी बीती? यहाँ कोई हमारी बात नहीं सुन सकता। भूमण्डल में जहाँ जो कोई भी हमारी बात सुनने की चेष्टा करेगा, हमे तुरन्त पता चल जाएगा।"
जोरोवस्की ने हँसकर कहा--"तो तुम इस यन्त्र को खूब काम में ला रही हो?"
"बड़े काम का यन्त्र बनाया है तुमने, जोरोवस्की। लेकिन इसमे एक नुक्स है।"
"वह क्या?"
"गैर आदमी को इसकी उपस्थिति का पता लग जाता है। इसकी मन्द झंकार वह सुन लेता है। इसी के कारण मैं आते समय हागकाग में बड़ी कठिनाई में पड़ी। यात्रा में हमेशा मैं इस यन्त्र को अपने सीने पर रखती हूँ। ज्योंही हमारा प्लेन हागकाग पहुँचा, पुलिस ने मुझे घेर लिया और सारे सामान की तलाशी ले डाली। बात यह हुई कि सारी राह मेरी बराबर की सीट पर ये महाशय जमे बैठे थे जिन्हें तुमने भोजन के समय देखा था। यन्त्र मेरा चालू था। बस ये बराबर उसकी आवाज सुनते रहे और सम्भवत वायरलैस से इन्होने हागकाग की पुलिस को खबर कर दी। पुलिस ने सामान की छानबीन अवश्य की। पर उन्हे यह क्या मालूम था कि मेरे सीने पर यह बंधा हुआ है।"
"खैर, तो इस बार मास्को पहुँचकर मै इसे दुरुस्त कर दूँगा। लो, अब तुम मेरी अजीबोगरीब दास्तान सुनो।"
"सुनाओ। लेकिन ठहरो, तुम कब उड़े थे?" लिज़ा ने एक छोटी-सी पाकेट बुक खोलते हुए कहा---"हाँ, ठीक है। बस २१ अक्टूबर को न?" "हाँ, २१ अबटूबर ही तो। आज नौ नवम्बर है, पूरे उन्नीस दिन मैं पृथ्वी से पृथक् रहा जिनमे से तीन दिन मैंने चन्द्र लोक में व्यतीत किए।"
"मानव इतिहास की सबसे निराली बात हुई।"
"हुई ही। परन्तु मुझे लौटकर फिर पृथ्वी पर आने की जरा भी आशा न रही थी। वह तो मुझे एक दैवी सहायता मिल गई।"
"दैवी सहायता?"
"निस्सदेह। हमारी सफलता का पूरा श्रेय हमारी वैज्ञानिक प्रगति को नही है। प्रकृति की अघटन घटना ही को है।"
"खैर, तो तुम मुझे सक्षेप में सारी बाते सुना दो।"
"जब हम चले थे, तुम्हे याद है न, मैंने एक आपत्ति की थी।"
"हाँ, हाँ, शून्याकाश में विचरण करती हुई उल्काओ के सम्बन्ध मे।"
"बेशक। अन्तरग्रह की यात्राओ के सम्बन्ध में सभी कठिनाइयो को हमने हल कर लिया था।"
"राकेट का ईंधन, जमी हुई वायु और प्राण वायु की आवश्यकता।"
"हाँ, ये सब कठिनाइयाँ तो विज्ञान के बल पर हम हल कर ही चुके थे। कास्मिक किरणो का मसला भी मैंने हल कर लिया था। पर शून्याकाश में विचरण करती हुई उल्काओ की टक्कर से बचने का हमारे पास कोई हल न था। और मैं वास्तव में इस विपत्ति का जोखिम सिर पर रख कर ही उड़ चला था।"
"लेकिन यह बात तुमने मुझसे नही कही थी।"
"कहता तो तुम क्या मुझे जाने देती?"
"हरिगिज़ नही जाने देती।"
"इसी से मैंने तुमसे नही कहा। हमारा राकेट छत्तीस हजार मील की यात्रा की सब सामग्रियो से सम्पूर्ण था। ईंधन और दूसरे उपकरण बहुत सावधानी से हमने रख लिए थे। यह तो तुमको मालूम ही है।"
"मुझे सब मालूम है। हमारी वैज्ञानिक धारणा यही तो थी कि पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के विरुद्ध चलने के लिए कम से कम ३६ हजार मील प्रति घण्टा की गति आवश्यक होगी।" "बिल्कुल ठीक। और तुम्हे याद होगा कि वैज्ञानिको की उस सभा में मैंने इस मान्यता पर सन्देह किया था।"
"मुझे याद है। तुमने कहा था।"
"परन्तु हमारी इस यात्रा ने यह मान्यता सर्वथा निराधार प्रमाणित कर दी।"
"अच्छा? यह कैसे?"
"मैं शुरू से ही सब सुनाता हूँ। ज्यो ही राकेट छूटा, क्षण भर को मैं उसके भयंकर असह्य धक्के से बेहोश हो गया। परन्तु शीघ्र ही मैं होश में आ गया। पन्द्रह मिनट मेरे बड़े कष्ट से व्यतीत हुए। परन्तु अभी मैंने अपने नए आकाशीय कवच के यन्त्रो को चालू नही किया था। ज्यों ज्यों वायुमण्डल को अपनी दुर्घर्ष गति से हमारा राकेट चीरता जा रहा था उसके घर्षण से राकेट में असह्य उत्ताप बढता जा रहा था। इस भीषण उत्ताप से बचने के लिए प्रत्येक सम्भव वैज्ञानिक उपकरण मैंने प्रो० की सलाह से राकेट में रख लिए थे परन्तु मुझे पृथ्वी के वायुमण्डल के तीन सौ मील के चक्र को पार करने में तेरह मिनट लगे। इस काल का भीषण उत्ताप इतना बढ़ गया था कि यदि मुझे और एक मिनट वायुमण्डल में रहना पड़ता तो निश्चय ही हमारा राकेट जलभुनकर खाक हो गया होता।"
"और इसके बाद?"
"इसके बाद तो फिर मुझे कोई कष्ट न रहा। मेरे कवच में केवल यही व्यवस्था न थी कि यथेष्ठ प्राणावायु मुझे मिलती रहे, उसमे यह भी व्यवस्था थी कि वायु का दबाव भी उतना ही रहे जो पृथ्वी पर है।"
"वायु का दबाव उतना ही, जितना कि पृथ्वी पर है, रहना आवश्यक था?"
"बिल्कुल आवश्यक था। इसीलिए मैंने अपने कवच में उसका प्रबन्ध पूर्ण कर रखा था। तुम तो जानती ही हो कि वायु के दबाव को कायम रखने की आवश्यकता इसलिये है कि द्रव पदार्थों में गैसो की घुलनशीलता दबाव बढ़ने के साथ ही बढ़ती जाती है। और दबाव घटाने से घुलनशीलता कम हो जाती। वायु मण्डल के जिस दबाब में हम पृथ्वी पर रहते हैं, उसी के कारण हमारे रक्त में प्राणवायु, नाइट्रोजन, और कार्बन आक्साइड गैसे घुली रहती है।"
"किन्तु ऊपर के वायवीय स्तर में तो यह दबाव कम हो जाता होगा?"
"हॉ, भूग्रहो की ऊँचाई पर यह दबाव बहुत कम, नाममात्र को रह जाता है। भूमि के गुरुत्वाकर्षण के बाद तो कतई नही रहता।"
"तो इसकी क्या प्रतिक्रिया शरीर के रक्त पर पड़ती है?"
"उस अवस्था में ये गैसे रक्त में से निकलने लगती है।"
"ओफ, यह तो जीवन के लिए एकदम खतरनाक है।"
"इसमें क्या सन्देह है। रक्त में आवश्यक प्राणवायु विशेष दबाव पर ही घुलता है।"
"और यदि दबाव न रहे?"
"तो, उसमें प्राणवायु की प्राप्ति तो होती ही नहीं। रक्त में पहले ही से विद्यमान गैसे भी बाहर निकलने लगती है।"
"खैर, इस दबाब की कमी को तो कवच में वायु का दबाव रखकर पूरा कर लिया गया। पर जब अन्तरिक्ष में वायु हो ही नहीं तब?"
"तुम भूल गई। इसी मस्ले पर तो हमारी प्रौ०••••से तीन दिन तक बहस होती रही थी।"
"नही, भूली नही हू। उसी बहस का यह परिणाम हुआ था कि तुमने यथेष्ट मात्रा में द्रव प्राणवायु साथ रख ली थी।"
"खूब याद रखती हो तुम। इसमें बड़ा सुभीता रहा। एक लिटिर द्रव प्राणवायु के उड़ने से आठ सौ लिटर गैस प्राणवायु मुझे प्राप्त होती गई।"
"ओफ, ओ, यह तो बड़ी ही सुविधाजनक बात हुई।"
"परन्तु इस यात्रा के अनुभव से मुझे ज्ञात हुआ कि छोटी मोटी तथा अल्पकालीन यात्राओ के लिए तो खैर यह व्यवस्था सहायक है परन्तु यदि लम्बी और अधिक दिन की यात्रा करनी पड़े तो इससे कोई लाभ नहीं होगा।"
"यह क्यो?"
"समझी नहीं तुम महीनो और वर्षों तक के लिए तो हमें टनो द्रव प्राण वायु चाहिये। यदि हमें चन्द्रलोक ही में साल छः महीने रहना हो जाए तो इसके लिए टनो द्रव प्राणवायु राकेट द्वारा भला कैसे ले जाई जा सकती है।"
"तो तुमने इसका क्या प्रतिकार सोचा?"
"सीधी सी बात है। मैंने यह निश्चय कियाकि इस बार जो मुझे फिर चन्द्रलोक की यात्रा करनी पड़ेगी, उसमें अपने राकेट में मैं निश्चय ही ऐसा एक यन्त्र लगाऊँगा जो वायु में से कार्बोलिक डाई आक्साइड को चूसता चला जाय और केवल प्राणवायु को छोड़ दे।"
"निस्सदेह महत्वपूर्ण सूझ है।"
"वायु के दबाव का द्रवो के खोलने पर क्या असर पड़ता है, इस पर शायद तुमने विचार नहीं किया।"
"क्यों नहीं। पानी को यदि समुद्रतट पर खौलाया जाय तो वह शताश ताप पर खौलता है, परन्तु ऊँचे पहाड़ी स्थानो पर पानी कम ताप पर खौलता है।"
"इसका कारण भी तुम समझती हो?"
"यह तो सीधी सी बात है कि समुद्र तट के वातावरण में वायु का दबाव अधिक और ऊँचे पहाड़ों पर कम है। वायुमण्डल का दबाव जितना होगा, द्रव पदार्थों के खौलने का तापमान भी उतना ही नीचा होता जायगा।"
"बिल्कुल ठीक, यही बात है। अब देखो कि पृथ्वी से बारह मील की ऊँचाई पर द्रव ३७ अंश पर खौलने लगता है और हमारे शरीर का तापमान भी लगभग ३७ अंश ही है।"
लिज़ा एकदम उछल पड़ी। उसने घबराहट भरे स्वर मे कहा--"ओफ ओ, अब तो पृथ्वी से केवल बारह मील ऊपर अन्तरिक्ष में जाते ही मनुष्य का रक्त खौलने लगेगा। क्या तुम्हें ऐसी भयानक ताप यन्त्रणा का सामना करना पड़ा मेरे प्यारे जोरोवस्की।"
"मेरी प्यारी लिजा, मुझे तो तीन सौ मील से भी अधिक ऊँचाई तक अन्तरिक्ष में जाना पड़ा। तुम्हे ज्ञात ही है कि मानव शरीर उच्चतम तापमान ७० अंश और निम्नतम-७० अंश तक सहन कर सकता है। मैंने यथासम्भव ऐसी अनेक व्यवस्था अपने राकेट और कवच में कर रखी थी कि अन्तरिक्ष का वाह्य तापमान चाहे भी जो रहे पर राकेट में भीतर बैठे मनुष्य पर उसका सीधा प्रभाव न हो, और उसके शरीर का तापमान नियन्त्रित ही रहे।"
"तो इसी ने तुम्हारे प्राणो की रक्षा की?"
"प्राणो की रक्षा तो खैर हो ही गई। परन्तु मैने यह भी देख लिया, कि हमारे सारे ही प्रयत्न अति हीन थे। उस भीषण उत्ताप की बात जब भी याद आती है, बस प्राण सूखने लगते है। केवल तुम्हारे पुनर्मिलन की अभिलाषा के बल पर ही मैं उस महाज्वाला की जलन को झेल सका।"
"और अब तुम फिर वही भीषण यात्रा करने की अभिलाषा करते हो?"
"मैं तो प्रिये, यह ठान चुका हूँ कि हम दोनो के विवाह के बाद हमारी मधुयात्रा चन्द्रलोक में ही होगी। हनीमून का वास्तविक आनन्द तो संसार के सब मनुष्यों में केवल हमी दो प्राणी उठाएगे। इतना ही क्यो? हम फिर यहाँ जल्द लौटकर आयेगे ही नहीं। यह भी हो सकता है कि जीवन भर न लौटे, वही बस जाए। और वहाँ अपना साम्राज्य स्थापित करे?"
"बड़ी क्लिष्ट कल्पना करते हो प्रियतम। मेरा तो भीषण उत्ताप का यह विवरण सुनते ही दिल बैठ गया। यह तो मृत्यु से खिलवाड़ करना है।"
"परन्तु खतरा केवल यही तो नहीं है। और भी बाते है।"
"क्या ऐसी ही भयानक?"
"कदाचित् इससे भी अधिक।"
"वे बाते कौनसी है?" "वे है सूर्य द्वारा विकीर्ण शक्तियाँ।"
"वे क्या है? क्या हम पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी उनका अनुभव नहीं करते?"
"नहीं। सूर्य जितनी किरणे छोड़ता है, उनमे से बहुत कम पृथ्वी तक पहुँच पाती है। बहुत-सी किरणो को पृथ्वी तक पहुचने से प्रथम ही वायुमण्डल चूस लेता है। ऐसी ही एक अल्ट्रावायलेट किरण हे जो पूर्ण रूप से वायुमण्डल में समा जाती है। परन्तु वायुमण्डल के ऊपरी स्तर पर इन किरणो का विकिरण इतना घना है कि यदि वहाँ एक भी जीवित सेल पहुँच जाय तो तत्काल ही उसकी मृत्यु हो जायगी।"
"तब तो इन्हे एक प्रकार से मृत्यु किरण ही कहना चाहिए।"
"निस्सदेह, परन्तु प्रकृति का करिश्मा यह देखो कि कॉच का एक साधारण आवरण भी इन किरणो को पूर्ण रूपेण चूस लेता है।"
"और तुम तो उत्कृष्ट श्रेणी के स्टील और एल्यूमिनियम के प्रावरण मे सुरक्षित थे।"
"यही बात थी जिसने मेरी रक्षा कर ली। परन्तु जीवन की शत्रु केवल ये ही किरणे थोड़ी ही है, एक्स किरणे भी है। परन्तु इनसे भी रक्षा हो सकना कुछ कठिन नहीं। पर सबसे भीषण और प्रचण्ड घातक हे कास्मिक किरणे।"
"कास्मिक किरणो के सम्बन्ध में तो तुमने अपनी प्रयोगशाला में काफी अनुसन्धान किया है।
"वे मेरी नजर से ओझल थोड़ी ही थी। तुम्हे मालूम है कि मेरी इस अन्तरिक्ष यात्रा की तैयारी में सात बरस लगे जिनमे पूरे तीन बरस मैंने कास्मिक किरणो के अनुसन्धान में खर्च किए।"
"मैं तो तुम्हारे साथ ही इस अनुसन्धान में रही। मैं जानती कि ये अतिसूक्ष्म किरणे है और इनके सूक्ष्म कण विविध रासायनिक तत्वो के नाभिकेन्द्र होते है। इनमे अस्सी प्रतिशत हाइड्रोजन, नाभिकेन्द्र होते है परन्तु लोहे जैसे भारी तत्वो के नाभिकेन्द्र इसमे कम होते है।" "ऐसा ही है। अब इसमे बात यह है कि विभिन्न ऊँचाइयो पर इन किरणो का घनत्व एकसा नहीं होता। ज्यों ज्यों ऊँचाई बढ़ती जाती है, इनकी घनता भी बढ़ती जाती है। यहाँ तक कि पृथ्वी से १४० मील की ऊँचाई पर वह वायुमण्डल के निचले स्तर की अपेक्षा डेढ सौ गुना हो जाती है। किन्तु यह क्या? तुम्हारे संवेदन यन्त्र की लाल बत्ती कैसे जल उठी।"
"ओफ, कही कोई हमारी बाते सुन रहा है। जरा ठहरो, देखू तो।" इतना कहकर लिज़ा ने एक खास बटन दबाया और डायल की सुई तेजी से घूमकर एक स्थान पर रुक गई।
लिज़ा ने कहा--"नार्वे में कोई हमारी बात सुन रहा है।" उसने हैड फोन अपने कानो में लगा कर उसका सम्बन्ध यन्त्र से स्थापित किया। फिर उसने एक बटन दबाया और ध्यान से सुनने लगी। सुनते सुनते उसने कहा---"लन्दन आर न्यूयार्क दोनो ही स्थानो से उसका सम्पर्क स्थापित है। वह दोनो जगह संकेत भेज रहा है।" परन्तु इसी समय लालबत्ती बुझ गई। लिज़ा ने कहा--"लो, वह सावधान हो गया। परन्तु खैर, तुम कहो।"
"क्या फिर कोई अन्देशा तो नही है।"
"होगा तो हमे तुरन्त ज्ञात हो जाएगा। वह व्यक्ति भी हमसे छिपा न रहेगा।"
पृथ्वी और आकाश
"खैर, तो मैं कास्मिक किरणो के घनत्व की बात कह रहा था। इन किरणो का वेग भी बहुत प्रचण्ड है और प्रकाश किरणो के समान वह सर्वत्र दृष्टिमान हो सकता है। परन्तु अपने प्रचण्ड दुर्धर्ष वेग के कारण ये किरणे जिस किसी पदार्थ में प्रविष्ट होती हैं, उसी को छिन्न-भिन्न कर डालती है।"
"तो तुमने इनका कैसे सामना किया?"
"मैंने सुरक्षा की व्यवस्था प्रथम ही से कर ली थी। पर नहीं कह सकता हूँ कि सुरक्षा के बावजूद जो किरणे मेरे शरीर में घुस गई है, उनके क्या-क्या प्रवाछनीय परिणाम होगे।" "तुमने तो मुझे चिन्तित कर दिया।"
"चिन्ता की बात नहीं है। यदि मेरा जीवन इस यात्रा में समाप्त हो जाता तो भी मुझे सन्तोष था क्योंकि मैं अन्तरिक्ष और चन्द्रलोक की अत्यन्त महत्वपूर्ण सूचनाएँ केन्द्र को भेज चुका था।"
"क्या तुम बता सकते हो कि अन्तरिक्ष यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है?"
"गुरुत्वाकर्षण।"
"किस दृष्टि से?"
"गति की दृष्टि से।"
"यह कैसे?"
"इस यात्रा में यह मेरा नितान्त नवीन और महत्वपूर्ण अनुभव रहा कि गति और गुरुत्वाकर्षण का प्राणी-शरीर पर गम्भीर प्रभाव पड़ता है।"
"यह तो मुझे भी मालूम है कि भू-उपग्रह अथवा अन्तरिक्ष विमान को अपने वृत्त पथ पर डालने के लिए गति वृद्धि का आश्रय लिया जाता है।"
"हॉ, परन्तु यह गति वृद्धि विमान में बैठे हुए प्राणी के शरीर के पैरो से सिर की ओर हो तो प्राणी शरीर का रक्त शरीर के निचले भाग की ओर आकर इकठ्ठा होने लगेगा और ज्यों ज्यों गति वृद्धि होगी, रक्त का यह निम्न संचय भी बढ़ता जायगा और इसका परिणाम यह होगा कि प्राणी के स्नायुमण्डल में अव्यवस्था उत्पन्न हो जायगी। और पहले वह बेहोश हो जायगा फिर उसी अवस्था में उसकी मृत्यु हो जायगी।"
"तब तो यह नितान्त आवश्यक है कि उन अन्तरिक्ष यानो तथा भू-उपग्रहो की गति की दिशा निश्चित रूप में प्राणी-शरीर के समानान्तर न रखकर लम्ब रूप में रखी जाय।"
"बेशक। परन्तु इतना ही यथेष्ट न होगा। हमें कवच में भी ऐसी व्यवस्था करनी आवश्यक है कि वह कवचधारी के शरीर-रक्त को एक स्थान पर एकत्र न होने से रोके।"
"तो तुमने यह व्यवस्था अपने कवच में कर रखी थी?" "नहीं की होती तो क्या में आज जीता जागता तुम्हारे सामने बैठा होता?"
"परन्तु तुमने इस सम्बन्ध में मुझे कुछ नहीं बताया था। न इसकी चर्चा उस दिन वैज्ञानिको की सभा में की थी।"
"किन्तु मैंने प्रो०--से परामर्श करके एक यन्त्र ऐसा ही लगा लिया था---वास्तव में यह एहतियातन कार्रवाई की गई थी। वास्तविक स्थिति का पता तो अन्तरिक्ष में जाने ही से लगा।"
"ओफ, कितना खतरा उठाया तुमने, मैं तो अब भी जब सोचती हूँ तो भय से काँप उठती हूँ। तुम नहीं जानते कि मेरे ये उन्नीस दिन कैसी दुश्चिन्ता में बीते है। सच पूछो तो मैं इन उन्नीस दिनो में एक दिन भी नहीं सोई।"
"और यदि मैं यह कहू कि ये सब बाते भी मुझे ज्ञात होती रही और मैं कभी-कभी तुम्हे देखता भी रहा तो तुम क्या विश्वास करोगी?"
"नही करूँगी?"
"अच्छा, तुम्हे वह घटना याद है जब हागकाग के वायुयान अड्डे के भोजन गृह में तुम्हारे उस मित्र ने तुम्हारा चुम्बन लेने की चेष्टा की थी और एक करारा चपत खाया था। आवेश के कारण तुम्हारा पर्स उस समय नीचे गिर गया था।"
"माई लव, क्या तुमने यह घटना अपनी आँखो से देखी थी?"
"उसी भाँति, जैसे अब देख रहा हू। मगर अफसोस मेरा वह अत्यन्त महत्वपूर्ण यन्त्र उल्का के धक्के से टूट गया।"
"क्या तुम्हे उल्का का धक्का भी लगा? और जीवित बच भी गए?"
"जीवित बच क्या गया। उसी धक्के की बदौलत तो आज मैं जीवित पृथ्वी पर लौट सका। नहीं तो कोई आशा ही नहीं रही थी।"
"अच्छा? यह तो बड़ी ही अद्भुत बात है। यह कैसे हुआ भला?"
"अभी मैं तुम्हे यह बात भी बताऊँगा कि सारा ही विज्ञान का