गोदान/ भाग 17

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गोदान  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

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थे। साल-साल भर तलब नहीं मिलती थी। उसे छोड़कर दूसरे की नौकरी की। उसने दो साल तक एक पाई न दी। एक बार दादा गरम पड़े, तो मारकर भगा दिया। इनके वादों का कोई करार नहीं।'

'मैं आज ही बिल भेजता हूं।'

'भेजा करो। कह देंगे, कल आना कल अपने इलाके पर चले जायंगे। तीन महीने में लौटेंगे।'

ओंकारनाथ संशय में पड़ गए। ठीक तो है, कहीं रायसाहब पीछे से मुकर गए तो वह क्या कर लेंगे? फिर भी दिल मजबूत करके कहा-ऐसा नहीं हो सकता। कम-से-कम रायसाहब को मैं इतना धोखेबाज नहीं समझता। मेरा उनके यहां कुछ बाकी नहीं है।

गोमती ने उसी संदेह के भाव से कहा-इसी से तो मैं तुम्हें बुद्धु कहती हूं। जरा किसी ने सहानुभूति दिखाई और तुम फूल उठे। मोटे रईस हैं। इनके पेट में ऐसे कितने वादे हजम हो सकते हैं। जितने वादे करते हैं, अगर सब पूरा करने लगें, तो भीख मांगने की नौबत आ जाय। मेरे गांव के ठाकुर साहब तो दो-दो, तीन-तीन साल तक बनियों का हिसाब न करते थे। नौकरों का वेतन तो नाम के लिए देते थे। साल-भर काम लिया, जब नौकर ने वेतन मांगा, मारकर निकाल दिया। कई बार इसी नादेिहंदी में स्कूल से उनके लड़कों के नाम कट गए। आखिर उन्होंने लड़कों को घर बुला लिया। एक बार रेल का टिकट भी उधार मांगा था। यह रायसाहब भी तो उन्हीं के भाईबंद हैं। चलो, भोजन करो और चक्की पीसो, जो तुम्हारे भाग्य में लिखा है। यह समझ लो कि ये बड़े आदमी तुम्हें फटकारते रहें, वही अच्छा है। यह तुम्हें एक पैसा देंगे, तो उसका चौगुना अपने असामियों से वसूल कर लेंगे। अभी उनके विषय में जो कुछ चाहते हो, लिखते हो। तब तो ठकुरसोहाती ही करनी पड़ेगी।

पंडितजी भोजन कर रहे थे, पर कौर मुंह में फंसा हुआ जान पड़ता था। आखिर बिना दिल का बोझ हल्का किए, भोजन करना कठिन हो गया। बोले-अगर रुपये न दिए, तो ऐसी खबर लूंगा कि याद करेंगे। उनकी चोटी मेरे हाथ में है। गांव के लोग झूठी खबर नहीं दे सकते। सच्ची खबर देते तो उनकी जान निकलती है, झूठी खबर क्या देंगे। रायसाहब के खिलाफ एक रिपोर्ट मेरे पास आई है। छाप दूं, तो बचा को घर से निकलना मुश्किल हो जाय। मुझे वह खैरात नहीं दे रहे हैं, बड़े दबसट में पड़कर इस राह पर आए हैं। पहले धमकियां दिखा रहे थे। जब देखा, इससे काम न चलेगा, तो यह चारा फेंका। मैंने भी सोचा, एक इनके ठीक हो जाने से तो देश से अन्याय मिटा जाता नहीं, फिर क्यों न इस दान को स्वीकार कर लूं? मैं अपने आदर्श से गिर गया हूं जरूर, लेकिन इतने पर भी रायसाहब ने दगा की, तो मैं भी शठता पर उतर आऊंगा। जो गरीबों को लूटता है, उसको लूटने के लिए अपनी आत्मा को बहुत समझाना न पड़ेगा।

सत्रह

गाँव में खबर फैल गई कि रायसाहब ने पंचों को बुलाकर खूब डांटा और इन लोगों ने जितने रुपये वसूल किए थे, वह सब इनके पेट से निकाल लिए। वह तो इन लोगों को जेहल भेजवा
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रहे थे, लेकिन इन लोगों ने हाथ-पांव जोड़े, थूककर चाटा, तब जाके उन्होंने छोड़ा! धनिया का कलेजा शीतल हो गया, गांव में घूम-घूमकर पंचों को लज्जित करती फिरती थी-आदमी न सुने गरीबों की पुकार, भगवान् तो सुनते हैं। लोगों ने सोचा था, इनसे डांड़ लेकर मजे से फुलौड़ियां खायंगे। भगवान् ने ऐसा तमाचा लगाया कि फुलौड़ियां मुंह से निकल पड़ीं। एक-एक के दो-दो भरने पड़े। अब चाटो मेरा मकान लेकर।

मगर बैलों के बिना खेती कैसे हो? गांवों में बोआई शुरू हो गई। कार्तिक के महीने में किसान के बैल मर जायं, तो उसके दोनों हाथ कट जाते हैं। होरी के दोनों हाथ कट गए थे। और सब लोगों के खेतों में हल चल रहे थे। बीज डाले जा रहे थे। कहीं-कहीं गीत की तानें सुनाई देती थीं। होरी के खेत किसी अनाथ अबला के घर की भांति सूने पड़े थे। पुनिया के पास भी गोई थी, सोभा के पास भी गोई थी, मगर उन्हें अपने खेतों की बुआई से कहां फुरसत कि होरी की बुआई करें। होरी दिन-भर इधर-उधर मारा-मारा फिरता था। कहीं इसके खेत में जा बैठता, कहीं उसकी बोआई करा देता। इस तरह कुछ अनाज मिल जाता। धनिया, रूपा, सोना सभी दूसरों की बोआई में लगी रहती थीं। जब तक बुआई रही, पेट की रोटियां मिलती गईं, विशेष कष्ट न हुआ। मानसिक वेदना तो अवश्य होती थी, पर खाने भर को मिल जाता था। रात को नित्य स्त्री-पुरुष में थोड़ी-सी लड़ाई हो जाती थी।

यहां तक कि कातिक का महीना बीत गया और गांव में मजदूरी मिलनी भी कठिन हो गई। अब सारा दारमदार ऊख पर था, जो खेतों में खड़ी थी।

रात का समय था। सर्दी खूब पड़ रही थी। होरी के घर में आज कुछ खाने को न था। दिन को तो थोड़ा-सा भुना हुआ मटर मिल गया था, पर इस वक्त चूल्हा जलने का कोई डौल न था और रूपा भूख के मारे व्याकुल थी और द्वार पर कौड़े के सामने बैठी रो रही थी। घर में जब अनाज का एक दाना भी नहीं है, तो क्या मांगे, क्या कहे!

जब भूख न सही गई तो वह आग मांगने के बहाने पुनिया के घर गई। पुनिया बाजरे की रोटियां और बथुए का साग पका रही थी। सुगंध से रूपा के मुंह में पानी भर आया।

पुनिया ने पूछा-क्या अभी तेरे घर आग नहीं जली, क्या री?

रूपा ने दीनता से कहा-आज तो घर में कुछ था ही नहीं, आग कहां से जलती।

'तो फिर आग काहे को मांगने आई है?'

'दादा तमाखू पिएंगे।'

पुनिया ने उपले की आग उसकी ओर फेंक दी, मगर रूपा ने आग उठाई नहीं और समीप जाकर बोली-तुम्हारी रोटियां महक रही हैं काकी मुझे बाजरे की रोटियां बड़ी अच्छी लगती हैं।

पुनिया ने मुस्कराकर पूछा-खाएगी?

'अम्मां डांटेगी।'

'अम्मां से कौन कहने जायगा?'

रूपा ने पेट-भर रोटियां खाईं और जूठे मुंह भागी हुई घर चली गई।

होरी मन-मारे बैठा था कि पंडित दातादीन ने जाकर पुकारा। होरी की छाती धड़कने लगी। क्या कोई नई विपत्ति आने वाली है? आकर उनके चरण छुए और कौड़े के सामने उनके लिए मांची रख दी। [ १६७ ]

दातादीन ने बैटते हुए अनुग्रह भाव से कहा-अबकी तो तुम्हारे खेत परती पड़ गए होरी। तुमने गांव में किसी से कुछ कहा नहीं, नहीं भोला की मजाल थी कि तुम्हारे द्वार से बैल खोल ले जाता। यहीं लहास गिर जाती। तुमसे जनेऊ हाथ में लेकर कहता हूं होरी, मैंने तुम्हारे ऊपर डांड़ न लगाया था। धनिया मुझे नाहक बदनाम करती फिरती है। यह सब लाला पटेश्वरी और झिंगुरीसिंह की कारस्तानी है। मैं तो लोगों के कहने से पंचायत में बैठ भर गया था। वह लोग तो और कड़ा दंड लगा रहे थे। मैंने कह-सुनके कम कराया, मगर अब सब जने सिर पर हाथ धरे रो रहे हैं। समझे थे, यहां उन्हीं का राज है। यह न जानते थे कि गांव का राजा कोई और है। तो अब अपने खेतों की बोआई का क्या इंतजाम कर रहे हो?

होरी ने करुण-कंठ से कहा-क्या बताऊं महाराज, परती रहेंगे।

'परती रहेंगे? यह तो बड़ा अनर्थ होगा।'

'भगवान् की यही इच्छा है, तो अपना क्या बस।'

'मेरे देखते तुम्हारे खेत कैसे परती रहेंगे? कल मैं तुम्हारी बोआई करा दूंगा। अभी खेतों में कुछ तरी है। उपज दस दिन पीछे होगी, इसके सिवा और कोई बात नहीं। हमारा-तुम्हारा आधा साझा रहेगा। इसमें न तुम्हें कोई टोटा है, न मुझे। मैंने आज बैठे-बैठे सोचा, तो चित्त बड़ा दुखी कि जुते-जुताए खेत परती रह जाते हैं।'

होरी सोच में पड़ गया। चौमासे-भर इन खेतों में खाद डाली, जोता और आज केवल बोआई के लिए आधी फसल देनी पड़ रही है। उस पर एहसान कैसा जता रहे हैं, लेकिन इससे तो अच्छा यही है कि खेत परती पड़ जायं। और कुछ न मिलेगा, लगान तो निकल ही आएगा। नहीं, अबकी बेबाकी न हुई, तो बेदखली आई धरी है।

उसने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

दातादीन प्रसन्न होकर बोले-तो चलो, मैं अभी बीज तौल दूं, जिसमें सबेरे का झंझट न रहे। रोटी तो खा ली है न?

होरी ने लजाते हुए आज घर में चूल्हा न जलने की कथा कही।

दातादीन ने मीठे उलाहने के भाव से कहा-अरे! तुम्हारे घर में चूल्हा नहीं जला और तुमने मुझसे कहा भी नहीं। हम तुम्हारे बैरी तो नहीं थे। इसी बात पर तुमसे मेरा जी कुढ़ता है। अरे भले आदमी, इसमें लाज-सरम की कौन बात है हम सब एक ही तो हैं। तुम सूद्र हुए तो क्या, हम बाम्हन हुए तो क्या, हैं तो सब एक ही घर के। दिन सबके बराबर नहीं जाते। कौन जाने, कल मेरे ही ऊपर कोई संकट आ पड़े, तो मैं तुमसे अपना दु:ख न कहूंगा तो किससे कहूंगा? अच्छा जो हुआ, चलो, बेंग ही के साथ तुम्हें मन-दो-मन अनाज खाने को भी तौल दूंगा।

आध घंटे में होरी मन-भर जौ का टोकरा सिर पर रखे आया और घर की चक्की चलने लगी। धनिया रोती थी और सोना के साथ जौ पीसती थी। भगवान् उसे किस कुकर्म का यह दंड दे रहे हैं।

दूसरे दिन से बोआई शुरू हुई। होरी का सारा परिवार इस तरह काम में जुटा हुआ था, मानो सब कुछ अपना ही है। कई दिन के बाद सिंचाई भी इसी तरह हुई। दातादीन को सेंत-मेंत के मजूर मिल गए। अब कभी-कभी उनका लड़का मातादीन भी घर में आने लगा। जवान आदमी था, बड़ा रसिक और बातचीत का मीठा। दातादीन जो कुछ छीन-झपटकर लाते [ १६८ ]
वह उसे भांग बूटी में उड़ाता था। एक चमारिन से उसकी आशनाई हो गई थी, इसलिए अभी तक ब्याह न हुआ था। वह रहती अलग थी, पर सारा गांव यह रहस्य जानते हुए भी कुछ न बोल सकता था? हमारा धर्म है हमारा भोजन। भोजन पवित्र रहे, फिर हमारे धर्म पर कोई आंच नहीं आ सकती। रोटियां ढाल बनकर अधर्म से हमारी रक्षा करती हैं।

अब साझे की खेती होने से मातादीन को झुनिया से बातचीत करने का अवसर मिलने लगा। वह ऐसे दांव से आता, जब घर में झुनिया के सिवा और कोई न होता, कभी किसी बहाने से, कभी किसी बहाने से झुनिया रूपवती न थी, लेकिन जवान थी और उसकी चमारिन प्रेमिका से अच्छी थी। कुछ दिन शहर में रह चुकी थी, पहनना-ओढ़ना, बोलना-चालना जानती थी और लज्जाशील भी थी, जो स्त्री का सबसे बड़ा आकर्षण है। मातादीन कभी-कभी उसके बच्चे को गोद में उठा लेता और प्यार करता। झुनिया निहाल हो जाती थी।

एक दिन उसने झुनिया से कहा-तुम क्या देखकर गोबर के साथ आईं झूना?

झुनिया ने लजाते हुए कहा-भाग खींच लाया महराज, और क्या कहूं।

मातादीन दु:खी मन से बोला-बड़ा बेवफा आदमी है। तुम जैसी लच्छमी को छोड़कर न जाने कहां मारा-मारा फिर रहा है। चंचल सुभाव का आदमी है, इसी से मुझे संका होती है कि कहीं और न फंस गया हो। ऐसे आदमियों को तो गोली मार देनी चाहिए। आदमी का धरम है, जिसकी बांह पकड़े, उसे निभाए। यह क्या कि एक आदमी की जिंदगानी खराब कर दी और दूसरा घर ताकने लगे।

युवती रोने लगी। मातादीन ने इधर-उधर ताककर उसका हाथ पकड़ लिया और समझाने लगा-तुम उसकी क्यों परवा करती हो झूना, चला गया, चला जाने दो। तुम्हारे लिए किस बात की कमी है? रुपया-पैसा, गहना, कपड़ा, जो चाहो मुझसे लो।

झुनिया ने धीरे से हाथ छुड़ा लिया और पीछे हटकर-बोली-सब तुम्हारी दया है महाराज में तो कहीं दी न रही। घर से भी गई, यहां से भी गई। न माया मिली, न राम ही हाथ आए। दुनिया का रंग-ढंग न जानती थी। इसकी मीठी-मीठी बातें सुनकर जाल में फंस गई।

मातादीन ने गोबर की बुराई करनी शुरू की—वह तो निरा लफंगा है, घर का न घाट का। जब देखो, मां-बाप से लड़ाई। कहीं पैसा पा जाय, चट जुआ खेल डालेगा, चरस और गांजे में उसकी जान बसती थी, सोहदों के साथ घूमना, बहू-बेटियों को छेड़ना, यही उसका काम था। थानेदार साहब बदमासी में उसका चालान करने वाले थे, हम लोगों ने बहुत खुसामद की, तब जाकर छोड़ा। दूसरों के खेत-खलिहान से अनाज उड़ा लिया करता। कई बार तो खुद उसी ने पकड़ था, पर गांव-घर का समझकर छोड़ दिया।

सोना ने बाहर आकर कहा-भाभी, अम्मां ने कहा है, अनाज निकालकर धूप में डाल दो, नहीं चोकर बहुत निकलेगा। पंडित ने जैसे बखार में पानी डाल दिया हो।

मातादीन ने अपनी सफाई दी-मालूम होता है, तेरे घर में बरसात नहीं हुई। चौमासे में लकड़ी तक गीली हो जाती है, अनाज तो अनाज ही है।

यह कहता हुआ वह बाहर चला गया। सोना ने आकर उसका खेल बिगाड़ दिया।

सोना ने झुनिया से पूछा-मातादीन क्या करने आए थे?

झुनिया ने माथा सिकोड़कर कहा-पगहिया मांग रहे थे। मैंने कह दिया, यहां पगहिया [ १६९ ]
नहीं है।

'यह सब बहाना है। बड़ा खराब आदमी है।'

'मुझे तो बड़ा भला आदमी लगता है। क्या खराबी है उसमें?'

'तुम नहीं जानतीं? सिलिया चमारिन को रखे हुए है।'

'तो इसी से खराब आदमी हो गया?'

'और काहे से आदमी खराब कहा जाता है?'

'तुम्हारे भैया भी तो मुझे लाये हैं। वह भी खराब आदमी हैं?'

सोना ने इसका जवाब न देकर कहा-मेरे घर में फिर कभी आएगा, तो दुतकार दूंगी।

'और जो उससे तुम्हारा ब्याह हो जाय?'

सोना लजा गई-तुम तो भाभी, गाली देती हो।

'क्यों, इसमें गाली की क्या बात है?'

'मुझसे बोले, तो मुंह झुलस दूं।'

'तो क्या तुम्हारा ब्याह किसी देवता से होगा। गांव में ऐसा सुंदर, सजीला जवान दूसरा कौन है?'

'तो तुम चली जाओ उसके साथ, सिलिया से लाख दर्जे अच्छी हो।'

'मैं क्यों चली जाऊं? मैं तो एक के साथ चली आई। अच्छा है या बुरा।'

'तो मैं भी जिसके साथ ब्याह होगा, उसके साथ चली जाऊंगी, अच्छा हो या बुरा।'

'और जो किसी बूढ़े के साथ ब्याह हो गया?'

सोना हंसी-मैं उसके लिए नरम-नरम रोटियां पकाऊंगी, उसकी दवाइयां कूटूंगी, छानूंगी, उसे हाथ पकड़कर उठाऊंगी, जब मर जायगा, तो मुंह ढांपकर रोऊंगी।

'और जो किसी जवान के साथ हुआ?'

'तब तुम्हारा सिर, हां नहीं तो।'

'अच्छा बताओ, तुम्हें बूढ़ा अच्छा लगता है कि जवान।'

'जो अपने को चाहे, वही जवान है, न चाहे वही बूढ़ा है।'

'दैव करे, तुम्हारा ब्याह किसी बूढे से हो जाय, तो देखूं, तुम उसे कैसे सोहती हो। तब मनाओगी, किसी तरह यह निगोड़ा मर जाय, तो किसी जवान को लेकर बैठ जाऊं।'

'मुझे तो उस बूढ़े पर दया आए।'

इस साल इधर एक शक्कर का मिल खुल गया था। उसके कारिंदे और दलाल गांव-गांव घूमकर किसानों की खड़ी ऊख मोल ले लेते थे। वही मिल था, जो मिस्टर खन्ना ने खोला था। एक दिन उसका कारिंदा इस गांव में भी आया। किसानों ने जो उससे भाव-ताव किया, तो मालूम हुआ, गुड़ बनाने में कोई बचत नहीं है। जब घर में ऊख पेरकर भी यही दाम मिलता है, तो पेरने की मेहनत क्यों उठाई जाय? सारा गांव खड़ी ऊख बेचने को तैयार हो गया। अगर कुछ कम भी मिले, तो परवाह नहीं। तत्काल तो मिलेगा? किसी को बैल लेना था, किसी को बाकी चुकाना था, कोई महाजन से गला छुड़ाना चाहता था। होरी को बैलों की गोई लेनी थी। अबकी ऊख की पैदावार अच्छी न थी, इसलिए यह डर भी था कि माल न पड़ेगा। और जब गुड़ के भाव मिल की चीनी मिलेगी, तो गुड़ लेगा ही कौन? सभी ने बयाने ले लिए। होरी को कम-से-कम सौ रुपये की आशा थी। इतने में एक [ १७० ]
मामूली गोई आ जायगी, लेकिन महाजनों को क्या करे। दातादीन, मंगरू, दुलारी, झिंगुरीसिंह सभी तो प्राण खा रहे थे। अगर महाजनों को देने लगेगा, तो सौ रुपये सूद-भर को भी न होंगे। कोई ऐसी जुगत न सूझती थी कि ऊख के रुपये हाथ में आ जायं और किसी को खबर न हो। जब बैल घर आ जायेंगे, तो कोई क्या कर लेगा? गाड़ी लदेगी, तो सारा गांव देखेगा ही, तौल पर जो रुपये मिलेंगे, वह सबको मालूम हो जायंगे। संंभव है, मंगरू और दातादीन हमारे साथ-साथ रहें। इधर रुपये मिले, उधर उन्होंने गर्दन पकड़ी।

शाम को गिरधर ने पूछा-तुम्हारी ऊख कब तक जायगी होरी काका?

होरी ने झांसा दिया-अभी तो कुछ ठीक नहीं है भाई, तुम कब तक ले जाओगे?

गिरधर ने भी झांसा दिया- अभी तो मेरा भी कुछ ठीक नहीं है काका।

और लोग भी इसी तरह की उड़नघाइयां बताते थे, किसी को किसी पर विश्वास न था। झिंगुरीसिंह के सभी रिनियां थे,और सबकी यही इच्छा थी कि झिंगुरीसिंह के हाथ रुपये न पड़ने पाएं, नहीं वह सब-का-सब हजम कर जायगा। और जब दूसरे दिन असामी फिर रुपये मांगने जायगा, तो नया कागज, नया नजराना, नई तहरीर। दूसरे दिन शोभा आकर बोला-दादा, कोई ऐसा उपाय करो कि झिंगुरीसिंह को हैजा हो जाय। ऐसा गिरे कि फिर न उठे।

होरी ने मुस्कराकर कहा-क्यों, उसके बाल-बच्चे नहीं हैं?

'उसके बाल-बच्चों को देखें कि अपने बाल-बच्चों को देखें? वह तो दो-दो मेहरियां को आराम से रखता है, यहां तो एक को रूखी रोटी भी मयस्सर नहीं। सारी जमा ले लेगा। एक पैसा भी घर न लाने देगा।'

'मेरी तो हालत और भी खराब है भाई, अगर रुपये हाथ से निकल गये, तो तबाह हो जाऊंगा। गोई के बिना तो काम न चलेगा।'

'अभी तो दो-तीन दिन ऊख ढोते लगेंगे। ज्योंही सारी ऊख पहुंच जाय, जमादार से कहे कि भैया कुछ ले ले, मगर ऊख झटपट तौल दे, दाम पीछे देना। इधर झिंगुरी से कह देंगे, अभी रुपये नहीं मिले।'

होरी ने विचार करके कहा झिंगुरीसिंह हमसे-तुमसे कई गुना चतुर है सोभा। जाकर मुनीम से मिलेगा और उसी से रुपये ले लेगा। हम-तुम ताकते रह जायंगे। जिस खन्ना बाबू का मिल है, उन्हीं खन्ना बाबू की महाजनी कोठी भी है। दोनों एक हैं।

सोभा निराश होकर बोला-न जाने इन महाजनों से कभी गला छूटेगा कि नहीं।

होरी बोला-इस जनम में तो कोई आसा नहीं है भाई! हम राज नहीं चाहते, भोग-विलास नहीं चाहते, खाली मोटा-झोटा पहनना, और मोटा-झोटा खाना और मरजाद के साथ रहना चाहते हैं, वह भी नहीं सधता।

सोभा ने धूर्तता के साथ कहा-मैं तो दादा, इन सबों को अबकी चकमा दूंगा। जमादार को कुछ दे-दिलाकर इस बात पर राजी कर लूंगा कि रुपये के लिए हमें खूब दौड़ाएं झिंगुरी कहा तक दौड़ेंगे।

होरी ने हंसकर कहा—यह सब कुछ न होगा भैया। कुसल इसी में है कि झिंगुरीसिंह के हाथ-पांव जोड़ो। हम जाल में फंसे हुए हैं। जितना ही फड़फड़ओगे, उतना ही ओर जकड़ते जाओगे।

'तुम तो दादा, बूढ़ों की-सी बातें कर रहे हो। कठघरे में फंसे बैठे रहना तो कायरता है। [ १७१ ]
फंदा और जकड़ जाय बला से, पर गला छुड़ाने के लिए जोर तो लगाना ही पड़ेगा। यही तो होगा झिंगुरी घर-द्वार नीलाम करा लेंगे, करा लें नीलाम। मैं तो चाहता हूं कि हमें कोई रुपये न दे, हमें भूखों मरने दे, लातें खाने दे, एक पैसा भी उधार न दे, लेकिन पैसा वाले उधार न दें तो सूद कहां से पाएं? एक हमारे ऊपर दावा करता है, तो दूसरा हमें कुछ कम सूद पर रुपये उधार देकर अपने जाल में फंसा लेता है। मैं तो उसी दिन रुपये लेने जाऊंगा, जिस दिन झिंगुरी कहीं चला गया होगा।

होरी का मन भी विचलित हुआ-हां, यह ठीक है।

'ऊख तुलवा देंगे। रुपये दांव-घात देखकर ले आयंगे।'

'बस-बस, यही चाल चलो।'

दूसरे दिन प्रातकाल गांव के कई आदमियों ने ऊख काटनी शुरू की। होरी भी अपने खेत में गंड़ासा लेकर पहुंचा। उधर से सोभा भी उसकी मदद को आ गया। पुनिया, झुनिया, धनिया, सोना सभी खेत में जा पहुंचीं। कोई ऊख काटता था, कोई छोलता था, कोई पूल बांधता था। महाजनों ने जो ऊख कटते देखी, तो पेट में चूहे दौड़े। एक तरफ से दुलारी दौड़ी, दूसरी तरफ से मंगरूसाह, तीसरी ओर से मातादीन और पटेश्वरी और झिंगुरी के पियादे। दुलारी हाथ-पांव में मोटे-मोटे चांदी के कड़े पहने, कानों में सोने का झुमका, आंखों में काजल लगाए, बूढ़े यौवन को रंगे-रंगाए आकर बोली-पहले मेरे रुपये दे दो, तब ऊख काटने दूंगी। मैं जितना गम खाती हूं, उतना ही तुम शेर होते हो। दो साल से एक धेला सूद नहीं दिया, पचास तो मेरे सूद के होते हैं।

होरी ने चिचियाकर कहा-भाभी, ऊख काट लेने दो, इसके रुपये मिलते हैं, तो जितना हो सकेगा, तुमको भी दूंगा। न गांव छोड़कर भागा जाता हूं, न इतनी जल्दी मौत ही आई जाती है। खेत में खड़ी ऊख तो रुपये न देगी?

दुलारी ने उसके हाथ से गंड़ासा छीनकर कहा-नीयत इतनी खराब हो गई तुम लोगों की, तभी तो बरक्कत नहीं होती।

आज पांच साल हुए, होरी ने दुलारी से तीस रुपये लिए थे। तीन साल में उसके सौ रुपये हो गए, तब स्टांप लिखा गया। दो साल में उस पर पचास रुपया सूद चढ़ गया था।

होरी बोला-सहुआइन, नीयत तो कभी खराब नहीं की, और भगवान् चाहेंगे, तो पाई-पाई चुका दूंगा। हां, आजकल तंग हो गया हूं, जो चाहे कह लो।

सहुआइन को जाते देर नहीं हुई कि मंगरू साह पहुंचे। काला रंग, तोंद कमर के नीचे लटकती हुई, दो बड़े-बड़े दांत सामने जैसे काट खाने को निकले हुए, सिर पर टोपी, गले में चादर, उम्र अभी पचास से ज्यादा नहीं, पर लाठी के सहारे चलते थे। गठिया का मरज हो गया था। खांसी भी आती थी। लाठी टेककर खड़े हो गए और होरी को डांट बताई-पहले हमारे रुपये दे दो होरी, तब ऊब काटो। हमने रुपये उधार दिए थे, खैरात नहीं थे। तीन-तीन साल हो गए, न सूद न ब्याज, मगर यह न समझना कि तुम मेरे रुपये हजम कर जाओगे मैं तुम्हारे मुर्दे से भी वसूल कर लूंगा।

सोभा मसखरा था। बोला-तब काहे को घबड़ाते हो साहजी, इनके मुर्दे ही से वसूल कर लेना। नहीं, एक-दो साल के आगे-पीछे दोनों ही सरग में पहुंचोगे? वहीं भगवान् के सामने अपना हिसाब चुका लेना। [ १७२ ]मंगरू ने सोभा को बहुत बुरा-भला कहा-जमामार, बेईमान इत्यादि। लेने की बेर तो दुम हिलाते हो, जब देने की बारी आती है, तो गुर्राते हो। घर बिकवा लूंगा, बैल-बधिये नीलाम करा लूंगा।

सोभा ने फिर छेड़ा-अच्छा, ईमान से बताओ साह, कितने रुपये दिए थे, जिसके अब तीन सौ रुपये हो गए हैं?

'जब तुम साल के साल सूद न दोगे, तो आप ही बनेंगे।'

'पहले-पहल कितने रुपये दिये थे तुमने? पचास ही तो।'

'कितने दिन हुए, यह भी तो देख।'

'पांच-छ: साल हुए होंगे?'

'दस साल हो गए पूरे, ग्यारहवां जा रहा है।'

'पचास रुपये के तीन सौ रुपये लेते तुम्हें जरा भी सरम नहीं आती।'

'सरम कैसी, रुपये दिये हैं कि खैरात मांगते हैं।'

होरी ने इन्हें भी चिरौरी-विनती करके विदा किया। दातादीन ने होरी के साझे में खेती की थी। बीज देकर आधी फसल ले लेंगे। इस वक्त कुछ छेड़-छाड़ करना नीति-विरुद्ध था। झिंगुरीसिंह ने मिल के मैनेजर से पहले ही सब कुछ कह-सुन रखा था। उनके प्यादे गाड़ियों पर ऊख लदवाकर नाव पर पहुंचा रहे थे। नदी गांव से आध मील पर थी। एक गाड़ी दिन भर में सात-आठ चक्कर कर लेती थी। और नाव एक खेवे में पचास गाड़ियों का बोझ लाद लेती थी। इस तरह किफायत पड़ती थी। इस सुविधा का इंतजाम करके झिंगुरीसिंह ने सारे इलाके को एहसान से दबा दिया था।

तौल शुरू होते ही झिंगुरीसिंह ने मिल के फाटक पर आसन जमा लिया। हर एक की ऊख तौलाते थे, दाम का पुरजा लेते थे। खजांची से रुपये वसूल करते थे और अपना पावना काटकर असामी को देते थे। असामी कितना ही रोये, चीखे,किसी की न सुनते थे। मालिक का यही हुक्म था। उनका क्या बस।

होरी को एक सौ बीस रुपये मिले उसमें से झिंगुरीसिंह ने अपने पूरे रुपये सूद समेत काटकर कोई पचीस रुपये होरी के हवाले किए।

होरी ने रुपये की ओर उदासीन भाव से देखकर कहा-यह लेकर मैं क्या करूंगा ठाकुर, यह भी तुम्हों ले लो। मेरे लिए मजूरी बहुत मिलेगी।

झिंगुरी ने पचीसों रुपये जमीन पर फेंककर कहा-लो या फेंक दो, तुम्हारी खुसी। तुम्हारे कारन मालिक की घुड़कियां खाईं और अभी रायसाहब सिर पर सवार हैं कि डांड़ के रुपये अदा करो। तुम्हारी गरीबी पर दया करके इतने रुपये दिए देता हूं, नहीं एक धेला भी न देता। अगर रायसाहब ने सख्ती की तो उल्टे और घर से देने पड़ेंगे।

होरी ने धीरे से रुपये उठा लिए और बाहर निकला कि नोखेराम ने ललकारा। होरी ने जाकर पचीसों रुपये उनके हाथ पर रख दिए, और बिना कुछ कहे जल्दी से भाग गया। उसका सिर चक्कर खा रहा था।

सोभा को इतने ही रुपये मिले थे। वह बाहर निकला, तो पटेश्वरी ने घेरा।

सोभा बरस पड़ा। बोला-मेरे पास रुपये नहीं हैं, तुम्हें जो कुछ करना हो, कर लो।

पटेश्वरी ने गरम होकर कहा-ऊख बेची है कि नहीं? [ १७३ ]
'हां, बेची है।'

'तुम्हारा यही वादा तो था कि ऊख बेचकर रुपया दूंगा।'

'हां, था तो।'

'फिर क्यों नहीं देते! और सब लोगों को दिए हैं कि नहीं?'

'हां, दिए हैं।'

'तो मुझे क्यों नहीं देते?'

'मेरे पास अब जो कुछ बचा है, वह बाल-बच्चों के लिए है।'

पटेश्वरी ने बिगड़कर कहा-तुम रुपये दोगे, सोभा और हाथ जोड़कर और आज ही। हां, अभी जितना चाहो, बहक लो। एक रपट में जाओगे छ: महीने को, पूरे छ: महीने को, न एक दिन बेस, न एक दिन कम, यह जो नित्य जुआ खेलते हो, वह एक रपट में निकल जायगा। मैं जमींदार या महाजन का नौकर नहीं हूं, सरकार बहादुर का नौकर हूं, जिसका दुनिया-भर में राज है और जो तुम्हारे महाजन और जमींदार दोनों का मालिक है।

पटेश्वरीलाल आगे बढ़ गए। सोभा और होरी कुछ दूर चुपचाप चले। मानो इस धिक्कार ने उन्हें संज्ञाहीन कर दिया हो। तब होरी ने कहा-सोभा, इसके रुपये दे दो। समझ लो, ऊख में आग लग गई थी। मैंने भी यही सोचकर, मन को समझाया है।

सोभा ने आहत हंठ से कहा-हां, दे दूंगा दादा! न दूंगा तो जाऊंगा कहां?

सामने से गिरधर ताड़ी पिए झूमता चला आ रहा था। दोनों को देखकर बोला-झिंगुरिया ने सारे का सारा ले लिया होरी काका! चबेना को भी एक पैसा न छोड़ा। हत्यारा कहीं का। रोया, गिड़गिड़ाया, पर इस पापी को दया न आई।

शोभा ने कहा-ताड़ी तो पिए हुए हो, उस पर कहते हो, एक पैसा भी न छोड़ा!

गिरधर ने पेट दिखाकर कहा-सांझ हो गई, जो पानी की बूंद भी कंठ तले गई हो, तो गो-मांस बराबर। एक इकन्नी मुंह में दबा ली थी। उसकी ताड़ी पी ली। सोचा, साल-भर पसीना गारा है, तो एक दिन ताड़ी तो पी लूं, मगर सच कहता हूं, नसा नहीं है। एक आने में क्या नसा होगा? हां, झूम रहा हूं जिसमें लोग समझें, खूब पिए हुए है। बड़ा अच्छा हुआ काका, बेबाकी हो गई। बीस लिए, उसके एक सौ साठ भरे, कुछ हद है।

होरी घर पहुंचा, तो रूपा पानी लेकर दौड़ी, सोना चिलम भर लाई, धनिया ने चबेना और नमक लाकर रख दिया और सभी आशा-भरी आंखों से उसकी ओर ताकने लगीं। झुनिया भी चौखट पर आ खड़ी हुई थी। होरी उदास बैठा था। कैसे मुंह-हाथ धोए, कैसे चबेना खाए। ऐसा लज्जित और ग्लानित था, मानो हत्या करके आया हो।

धनिया ने पूछा-कितने की तौल हुई?

'एक सौ बीस मिले, पर सब वहीं लुट गएधेला भी न बचा।'

धनिया सिर से पांव तक भस्म हो उठी। मन में ऐसा उद्वेग उठा कि अपना मुंह नोंच ले। बोली-तुम जैसा घामड़ आदमी भगवान् ने क्यों रचा, कहीं मिलते तो उनसे पूछती। तुम्हारे साथ सारी जिंदगी तलख हो गई, भगवान् मौत भी नहीं देते कि जंजाल से जान छूटे। उठाकर सारे रुपये बहनोइयों को दे दिए। अब और कौन आमदनी है, जिससे गोई आएगी? हल में क्या मुझे जोतो, या आप जुतोगे? मैं कहती हूं, तुम बूढ़े हुए, तुम्हें इतनी अक्ल भी नहीं आई कि गोई-भर के रुपये तो निकाल लेते। कोई तुम्हारे हाथ से छीन थोड़े लेता। पूस की यह ठंड और
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किसी को देह पर लत्ता नहीं। ले जाओ सबको नदी में डुबा दो। सिसक-सिसककर मरने से तो एक दिन मर जाना फिर भी अच्छा है। कब तक पुआल में घुसकर रात काटेंगे और पुआल में घुस भी लें, तो पुआल खाकर रहा तो न जायगा। तुम्हारी इच्छा हो, घास ही ख़ाओ, हमसे तो घास न खाई जायगी।

यह कहते-कहते वह मुस्करा पड़ी। इतनी देर में उसकी समझ में यह बात आने लगी थी कि महाजन जब सिर पर सवार हो जाय, और अपने हाथ में रुपये हों और महाजन जानता हो कि इसके पास रुपये हैं, तो असामी कैसे अपनी जान बचा सकता है।

होरी सिर नीचा किए अपने भाग्य को रो रहा था। धनिया का मुस्कराना उसे दिखाई नहीं दिया। बोला-मजूरी तो मिलेगी। मजूरी करके खायंगे। धनिया ने पूछा-कहां है इस गांव में मजूरी? और कौन मुंह लेकर मजूरी करोगे? महतो नहीं कहलाते?

होरी ने चिलम के कई कश लगाकर कहा-मजूरी करना कोई पाप नहीं। मजूर बन जाय, तो किसान हो जाता है। किसान बिगड़ जाय तो मजूर हो जाता है। मजूरी करना भाग्य में न होता तो यह सब विपत क्यों आती? क्यों गाय मरती? क्यों लड़का नालायक निकल जाता?

धनिया ने बहू और बेटियों की ओर देखकर कहा-सब-की-सब क्यों घेरे खड़ी हो, जाकर अपना-अपना काम देखो। वह और हैं जो हाट-बाजार से आते हैं, तो बाल-बच्चों के लिए दो-चार पैसे की कोई चीज लिए आते हैं। यहां तो यह लोभ लग रहा होगा कि रुपये तुड़ाएं कैसे? एक कम न हो जायगा, इसी से इनकी कमाई में बरक्कत नहीं होती। जो खरच करते हैं, उन्हें मिलता है। जो न खा सकें, उन्हें रुपये मिलें ही क्यों? जमीन में गाड़ने के लिए?

होरी ने खिलखिलाकर कहा-कहां है वह गाड़ी हुई थाती?

'जहां रखी है, वहीं होगी। रोना तो यही है कि यह जानते हुए भी पैसे के लिए मरते हो चार पैसे की कोई चीज लाकर बच्चों के हाथ पर रख देते तो पानी में न पड़ जाते। झिंगुरी से तुम कह देते कि एक रुपया मुझे दे दो, नहीं मैं तुम्हें एक पैसा न दूंगा, जाकर अदालत में लेना, तो वह जरूर दे देता।'

होरी लज्जित हो गया। अगर वह झल्लाकर पचीसों रुपये नोखराम को न दे देता तो नोखे क्या कर लेते? बहुत होता बकाया पर दो-चार आना सूद ले लेते, मगर अब तो चूक हो गई।

झुनिया ने भीतर जाकर सोना से कहा-मुझे तो दादा पर बड़ी दया आती है। बेचारे दिन भर के थके-मांदे घर आए, तो अम्मां कोसने लगीं। महाजन गला दबाए था, तो क्या करते बेचारे।

'तो बैल कहां से आएंगे?'

'महाजन अपने रुपये चाहता है। उसे तुम्हारे घर के दुखड़ों से क्या मतलब?'

'अम्मां वहां होतीं, तो महाजन को मजा चखा देतीं। अभागा रोकर रह जाता।'

झुनिया ने दिल्लगी की-तो यहां रुपये की कौन कमी है? तुम महाजन से जरा हंसकर बोल दो, देखो सारे रुपये छोड़ देता है कि नहीं। सच कहती हूं, दादा का सारा दुःख-दलिद्दर दूर हो जाय। [ १७५ ]
सोना ने दोनों हाथों से उसका मुंह दबाकर कहा-बस, चुप ही रहना, नहीं कहे देती हूं। अभी जाकर अम्मां से मातादीन की सारी कलई खोल दूं तो रोने लगो

झुनिया ने पूछा-क्या कह दोगी अम्मां से? कहने को कोई बात भी हो। जब वह किसी बहाने से घर में आ जाते हैं, तो क्या कह दें कि निकल जा, फिर मुझसे कुछ ले तो नहीं जाते? कुछ अपना ही दे जाते हैं। सिवाय मीठी-मीठी बातों के वह झुनिया से कुछ नहीं पा सकते। और अपनी मीठी बातों को महंगे दामों पर बेचना भी मुझे आता है। मैं ऐसी अनाड़ी नहीं कि किसी के झांसे में आ जाऊं। हां, जब जान जाऊंगी कि तुम्हारे भैया ने वहां किसी को रख लिया है, तब की नहीं चलाती। तब मेरे ऊपर किसी का कोई बंधन न रहेगा। अभी तो मुझे विस्वास है कि वह मेरे हैं और मेरे कारन उन्हें गली-गली ठोकर खाना पड़ रहा है। हंसने-बोलने की बात न्यारी है, पर मैं उनसे विस्वासघात न करूंगी। जो एक से दो का हुआ, वह किसी का नहीं रहता।

सोभा ने आकर होरी को पुकारा और पटेश्वरी के रुपये उसके हाथ में रखकर बोला-भैया, तुम जाकर ये रुपये लाला को दे दो, मुझे उस घड़ी न जाने क्या हो गया था।

होरी रुपये लेकर उठा ही था कि शंख की ध्वनि कानों में आई। गांव के उस सिरे पर ध्यानसिंह नाम के एक ठाकुर रहते थे। पल्टन में नौकर थे और कई दिन हुए, दस साल के बाद रजा लेकर आए थे। बगदाद, अदन, सिंगापुर, बर्मा-चारों तरफ घूम चुके थे। अब ब्याह करने की धुन में थे। इसीलिए पूजा-पाठ करके ब्राह्मणों को प्रसन्न रखना चाहते थे।

होरी ने कहा-जान पड़ता है, सातों अध्याय पूरे हो गए। आरती हो रही है।

सोभा बोला-हां, जान तो पड़ता है, चलो आरती ले लें।

होरी ने चिंतित भाव से कहा-तुम जाओ, मैं थोड़ी देर में आता हूं।

ध्यानसिंह जिस दिन आए थे, सबके घर सेर-सेर भर मिठाई बैना भेजी थी। होरी से जब कभी रास्ते में मिल जाते, कुशल पूछते। उनकी कथा में जाकर आरती कुछ न देना अपमान की बात थी।

आरती का थाल उन्हीं के हाथ में होगा। उनके सामने होरी कैसे खाली हाथ आरती ले लेगा। इससे तो कहीं अच्छा है वह कथा में जाय ही नहीं। इतने आदमियों में उन्हें क्या याद आएगी कि होरी नहीं आया कोई रजिस्टर लिए तो बैठा नहीं है कि कौन आया, कौन नहीं आया। वह जाकर खाट पर लेट रहा।

मगर उसका हृदय मसोस-मसोसकर रह जाता था। उसके पास एक पैसा भी नहीं है। तांबे का एक पैसा। आरती के पुण्य और माहात्म्य का उसे बिल्कुल ध्यान न था। बात थी केवल व्यवहार की। ठाकुरजी की आरती तो वह केवल श्रद्धा की भेंट देकर ले सकता था, लेकिन मर्यादा कैसे तोड़े, सबकी आंखों में हेठा कैसे बने।

सहसा वह उठ बैठा। क्यों मर्यादा की गुलामी करे? मर्यादा के पीछे आरती का पुण्य क्यो छोड़े? लोग हंसेंगे, हंस लें। उसे परवा नहीं है। भगवान् उसे कुकर्म से बचाए रखें, और वह कुछ नहीं चाहता।

वह ठाकुर के घर की ओर चल पड़ा।