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खग्रास/विराट सूर्यलोक

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विराट सूर्यलोक

जिस सूर्य के असाधारण विस्फोटो के कारण इस वर्ष यह महान् व्योम अभियान किया जा रहा था तथा अन्तर्राष्ट्रीय भू-भौतिक वर्ष मनाया जा रहा था, उसके सम्बन्ध मे भी हम यहाँ कुछ कहेगे। हमसे ६ करोड़ १६ लाख मील दूरी पर स्थित और हमारी पृथ्वी से आकार मे १३ लाख गुना बड़ा सूर्यलोक एक असाधारण ज्वलन्त पिण्ड है। उसमे सदा सौर आतिशबाजिया होती रहती है और वहाँ कभी-कभी मीलो तक जाने वाली ज्वाला की लपटे निकला करती है। उस समय अति भयानक गर्जन तर्जन होता है। सूर्य की इस गतिविधि का अध्ययन वैज्ञानिको ने अन्तर्राष्ट्रीय भू-भौतिक वर्ष के अन्तर्गत किया है जो १ जुलाई, १९५७ से प्रारम्भ हुआ था। इस वर्ष को इसी समय मे इसलिए मनाया गया था कि इस काल मे सूर्य मे महत्तम गतिविधियाँ हो रही थी।

चन्द्रमा की भाति सूर्य मे भी धब्बे है जो हर ग्यारहवे वर्ष बहुत बड़े हो जाते है। ये धब्बे सूर्य की तेज चमक के कारण आख से नहीं दिखाई देते। परन्तु इनके फलस्वरूप पृथ्वी के ऊपरी वायुमण्डल मे चुम्बकीय तूफान और विद्युत तूफान उत्पन्न होते रहते है। इसी से पृथ्वी पर रेडियो मे गड़बड़ी होती है और वह साफ सुनाई नही देता।

१० फरवरी सन् १९५६ के दिन सूर्य मे एक भारी विस्फोट हुआ था जिससे विराट ज्वालाए निकली थी। यह विस्फोट १० करोड उद्जन बमों के एक साथ किए गए विस्फोटों के बराबर था। इस समय सूर्य की गैसें अधिकाशत उद्जन की एक अरब टन मात्रा ७०० मील प्रति सैकण्ड या २५ लाख मील फी घण्टा की गति से निकली थी। इस गैस के गोले का व्यास ही २० हजार मील था और यह २ लाख मील तक गया था। यह विकट ज्वाला २० मिनट तक चैकोस्लोवाकिया के एक केन्द्र पर देखी गई। गत वर्ष भीषण गर्मी का उत्ताप पृथ्वी पर भी भोगा गया। इसी समय फोर्ट वेल्वियर, वजिनिया के विश्व-चेतावनी केन्द्र ने वैज्ञानिको को आगाह किया कि वे ब्रह्माण्ड किरणो, उत्तरी ज्योतियो, पृथ्वी के चुम्बकत्व तथा पृथ्वी के वायु मण्डल की विद्युन्मय पट्टी 'अयन मण्डल' का गहराई से अध्ययन करे। वैज्ञानिको ने जो छानबीन की तो ज्ञात हुआ कि इस काल मे चुम्बकीय तूफान आया था और अयन मण्डल मे भी बहुत उथल-पुथल हुई थी। कोलोरेडो विश्वविद्यालय की वेधशाला के निर्देशक तथा अखिल भू-वर्ष की अमरीकी समिति के सौर गति-विधि मण्डल के अध्यक्ष डा. वाल्टर राबर्ट्स ने पता लगाया था कि मार्च के अन्तिम सप्ताह मे सूर्य मे असाधारण विशालकाय ज्वालाए फैली हुई थी। इससे पूर्व १ जुलाई को भी ऐसा ही भयानक विस्फोट हुआ था।

सूर्य मण्डल मे जो धब्वे देखे गए थे, वे छोटे, बड़े अनेक थे। छोटे सैकडो और बड़े हजारो मील तक फैले हुए थे। सबसे बड़ा धब्बा जो ७ फरवरी सन् १९५६ मे देखा गया था, हमारी पृथ्वी से ३० गुना बडा था। यह पता लग गया है कि ये धब्बे स्थिर नहीं रहते, अपनी आकृति बदलते रहते हैं और चलते रहते है। बहुधा ये धब्बे सूर्य-पिण्ड के उत्तरी या दक्षिणी भागो मे उत्पन्न होकर मध्य भाग की ओर आकर विलीन हो जाते है। इसके बाद फिर दूसरे धब्बो की वही उत्पत्ति होती है जहाँ पूर्व धब्बे थे। यह क्रिया निरन्तर चलती रहती है।

यह एक महत्वपूर्ण बात है कि इन धब्बो का पृथ्वी के जीवों के जीवन से गहरा सम्बन्ध है। बहुधा जब ये धब्बे दिखाई पड़ते है तब या तो दुष्काल-सूखा पड़ता है, या कुतुबनुमा की सुई अपना काम नहीं करती। ये धब्बे वास्तव में क्या है, इस सम्बन्ध मे वैज्ञानिक भाति-भाति की अटकले लगाते है। एक अटकल यह भी है कि सूर्य मण्डल मे जो अति भीषण विराट ज्वालामुखी गह्वर हैं, उन्ही से जब भीषण उद्गार निकलते है तब ये गड्ढे दिखाई पड़ते है। इस के बाद ही ज्वाला की लपटें निकलती है। रूसी वैज्ञानिक डा॰ स्कोताकोविच का अनुमान है कि सूर्य के अधिक धब्बो का अर्थ है अधिक वर्षा। परन्तु यह वर्ष समूचे सौर मण्डल का असाधारण वर्ष था। सूर्य मे बड़े-बड़े भयकर विस्फोट होने वाले थे जिसके बड़े-बड़े परिणाम शीघ्र ही हमारे सामने आने वाले थे।