गोदान/भाग 20

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गोदान  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
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बीस

फागुन अपनी झोली में नवजीवन की विभूति लेकर आ पहुंचा था। आम के पेड़ दोनों हाथों से बौर के सुगंध बांट रहे थे, और कोयल आम की डालियों में छिपी हुई संगीत का गुप्त दान कर रही थी।

गांवों में ऊख की बोआई लग गई थी। अभी धूप नहीं निकली, पर होरी खेत में पहुंच गया। धनिया, सोना, रूपा, तीनों तलैया से ऊख के भीगे हुए गट्ठे निकाल-निकालकर खेत में ला रही हैं, और होरी गंड़ा से ऊख के टुकड़े कर रहा है। अब वह दातादीन की मजूरी करने लगा है। अब वह किसान नहीं, मजूर है। दातादीन से अब उसका पुरोहित-जजमान का नाता नहीं, मालिक-मजदूर का नाता है।

दातादीन ने आकर डांटा-हाथ और फुरती से चलाओ होरी। इस तरह तो तुम दिन-भर में न काट सकोगे।

होरी ने आहत अभिमान के साथ कहा-चला ही तो रहा हूं महाराज, बैठा तो नहीं हूं।

दातादीन मजूरों से रगड़कर काम लेते थे इसलिए उनके यहां कोई मजूर टिकता न था। होरी उनका स्वभाव जानता था, पर जाता कहां।

पंडित उसके सामने खड़े होकर बोले-चलाने-चलाने में भेद है। एक चलाना वह है कि घड़ी भर में काम तमाम, दूसरा चलाना वह है कि दिन भर में भी एक बोझ ऊख न कटे।

होरी ने विष का घूंट पीकर और जोर से हाथ चलाना शुरू किया। इधर महीनों से उसे पेट-भर भोजन न मिलता था। प्रायःः एक जून तो चबेने पर ही कटता था। दूसरे जून भी कभी आधा पेट भोजन मिला, कभी कड़ाका हो गया। कितना चाहता था कि हाथ और जल्दी-जल्दी उठे, मगर हाथ जवाब दे रहा था इस पर दातादीन सिर पर सवार थे। क्षण-भर दम ले लेने पाता तो ताजा हो जाता, लेकिन दम कैसे ले? घुड़कियां पड़ने का भय था।

धनिया और दोनों लड़कियां ऊख के गट्ठे लिए गीली साड़ियों से लथपथ, कीचड़ में सनी हुई आईं, और गट्ठे पटककर दम मारने लगीं कि दातादीन ने डांट बताई-यहां तमासा क्या देख रही है धनिया? जा अपना काम कर। पैसे सेंत में नहीं आते। पहर भर में तू एक खेप लाई है। इस हिसाब से तो दिन-भर में भी ऊख न ढुल पाएगी।

धनिया ने त्योरी बदलकर कहा-क्या जरा दम भी न लेने दोगे महाराज। हम भी तो आदमी हैं। तुम्हारी मजूरी करने से बैल नहीं हो गए। जरा मूड़ पर एक गट्ठा लादकर लाओ तो हाल मालूम हो।

दातादीन बिगड़ उठे-पैसे देते हैं काम करने के लिए, दम मारने के लिए नहीं। दम लेना है, तो घर जाकर लो।

धनिया कुछ कहने ही जा रही थी कि होरी ने फटकार बताई-तू जाती क्यों नहीं धनिया? क्यों हुज्जत कर रही है?

धनिया ने बीड़ा उठाते हुए कहा-जा तो रही हूं, लेकिन चलते हुए बैल को औंगी न देना चाहिए।

दातादीन ने लाल आंखें निकाल लीं-जान पड़ता है, अभी मिजाज ठंडा नहीं हुआ। जभी दाने-दाने को मोहताज हो।

धनिया भला क्यों चुप रहने लगी थी-तुम्हारे द्वार पर भीख मांगने तो नहीं जाती। [ १९१ ]
दातादीन ने पैने स्वर में कहा-अगर यही हाल रहा तो भीख भी मांगोगी।

धनिया के पास जवाब तैयार था, पर सोना उसे खींच कर तलैया की ओर ले गई, नहीं, बात बढ़ जाती, लेकिन आवाज की पहुंच के बाहर जाकर दिल की जलन निकाली-भीख मांगो तुम, जो भिखमंगों की जात हो। हम तो मजूर ठहरे, जहां काम करेंगे, वही चार पैसे पाएंगे।

सोना ने उसका तिरस्कार किया-अम्मां जाने भी दो। तुम तो समय नहीं देखती, बात-बात पर लड़ने बैठ जाती हो।

होरी उन्मत्त की भांति सिर से ऊपर गंड़ासा उठा-उठाकर ऊख के टुकड़ों के ढेर करता जाता था। उसके भीतर जैसे आग लगी हुई थी। उसमें अलौकिक शक्ति आ गई थी। उसमें जो पीढ़ियों का संचित पानी था, वह इस समय जैसे भाप बनकर उसे यंत्र की भांति अंध-शक्ति प्रदान कर रहा था। उसकी आंखों में अंधेरा छाने लगा। सिर में फिरकी-सी चल रही थी। फिर भी उसके हाथ यंत्र की गति से, बिना थके, बिना रुके, उठ रहे थे। उसकी देह से पसीने की धार निकल रही थी, मुंह से फिचकुर छूट रहा था, और सिर में धम-धम का शब्द हो रहा था, पर उस पर जैसे कोई भूत सवार हो गया हो।

सहसा उसकी आंखों में निविड़ अंधकार छा गया। मालूम हुआ, वह जमीन में धंसा जा रहा है। उसने संभलने की चेष्टा में शून्य में हाथ फैला दिए और अचेत हो गया। गंड़ासा हाथ से छूट गया और वह औंधे मुंह जमीन पर पड़ गया।

उसी वक्त धनिया ऊख का गट्ठा लिए आई। देखा तो कई आदमी होरी को घेरे खड़े हैं। एक हलवाहा दातादीन से कह रहा था-मालिक, तुम्हें ऐसी बात न कहनी चाहिए, जो आदमी को लग जाय। पानी मरते ही मरते तो मरेगा।

धनिया ऊख का गट्ठा पटक पागलों की तरह दौड़ी हुई होरी के पास गई और उसका सिर अपनी जांघ पर रखकर विलाप करने लगी-तुम मुझे छोड़कर कहां जाते हो? अरी सोना, दौड़कर पानी ला और जाकर सोभा से कह, दादा बेहाल हैं। हाय भगवान्। अब किसकी होकर रहूंगी, कौन मुझे धनिया कहकर पुकारेगा।...

लाला पटेश्वरी भागे हुए आए और स्नेह भरी कठोरता से बोले-क्या करती है धनिया, होस संभाल। होरी को कुछ नहीं हुआ। गर्मी से अचेत हो गए हैं। अभी होस आया जाता है। दिल इतना कच्चा कर लेगी तो कैसे काम चलेगा?

धनिया ने पटेश्वरी के पांव पकड़ लिए और रोती हुई बोली-क्या करूं लालाजी, जी नहीं मानता। भगवान् ने सब कुछ हर लिया। मैं सबर कर गई। अब सबर नहीं होता। हाय रे, मेरा हीरा।

सोना पानी लाई। पटेश्वरी ने होरी के मुंह पर पानी के छींटे दिए। कई आदमी अपनी-अपनी अंगोछियों से हवा कर रहे थे। होरी की देह ठंडी पड़ गई थी। पटेश्वरी को भी चिंता हुई, पर धनिया को वह बराबर साहस देते जाते थे।

धनिया अधीर होकर बोली-ऐसा कभी नहीं हुआ था। लाला, कभी नहीं।

पटेश्वरी ने पूछा-रात कुछ खाया था?

धनिया बोली-हां, रात रोटियां पकाई थीं, लेकिन आजकल हमारे ऊपर जो बीत रही है, वह क्या तुमसे छिपा है? महीनों से भरपेट रोटी नसीब नहीं हुई। कितना समझाती हूं, जान
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रखकर काम करो, लेकिन आराम तो हमारे भाग्य में लिखा ही नहीं।

सहसा होरी ने आंखें खोल दीं और उड़ती हुई नजरों से इधर-उधर ताका।

धनिया जैसे जी उठी। विह्वल होकर उसके गले से लिपटकर बोली-अब कैसा जी है तुम्हारा? मेरे तो परान नई (नाखूनों) में समा गए थे।

होरी ने कातर स्वर में कहा-अच्छा हूं। न जाने कैसा जी हो गया था।

धनिया ने स्नेह में डूबी भर्त्सना से कहा-देह में दम तो है नहीं, काम करते हो जान देकर। लड़कों का भाग था, नहीं तुम तो ले ही डूबे थे।

पटेश्वरी ने हंसकर कहा-धनिया तो रो-पीट रही थी।

होरी ने आतुरता से पूछा-सचमुच तू रोती थी धनिया?

धनिया ने पटेश्वरी को पीछे ढकेलकर कहा-इन्हें बकने दो तुम। पूछो, यह क्यों कागद छोड़कर घर से दौड़े आए थे?

पटेश्वरी ने चिढ़ाया-तुम्हें हीरा-हीरा कहकर रोती थी। अब लाज के मारे मुकरती है। छाती पीट रही थी।

होरो ने धनिया को सजल नेत्रों से देखा-पगली है और क्या अब न जाने कौन-सा सुख देखने के लिए मुझे जिलाए रखना चाहती है।

दो आदमी होरी को टिकाकर घर लाए और चारपाई पर लिटा दिया। दातादीन तो कुढ़ रहे थे कि बोआई में देर हुई जाती है, पर मातादीन इतना निर्दयी न था। दौड़कर घर से गर्म दूध लाया, और एक शीशी में गुलाबजल भी लेता आया। और दूध पीकर होरी में जैसे जान आ गई।

उसी वक्त गोबर एक मजदूर के सिर पर अपना सामान लादे आता दिखाई दिया।

गांव के कुत्ते पहले तो झुकते हुए उसकी तरफ दौड़े। फिर दुम हिलाने लगे। रूपा ने कहा-'भैया आए, भैया आए', और तालियां बजाती हुई दौड़ी। सोना भी दो-तीन कदम आगे बढ़ी, पर अपने उछाह को भीतर ही दबा गई। एक साल में उसका यौवन कुछ और संकोचशील हो गया था। झुनिया भी घूंघट निकाले द्वार पर खड़ी हो गई।

गोबर ने मां-बाप के चरण छुए और रूपा को गोद में उठाकर प्यार किया। धनिया ने उसे आशीर्वाद दिया और उसका सिर अपनी छाती से लगाकर मानो अपने मातृत्व का पुरस्कार पा गई। उसका हृदय गर्व से उमड़ पड़ता था। आज तो वह रानी है। इस फटे-हाल में भी रानी है। कोई उसकी आंखें देखे, उसका मुख देखे, उसका हृदय देखे, उसकी चाल देखे, रानी भी लजा जायगी। गोबर कितना बड़ा हो गया है और पहन-ओढ़कर कैसा भलामानस लगता है। धनिया के मन में कभी अमंगल की शंका न हुई थी। उसका मन कहता था, गोबर कुशल से है और प्रसन्न है। आज उसे आंखों देखकर मानो उसको जीवन के धूल-धक्कड़ में गुम हुआ रत्न मिल गया है, मगर होरी ने मुंह फेर लिया था।

गोबर ने पूछा-दादा को क्या हुआ है, अम्मां?

धनिया घर का हाल कहकर उसे दुःखी न करना चाहती थी। बोली-कुछ नहीं है बेटा जरा सिर में दर्द है। चलो, कपड़े उतारो, हाथ-मुंह धोओ? कहां थे तुम इतने दिन? भला, इस तरह कोई घर से भागता है? और कभी एक चिट्ठी तक न भेजी? आज साल-भर के बाद जाके सुधि ली है। तुम्हारी राह देखते-देखते आंखें फूट गईं। यही आस बंधी रहती थी कि कब वह दिन आएगा और कब तुम्हें देखूंगी। कोई कहता था, मिरच भाग गया, कोई डमरा टापू बताता
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था। सुन-सुनकर जान सूखी जाती थी। कहां रहे इतने दिन?

गोबर ने शरमाते हुए कहा-कहीं दूर नहीं गया था अम्मां, यहां लखनऊ में तो था।

'और इतने नियरे रहकर भी कभी एक चिट्ठी न लिखी?'

उधर सोना और रूपा भीतर गोबर का सामान खोलकर चीज का बांट-बखरा करने में लगी हुई थीं, लेकिन झुनिया दूर खड़ी थी। उसके मुख पर आज मान का शोख रंग झलक रहा है। गोबर ने उसके साथ जो व्यवहार किया है, आज वह उसका बदला लेगी। असामी को देखकर महाजन उससे वह रुपये वसूल करने को भी व्याकुल हो रहा है, जो उसने बट्टेखाते में डाल दिए थे। बच्चा उन चीजों की ओर लपक रहा था और चाहता था, सब-का-सब एक साथ मुंह में डाल ले, पर झुनिया उसे गोद से उतरने न देती थी।

सोना बोली-भैया तुम्हारे लिए ऐना-कंघी लाए हैं भाभी।

झुनिया ने उपेक्षा भाव से कहा-मुझे ऐना-कंघी न चाहिए। अपने पास रखे रहें।

रूपा ने बच्चे की चमकीली टोपी निकाली-ओ हो। यह तो चुन्नू की टोपी है। और उसे बच्चे के सिर पर रख दिया।

झुनिया ने टोपी उतारकर फेंक दी और सहसा गोबर को अंदर आते देखकर वह बालक को लिए अपनी कोठरी में चली गई। गोबर ने देखा, सारा सामान खुला पड़ा है। उसका जी तो चाहता है, पहले झुनिया से मिलकर अपना अपराध क्षमा कराए, लेकिन अंदर जाने का साहस नहीं होता। वहीं बैठ गया और चीजें निकाल-निकाल हर एक को देने लगा। मगर रूपा इसलिए फूल गई कि उसके लिए चप्पल क्यों नहीं आए, और सोना उसे चिढ़ाने लगी, तू क्या करेगी चप्पल लेकर, अपनी गुड़िया से खेल। हम तो तेरी गुड़िया देखकर नहीं रोते, तू मेरी चप्पल देखकर क्यों रोती है? मिठाई बांटने की जिम्मेदारी धनिया ने अपने ऊपर ली। इतने दिनों के बाद लड़का कुशल से घर आया है। वह गांव-भर में बैना बंटवाएगी। एक गुलाबजामुन रूपा के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान था। वह चाहती थी, हांडी उसके सामने रख दी जाय वह कूद-कूद खाय।

अब संदूक खुला और उसमें से साड़ियां निकलने लगीं। सभी किनारदारी थीं, जैसी पटेश्वरी लाला के घर में पहनी जाती हैं, मगर हैं बड़ी हल्की। ऐसी महीन साड़ियां भला कै दिन चलेंगी। बड़े आदमी जितनी महीन साड़ियां चाहे पहनें। उनकी मेहरियों को बैठने और सोने के सिवा और कौन काम है। यहां तो खेत-खलिहान सभी कुछ है। अच्छा होरी के लिए धोती के अतिरिक्त एक दुपट्टा भी है।

धनिया प्रसन्न होकर बोली-यह तुमने बड़ा अच्छा काम किया बेटा। इनका दुपट्टा बिल्कुल तार-तार हो गया था।

गोबर को उतनी देर में घर की परिस्थिति का अंदाज हो गया था। धनिया की साड़ी में कई पैबंद लगे हुए थे। सोना की साड़ी सिर पर फटी हुई थी और उसमें से उसके बाल दिखाई दे रहे थे। रूपा की धोती में चारों तरफ झालरें-सी लटक रही थीं। सभी के चेहरे रूखे, किसी की देह पर चिकनाहट नहीं। जिधर देखो, विपन्नता का साम्राज्य था।

लड़कियां तो साड़ियों में मगन थी। धनिया को लड़के के लिए भोजन की चिंता हुई। घर में थोड़ा-सा जौ का आटा सांझ के लिए संचकर रखा हुआ था। इस वक्त तो चबेने पर कटती थी, मगर गोबर अब वह गोबर थोड़े ही है। उससे जौ का आटा खाया भी जायगा? परदेस में
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न जाने क्या-क्या खाता-पीता रहा होगा। जाकर दुलारी की दुकान से गेहूं का आटा, चावल-घी उधार लाई। इधर महीनों से सहुआइन एक पैसे की चीज उधार न देती थी, पर आज उसने एक बार भी न पूछा, पैसे कब दोगी।

उसने पूछा-गोबर तो खूब कमा के आया है न?

धनिया बोली-अभी तो कुछ नहीं खुला दीदी। अभी मैंने भी कुछ कहना उचित न समझा। हां, सबके लिए किनारदार साड़ियां लाया है। तुम्हारे आसिरबाद से कुसल से लौट आया, मेरे लिए तो यही बहुत है।

दुलारी ने असीस दिया-भगवान् करे, जहां रहे कुसल से रहे। मां-बाप को और क्या चाहिए, लड़का समझदार है। और छोकरों की तरह उड़ाऊ नहीं है। हमारे रुपये अभी न मिलें, तो ब्याज तो दे दो। दिन-दिन बोझ बढ़ ही तो रहा है।

इधर सोना चुन्नू को उसका फ्राक और टोप और जूता पहनाकर राजा बना रही थी। बालक इन चीजों को पहनने से ज्यादा हाथ में लेकर खेलना पसंद करता था। अंदर गोबर और झुनिया के मान-मनौवल का अभिनय हो रहा था।

झुनिया ने तिरस्कार-भरी आंखों से देखकर कहा-मुझे लाकर यहां बैठा दिया। आप परदेस की राह ली। फिर न खोज न खबर ली कि मरती है या जीती है। साल भर के बाद अब जाकर तुम्हारी नींद टूटी है। कितने बड़े कपटी हो तुम। मैं तो सोचती हूं कि तुम मेरे पीछे-पीछे आ रहे हो और आप उड़े, तो साल भर के बाद लौटे। मरदों का विस्वास ही क्या, कहीं कोई और ताक ली होगी, सोचा होगा, एक घर के लिए है ही, एक बाहर के लिए भी हो जाय।

गोबर ने सफाई दी-झुनिया, मैं भगवान् को साच्छी देकर कहता हूं, जो मैंने कभी किसी की ओर ताका भी हो। लाज और डर के मारे घर से भागा जरूर, मगर तेरी याद एक छन के लिए भी मन से न उतरती थी। अब तो मैंने तय कर लिया है कि तुझे भी लेता जाऊंगा, इसीलिए आया हूं। तेरे घर वाले तो बहुत बिगड़े होंगे?

'दादा तो मेरी जान लेने पर ही उतारू थे।'

'सच।'

'तीनों जने यहां चढ़ आए थे। अम्मां ने ऐसा डांटा कि मुंह लेकर रह गए। हां, हमारे दो बैल खोल ले गए।'

'इतनी बड़ी जबर्दस्ती। और दादा कुछ बोले नहीं?'

'दादा अकेले किस-किससे लड़ते। गांव वाले तो नहीं ले जाने देते थे, लेकिन दादा ही भलमनसी में आ गए, तो और लोग क्या करते?'

'तो आजकल खेती-बारी कैसे हो रही हैं?'

'खेती-बारी सब टूट गई। थोड़ी-सी पंडित महाराज के साझे में है। ऊख बोई ही नहीं गई।'

गोबर की कमर में इस समय दो सौ रुपये थे। उसकी गर्मी यों भी कम न थी। यह हाल सुनकर तो उसके बदन में आग ही लग गई।

बोला-तो फिर पहले मैं उन्हीं से जाकर समझता हूं। उनकी यह मजाल कि मेरे द्वार पर से बैल खोल ने जायं। यह डाका है, खुला हुआ डाका। तीन-तीन साल को चले जायेंगे तीनों। यों न देंगे, तो अदालत से लूंगा। सारा घमंड तोड़ दूंगा।

वह उसी आवेश में चला था कि झुनिया ने पकड़ लिया और बोली-तो चले जाना, अभी
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ऐसी क्या जल्दी है? कुछ आराम कर लो, कुछ खा-पी लो। सारा दिन तो पड़ा है। यहां बड़ी-बड़ी पंचायत हुई। पंचायत ने अस्सी रुपये डांड़ के लगाए। तीस मन अनाज ऊपर। उसी में तो और तबाही आ गई।

सोना बालक को कपड़े-जूते पहनाकर लाई। कपड़े पहनकर वह जैसे सचमुच राजा हो गया था। गोबर ने उसे गोद में ले लिया, पर इस समय बालक के प्यार में उसे आनंद न आया। उसका रक्त खौल रहा था और कमर के रुपये आंच और तेज कर रहे थे। वह एक-एक से समझेगा। पंचों को उस पर डांड़ लगाने का अधिकार क्या है? कौन होता है कोई उसके बीच में बोलने वाला? उसने एक औरत रख ली, तो पंचों के बाप का क्या बिगाड़ा? अगर इसी बात पर वह फौजदारी में दावा कर दे, तो लोगों के हाथों में हथकड़ियां पड़ जाएं। सारी गृहस्थी तहस-नहस हो गई। क्या समझ लिया है उसे इन लोगों ने।

बच्चा उसकी गोद में जरा-सा मुस्कराया, फिर जोर से चीख उठा, जैसे कोई डरावनी चीज देख ली हो।

झुनिया ने बच्चे को उसकी गोद से ले लिया और बोली अब जाकर नहा-धो लो। किस सोच में पड़ गए? यहां सबसे लड़ने लगो, तो एक दिन निबाह न हो। जिसके पास पैसे हैं, वही बड़ा आदमी है, वही भला आदमी है। पैसे न हो, तो उस पर सभी रोब जमाते हैं।

'मेरा गधापन था कि घर से भागा, नहीं देखता, कैसे कोई एक धेला डांड़ लेता है।'

'शहर की हवा खा आए हो, तभी ये बातें सूझने लगी हैं, नहीं घर से भागते ही क्यों।'

'यही जी चाहता है कि लाठी उठाऊं और पटेश्वरी, दातादीन, झिंगुरी, सब सालों को पीटकर गिरा दूं और उनके पेट से रुपये निकाल लूं।'

'रुपये की बहुत गर्मी बढ़ी है साइत। लाओ निकालो, देखूं, इतने दिन में क्या कमा लाए हो?'

उसने गोबर की कमर में हाथ लगाया। गोबर खड़ा होकर बोला-अभी क्या कमाया, हां, अब तुम चलोगी, तो कमाऊंगा। साल-भर तो सहर का रंग-ढंग पहचानने ही में लग गया।

'अम्मां जाने देंगी, तब तो?'

'अम्मां क्यों न जाने देंगी? उनसे मतलब?'

'वाह। मैं उनकी राजी बिना न जाऊंगी। तुम तो छोड़कर चलते बने। और मेरा कौन था यहां? वह अगर घर में न घुसने देतीं तो मैं कहां जाती? जब तक जीऊंगी, उनका जस गाऊंगी और तुम भी क्या परदेस ही करते रहोगे?'

'और यहां बैठकर क्या करूंगा? कमाओ और मरो, इसके सिवा और यहां क्या रखा है? थोड़ी-सी अक्कल हो और आदमी काम करने से न डरे, तो वहां भूखों नहीं मर सकता। यहां तो अक्कल कुछ काम नहीं करती। दादा क्यों मुंह फुलाए हुए हैं?'

'अपने भाग बखानो कि मुंह फुलाकर छोड़ देते हैं। तुमने उपद्रव तो इतना बड़ा किया था कि उस क्रोध में पा जाते, तो मुंह लाल कर देते।'

'तो तुम्हें भी खूब गालियां देते होंगे?'

'कभी नहीं, भूलकर भी नहीं अम्मां तो पहले बिगड़ी थीं, लेकिन दादा ने तो कभी कुछ नहीं कहा, जब बुलाते हैं, बड़े प्यार से। मेरा सिर भी दुखता है, तो बेचैन हो जाते हैं। अपने बाप को देखते तो मैं इन्हें देवता समझती हूं। अम्मां को समझाया करते हैं, बहू को कुछ न कहना। तुम्हारे ऊपर सैकड़ों बार बिगड़ चुके हैं कि इसे घर में बैठाकर आप न जाने कहां निकल गया। [ १९६ ]
आजकल पैसे-पैसे की तंगी है। ऊख के रुपये बाहर ही बाहर उड़ गए। अब तो मजूरी करनी पड़ती है। आज बेचारे खेत में बेहोस हो गए। रोना-पीटना मच गया। तब से पड़े हैं।'

मुंह-हाथ धोकर और खूब बाल बनाकर गोबर गांव की दिग्विजय करने निकला। दोनों चाचाओं के घर जाकर राम-राम कर आया। फिर और मित्रों से मिला। गांव में कोई विशेष परिवर्तन न था। हां, पटेश्वरी की नई बैठक बन गई थी और झिंगुरीसिंह ने दरवाजे पर नया कुआं खुदवा लिया था। गोबर के मन में विद्रोह और भी ताल ठोंकने लगा। जिससे मिला, उसने उसका आदर किया, और युवकों ने तो उसे अपना हीरो बना लिया और उसके साथ लखनऊ जाने को तैयार हो गए। साल ही भर में वह क्या से क्या हो गया था।

सहसा झिंगुरीसिंह अपने कुएंपर नहाते हुए मिल गए, गोबर निकला, मगर सलाम न किया, न बोला। वह ठाकुर को दिखा देना चाहता था, मैं तुम्हें कुछ नहीं समझता।

झिंगुरीसिंह ने खुद ही पूछा-कब आए गोबर, मजे में तो रहे? कहीं नौकर थे लखनऊ में?

गोबर ने हेकड़ी के साथ कहा-लखनऊ गुलामी करने नहीं गया था। नौकरी है तो गुलामी। मैं व्यापार करता था।

ठाकुर ने कुतूहल भरी आंखों से उसे सिर से पांव तक देखा-कितना रोज पैदा करते थे?

गोबर ने छुरी को भाला बनाकर उनके ऊपर चलाया-यही कोई ढाई-तीन रुपये मिल जाते थे। कभी चटक गई तो चार भी मिल गए। इससे बेसी नहीं।

झिंगुरी बहुत नोच-खसोट करके भी पचीस-तीस से ज्यादा न कमा पाते थे। और यह गंवार लौंडा सौ रुपये कमाने लगा। उनका मस्तक नीचा हो गया। अब किस दावे से उस पर रोब जमा सकते थे? वर्ण में वह जरूर ऊंचे हैं, लेकिन वर्ण कौन देखता है। उससे स्पर्द्धा करने का यह अवसर नहीं, अब तो उसकी चिरौरी करके उससे कुछ काम निकाला जा सकता है। बोले-इतनी कमाई कम नहीं है बेटा, जो खरच करते बने। गांव में तो तीन आने भी नहीं मिलते। भवनिया (उनके जेठे पुत्र का नाम था) को भी कहीं कोई काम दिला दो, तो भेज दें। न पढ़े न लिखे, एक न एक उपद्रव करता रहता है। कहीं मुनीमी खाली हो तो कहना, नहीं साथ ही लेते जाना। तुम्हारा तो मित्र है। तलब थोड़ी हो, कुछ गम नहीं। हां, चार पैसे की ऊपर की गुंजाइस हो।

गोबर ने अभिमान भरी हंसी से कहा-यह ऊपरी आमदनी की चाट आदमी को खराब कर देती है ठाकुर, लेकिन हम लोगों की आदत कुछ ऐसी बिगड़ गई है कि जब तक बेईमानी न करें, पेट ही नहीं भरता। लखनऊ में मुनीमी मिल सकती है, लेकिन हर एक महाजन ईमानदार चौकस आदमी चाहता है। में भवानी को किसी के गले बांध तो दूं, लेकिन पीछे इन्होंने कहीं हाथ लपकाया, तो वह तो मेरी गर्दन पकड़ेगा। संसार में इलम की कदर नहीं, ईमान की कदर है।

यह तमाचा लगाकर गोबर आगे निकल गया। झिंगुरी मन में ऐंठकर रह गए। लौंडा कितने घमंड की बातें करता है, मानो धर्म का अवतार ही तो है।

इसी तरह गोबर ने दातादीन को भी रगड़ा। भोजन करने जा रहे थे। गोबर को देखकर प्रसन्न होकर बोले-मजे में तो रहे गोबर? सुना, वहां कोई अच्छी जगह पा गए हो। मातादीन को भी किसी हीले से लगा दो न? भंग पीकर पड़े रहने के सिवा यहां और कौन काम है। [ १९७ ]
गोबर ने बनाया-तुम्हारे घर किस बात की कमी है महाराज, जिस जजमान के द्वार पर जाकर खड़े हो जाओ, कुछ न कुछ मार ही लाओगे। जनम में लो, मरन में लो, सादी में लो, गमी में लो, खेती करते हो, लेन-देन करते हो, दलाली करते हो, किसी से कुछ भूल-चूक हो जाए, तो डांड़ लगाकर उसका घर लूट लेते हो। इतनी कमाई से पेट नहीं भरता? क्या करोगे बहुत-सा धन बटोरकर कि साथ ले जाने की कोई जुगुत निकाल ली है?

दातादीन ने देखा, गोबर कितनी ढिठाई से बोल रहा है, अदब और लिहाज जैसे भूल गया। अभी शायद नहीं जानता कि बाप मेरी गुलामी कर रहा है। सच है, छोटी नदी को उमड़ते देर नहीं लगती, मगर चेहरे पर मैल नहीं आने दिया। जैसे बड़े लोग बालकों से मूंछें उखड़वाकर भी हंसते हैं, उन्होंने भी इस फटकार को हंसी में लिया और विनोद-भाव से बोले-लखनऊ की हवा खा के तू बड़ा चंट हो गया है गोबर। ला, क्या कमा के लाया है, कुछ निकाल। सच कहता हूं गोबर, तुम्हारी बहुत याद आती थी। अब तो रहोगे कुछ दिन?

'हां, अभी तो रहूंगा कुछ दिन। उन पंचों पर दावा करना है, जिन्होंने डांड़ के बहाने मेरे डेढ़ सौ रुपये हजम किए हैं। देखूं, कौन मेरा हुक्का-पानी बंद करता है और कैसे बिरादरी मुझे बात बाहर करती है?

यह धमकी देकर वह आगे बढ़ा। उसकी हेकड़ी ने उसके युवक भक्तों को रोब में डाल दिया था।

एक ने कहा-कर दो नालिस गोबर भैया। बुड्ढा काला सांप है-जिसके काटे का मंतर नहीं। तुमने अच्छी डांट बताई। पटवारी के कान भी जरा गरमा दो। बड़ा मुतफन्नी है दादा। बाप बेटे में आग लगा दे, भाई-भाई में आग लगा दे। कारिंदे से मिलकर असामियों का गला काटता है। अपने खेत पीछे जोतो, पहले उसके खेत जोत दो। अपनी सिंचाई पीछे करो, पहले उसकी सिंचाई कर दो।

गोबर ने मूंछों पर ताव देकर कहा-मुझसे क्या कहते हो भाई, साल-भर में भूल थोड़े ही गया। यहां मुझे रहना ही नहीं है, नहीं एक-एक को नचाकर छोड़ता। अबकी होलो धूम-धाम से मना और होली का स्वांग बनाकर इन सबों को खूब भिगो-भिगो कर लगाओ। होली का प्रोग्राम बनने लगा। खूब भंग घुटे, दूधिया भी, रंगीन भी, और रंगों के साथ कालिख भी बने और मुखियों के मुंह पर कालिख ही पोती जाए। होली में कोई बोल ही क्या सकता है। फिर स्वांग निकले और पंचों की भद्द उड़ाई जाए।रुपये-पैसे की कोई चिंता नहीं। गोबर भाई कमाकर लाए हैं।

भोजन करके गोबर भोला से मिलने चला। जब तक अपनी जोड़ी लाकर अपने द्वार पर बांध न दे, उसे चैन नहीं। वह लड़ने-मरने को तैयार था।

होरी ने कातर स्वर में कहा-रार मत बढ़ाओ बेटा। भोला गोई ले गए, भगवान् उनका भला करे, लेकिन उनके रुपये तो आते ही थे।

गोबर ने उत्तेजित होकर कहा-दादा, तुम बीच में मत बोलो। उनकी गाय पचास की थी। हमारी गोई डेढ़ सौ में आई थी। तीन साल हमने जोती। फिर भी डेढ़ सौ की थी ही। वह अपने रुपये के लिए दावा करते, डिगरी कराते, या जो चाहते करते, हमारे द्वार से जोड़ी क्यों खोल ले गए? और तुम्हें क्या कहूं? इधर गोई खो बैठे, उधर डेढ़ सौ रुपये डांड़ के भरे। यह है गऊ होने का फल। मेरे सामने जोड़ी ले जाते, तो देखता। तीनों को यहीं जमीन पर सुला देता। और पंचों से तो बात [ १९८ ]
तक न करता। देखता, कौन मुझे बिरादरी से अलग करता है, लेकिन तुम बैठे ताकते रहे।

होरी ने अपराधी की भांति सिर झुका लिया, लेकिन धनिया यह अनीति कैसे देख सकती थी? बोली-बेटा, तुम भी अंधेर करते हो। हुक्का-पानी बंद हो जाता, तो गांव में निर्वाह कैसे होता, जवान लड़की बैठी है, उसका भी कहीं ठिकाना लगाना है या नहीं? मरने-जीने में आदमी बिरादरी...

गोबर ने बात काटी-हुक्का-पानी सब तो था, बिरादरी में आदर भी था, फिर मेरा ब्याह क्यों नहीं हुआ? बोलो! इसलिए कि घर में रोटी न थी। रुपये हों तो न हुक्का-पानी का काम है, न जात-बिरादरी का। दुनिया पैसे की है, हुक्का-पानी कोई नहीं पूछता।

धनिया तो बच्चे का रोना सुनकर भीतर चली गई और गोबर भी घर से निकला। होरी बैठा सोच रहा था। लड़के की अकल जैसे खुल गई है। कैसी बेलाग बात कहता है। उसकी वक्र बुद्धि ने होरी के धर्म और नीति को परास्त कर दिया था।

सहसा होरी ने उससे पूछा-मैं भी चला चलूं

'मैं लड़ाई करने नहीं जा रहा हूं दादा, डरो मत। मेरी ओर तो कानून है, मैं क्यों लड़ाई करने लगा?'

'मैं भी चलूं तो कोई हरज है?'

'हां, बड़ा हरज है। तुम बनी बात बिगड़ दोगे।'

होरी चुप हो गया और गोबर चल दिया।

पांच मिनट भी न हुए होंगे कि धनिया बच्चे को लिए बाहर निकली और बोली-क्या गोबर चला गया, अकेले? मैं कहती हूं, तुम्हें भगवान् कभी बुद्धि देंगे या नहीं। भोला क्या सहज में गोई देगा? तीनों उस पर टूट पड़ेंगे बाज की तरह। भगवान् ही कुसल करें। अब किस्से कहूं दौड़कर गोबर को पकड़ लो। तुमसे तो मैं हार गई।

होरी ने कोने से डंडा उठाया और गोबर के पीछे दौड़ गांव के बाहर आकर उसने निगाह दौड़ाई। एक क्षीण-सी रेखा क्षितिज से मिली हुई दिखाई दी। इतनी ही देर में गोबर इतनी दूर कैसे निकल गया। होरी की आत्मा उसे धिक्कारने लगी। उसने क्यों गोबर को रोका नहीं? अगर वह डांटकर कह देता, भोला के घर मत जाओ, तो गोबर कभी न जाता। और अब उससे दौड़ा भी तो नहीं जाता। वह हारकर वहीं बैठ गया और बोला-उसकी रच्छा करो महावीर स्वामी।

गोबर उस गांव में पहुंचा तो देखा, कुछ लोग बरगद के नीचे बैठे जुआ खेल रहे हैं। उसे देखकर लोगों ने समझा, पुलिस का सिपाही है। कौड़ियां समेटकर भागे कि सहसा जंगी ने पहचानकर कहा-अरे, यह तो गोबरधन है।

गोबर ने देखा, जंगी पेड़ की आड़ में खड़ा झांक रहा है। बोला-डरो मत जंगी भैया, मैं हूं। रामराम आज ही आया हूं। सोचा, चलूं सबसे मिलता आऊं, फिर न जाने कब आना हो। मैं तो भैया, तुम्हारे आसिरवाद से बड़े सजे में निकल गया। जिस राजा की नौकरी में हूं उन्होंने मुझसे कहा है कि एक-दो आदमी मिल जाएं तो लेते आना। चौकीदारी के लिए चाहिए।

मैंने कहा, सरकार ऐसे आदमी दूंगा कि चाहे जान चली जाय मैदान से हटने वाले नहीं, इच्छा हो तो मेरे साथ चलो। अच्छी जगह है।

जंगी उसका ठाट-बाट देखकर रोब में आ गया। उसे कभी चमरौधे जूते भी मयस्सर न [ १९९ ]
हुए थे। और गोबर चमाचम बूट पहने था। साफ-सुथरी धारीदार कमीज, संवारे हुए बाल, पूरा बाबू साहब बना हुआ। फटेहाल गोबर और इस परिष्कृत गोबर में बड़ा अंतर था हिंसा-भाव तो यों ही समय के प्रभाव से शांत हो गया था और बचा-खुचा अब शांत हो गया। जुआरी था ही, उस पर गांजे की लत और घर में बड़ी मुश्किल से पैसे मिलते थे। मुंह में पानी भर आया। बोला-चलूंगा क्यों नहीं, यहां पड़ा-पड़ा मक्खी ही तो मार रहा हूं। कै रुपये मिलेंगे?

गोबर ने बड़े आत्मविश्वास से कहा-इसकी कुछ चिंता मत करो। सब कुछ अपने ही हाथ में है। जो चाहोगे, वह हो जायगा। हमने सोचा, जब घर में ही आदमी है, तो बाहर क्यों जाएं?

जंगी ने उत्सुकता से पूछा--काम क्या करना पड़ेगा?

काम चाहे चौकीदारी करो, चाहे तगादे पर जाओ। तगादे का काम सबसे अच्छा। अमामी से गठ गए। आकर मालिक से कह दिया, घर पर मिला ही नहीं, चाहो तो रुपये-आठ आने जो बना सकते हो।

'रहने की जगह भी मिलती है।'

'जगह की कौन कमी? पूरा महल पड़ा है। पानी का नल, बिजली, किसी बात की कमी नहीं है। कामत हैं कि कहीं गए हैं?'

'दूध लेकर गए हैं। मुझे कोई बाजार नहीं जाने देता। कहते हैं, तुम तो गांजा पी जाते हो। मैं अब बहुत कम पीता हूं भैया, लेकिन दो पैस रोज तो चाहिए ही। तुम कामता से कुछ न कहना। मैं तुम्हारे साथ चलूंगा।'

'हां-हां बेखटके चलो। होली के बाद।'

'तो पक्की रही'

दोनों आदमी बातें करते भोला के द्वार पर आ पहुंचे। भोला बैठे सुतली कात रहे थे। गोबर ने लपककर उनके चरण छुए और इस वक्त उसका गला सचमुच भर आया। बोला-काका मुझसे जो कुछ भूल-चूक हुई, उसे छमा करो।

भोला ने सुतली कातना बंद कर दिया और पथरीले स्वर में बोला -काम तो तुमने ऐसा ही किया था गोबर, कि तुम्हारा सिर काट दूं तो भी पाप न लगे, लेकिन अपने द्वार पर आए हो, अब क्या कहूं। जाओ, जैसा मेरे साथ किया, उसकी सजा भगवान् देंगे। कब आए?

गोबर ने खूब नमक-मिर्च लगाकर अपने भाग्योदय का वृत्तांत कहा, और जंगी को अपने साथ ले जाने की अनुमति मांगी। भोला को जैसे बेमांगे वरदान मिल गया। जंगी घर पर एक-न-एक उपद्रव करता रहता था। बाहर चला जाएगा, तो चार पैसे पैदा तो करेगा। न किसी को कुछ दे, अपना बोझ तो उठा लेगा।

गोबर ने कहा-नहीं काका, भगवान् ने चाहा और इनसे रहते बना तो साल-दो-साल में आदमी बन जाएंगे।

'हां, जब इनसे रहते बने।'

'सिर पर आ पड़ती है, तो आदमी आप संभल जाता है।'

'तो कब तक जाने का विचार है?'

'होली करके चला जाऊंगा। यहां खेती-बारी का सिलसिला फिर जमा दूं, तो निश्चिंत हो जाऊं।' [ २०० ]

'होरी से कहो, अब बैठ के ‘राम-राम करें।'

'कहता तो हूं, लेकिन जब उनसे बैठा जाय।'

‘वहां किसी बैद से तो तुम्हारी जान-पहचान होगी। खासी बहुत दिक कर रही है। हो सके तो कोई दवाई भेज देना।'

'एक नामी बैद तो मेरे पड़ोस ही में रहते हैं। उनसे हाल कहके दबा बनवाकर भेज दूंगा। खांसी रात को जोर करती है कि दिन को?'

'नहीं बेटा, रात को। आंख नहीं लगती। नहीं वहां कोई डौल हो, तो मैं भी वहीं चलकर रहूं। यहां तो कुछ परता नहीं पड़ता।'

'रोजगार का जो मजा तो वहां है काका, यहां क्या होगा? यहां रुपये का दस सेर दूध भी कोई नहीं पूछता। हलवाइयों के गले लगाना पड़ता है। वहां पांच-छः सेर के भाव से चाहो तो घड़ी में मनों दूध बेच लो।'

जंगी गोबर के लिए दूधिया शर्बत बनाने चला गया था। भोला ने एकांत देखकर कहा-और भैया, अब इस जंजाल से जी ऊब गया है। जंगी का हाल देखते ही हो। कामता दूध लेकर जाता है। सानी-पानी, खोलना-बांधना सब मुझे करना पड़ता है। अब तो यही जी चाहता है कि सुख से कहीं एक रोटी खाऊं और पड़ा रहूं। कहां तक हाय-हाय करूं। रोज लड़ाई-झगड़ा। किस-किसके पांव सहलाऊं? खांसी आती है, रात को उठा नहीं जाता, पर कोई एक लोटे पानी को भी नहीं पूछता। पगहिया टूट गई है, मुदा किसी को इसकी सुधि नहीं है। जब मैं बनाऊंगा तभी बनेगी।

गोबर ने आत्मीयता के साथ कहा-तुम चलो लखनऊ काका। पांच सेर का दूध बेचो, नगद। कितने ही बड़े-बड़े अमीरों से मेरी जान-पहचान है। मन-भर दूध की निकासी का जिम्मा मैं लेता हूं। मेरी चाय की दुकान भी है। दस सेर दूध तो मैं ही नित लेता हूं। तुम्हें किसी तरह का कष्ट न होगा।

जंगी दूधिया शर्बत ले आया। गोबर ने एक गिलास शर्बत पीकर कहा-तुम तो खाली सांझ-सबेरे चाय को दूकान पर बैठ जाओ काका, तो एक रुपया कहीं नहीं गया है।

भोला ने एक मिनट के बाद संकोच-भरे भाव से कहा-क्रोध में बेटा, आदमी अंधा हो जाता है। मैं तुम्हारी गोई खोल लाया था। उसे लेते जाना। यहां कौन खेती-बारी होती है।

'मैंने तो एक नई गोई ठीक कर ली है काका।'

'नहीं-नहीं, नई गोई लेकर क्या करोगे? इसे लेते जाओ।'

'तो मैं तुम्हारे रुपये भिजवा दूंगा।'

'रुपये कहीं बाहर थोड़े ही हैं बेटा, घर में ही तो हैं। बिरादरी का ढकोसला है, नहीं तुममें और हममें कौन भेद है? सच पूछो तो मुझे खुस होना चाहिए था कि झुनिया भले घर में है, और आराम से है। और मैं उसके खून का प्यासा बन गया था।'

संध्या के समय गोबर यहां से चला, तो गोई उसके साथ थी और दही की दो हाड़िया लिए जंगी पीछे-पीछे आ रहा था।