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दुखी भारत/१८ पश्चिम में कामोत्तेजना

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दुखी भारत  (1928) 
द्वारा लाला लाजपत राय
[ २२६ ]

अठारहवाँ अध्याय
पश्चिम में कामोत्तेजना

भारतवासियों के विषय-भोग-सम्बन्धी कल्पित पापाचार का विस्तृत वर्णन करने में मिस मेयो को विचित्र आनन्द आता है। समस्त चञ्चल पत्रकार उन बातों को जानते हैं जिनसे कथाओं में रहस्य उत्पन्न किया जा सकता है। उनकी पुस्तक का उद्देश यह होता है कि लोग 'गम'––एक प्रकार की गोंद-मिश्रित मिठाई––चूसते जायँ और उन्हें पढ़ते जायँ। अमरीका की बहुत सी पुस्तकों की दुकानों पर यह 'गम' भी रहता है और सबसे अधिक बिकता है। भारतवर्ष में मिस मेयो ने 'व्यक्तिगत रूप से' जो अनुसन्धान किये हैं उनमें अधिकांश ऐसे हैं जो 'विषय-भोग' की बातों से सम्बन्ध रखते हैं। उसने सरकारी पुस्तकों और अङ्कों से जो उदाहरण दिये हैं उनसे कोई बात सिद्ध नहीं होती है और उसके हवाले भी सम्माननीय नहीं हैं। कम से कम तब तक सम्माननीय नहीं हैं, जब तक आप एबे डुबोइस और उसकी पुस्तक को सम्माननीय प्रमाण न स्वीकार कर लें। मुख्यतः उसने इधर-उधर की बातों से ही–कदाचित् अपनी निजी कल्पना से भी–काम लिया है। और कभी कभी हमारे सामने वह ऐसी बातें रखती है जो बिल्कुल व्यर्थ और निकम्मी प्रतीत होती हैं। फिर भी वह एक 'साहसी' महिला है। उसके पुस्तक के साथ सहानुभूति रखनेवाला एक ब्रिटिश समालोचक उसके सम्बन्ध में हमें यही बतलाता भी है। इसलिए वह एक राष्ट्र के धर्माचरण के सम्बन्ध में अपनी सम्मति बनाने में ज़रा भी नहीं झिझकती। वह कीचड़ में लोटने की प्रबल इच्छा के बिना उसे नहीं देख सकती। चाहे वह वास्तविक हो, चाहे काल्पनिक।

फिर भी मिस मेयो की रचना का यह भाग थोड़े में ही नहीं छोड़ा जा सकता। क्योंकि उसके तर्क का अत्यन्त महत्त्व-पूर्ण अङ्ग यही है। और जो [ २२७ ]लोग भारतीय जातियों के विरुद्ध मिथ्या-दोषों को लेकर आन्दोलन कर रहे हैं वे इन बातों को बड़ी गम्भीरता के साथ प्रयोग करते हैं।

मिस मेयो सोचती है कि 'हिन्दुओं के आर्थिक और आध्यात्मिक दुःखों का मूलकारण उनका विषय-भोग-सम्बन्धी पापाचार ही है।' उसकी समझ में भारतवासियों की मानसिक ग़ुलामी, ग़रीबी, मूर्खता, राजनैतिक छुटाई, वेदना, असफलता आदि बुराइयों का कारण केवल उनका विषयी जीवन है।

अपनी बातों को सिद्ध करने के लिए मिस मेयो ने किंवदन्तियों और अस्पतालों में पहुँची घटनाओं का सहारा लिया है। परन्तु यदि अस्पताल की घटनाओं से–और उनमें भी बुरी से बुरी चुन करके–किसी बात की जाँच की जा सकती है तो कदाचित् भारतवर्ष पश्चिम के देशों से बुरा न प्रतीत होगा और न अच्छा ही। किंवदन्तियों से आपको मनोरञ्जक और सनसनी-पूर्ण कथायें मालूम हो सकती हैं, परन्तु गम्भीरता के साथ विचार करनेवाले लोग इन पर विश्वास नहीं कर सकते।

कल्पना कीजिए कि कोई पूरा अजनबी ३० करोड़ मानवों से बसे भारत जैसे विशाल देश में जाता है। भिन्न भिन्न भागों में उसे भिन्न भिन्न रवाज दिखलाई पड़ते हैं। अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं पर उस अजनबी को एक का भी ज्ञान नहीं है। वह चारों तरफ यात्रा करता है और बारह महीने में ही पूरी यात्रा समाप्त कर देता है। तब पुस्तक लिखने बैठ जाता है। और लोगों के जीवन की उन बातों को लिखता है जो अत्यन्त घनिष्ठ मित्रों को ही ज्ञात हो सकती हैं। तब अपने निजी 'अनुभवों' और लोगों से 'बेधड़क' की गई बातों के आधार पर सम्पूर्ण राष्ट्र के विरुद्ध घातक कलङ्कों की रचना करता है। निस्सन्देह इस काम के लिए बड़े 'साहस' की आवश्यकता है। पर इसके साथ ही कथा में जिन अल्प-संख्यक व्यक्तियों का नामोल्लेख किया गया है उनमें से अधिकांश की बातों को ठीक ठीक न उद्धृत करने का 'साहस' भी जोड़ दीजिए तो आपको मिस मेयो के वक्तव्यों का आपही मूल्य मालूम हो जायगा।

पाश्चात्य देशों पर दोषारोपण करने की हमारी बिल्कुल इच्छा नहीं है परन्तु मिस मेयो ने भारतवर्ष के स्त्री-पुरुष-सम्बन्धी धर्माचरण की जो व्याख्या [ २२८ ]की है वह हमें पाश्चात्य देशों के धर्माचरण के साथ भारतवर्ष के धर्माचरण की तुलना करने के लिए आमन्त्रित करती है। यह कार्य्य कितना ही अप्रिय क्यों न हो, हमें करना ही पड़ेगा। भारतवर्ष में विषय-भोग और तत्सम्बन्धी पापाचार के सम्बन्ध में मिस मेयो ने जो कुछ लिखा है उसकी सत्यता की जाँच करने का एक मात्र उपाय यही है कि इस देश के स्त्री-पुरुष-सम्बन्धी धर्माचरण और रवाजों को पाश्चात्य देशों की इन्हीं बातों के साथ तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाय। परन्तु हम किंवदन्तियों के आधार पर अपने वक्तव्य न प्रकाशित करेंगे और इस कार्य को पूरा करने का भार योरप के वैज्ञानिक लेखकों तथा योग्य निरीक्षकों पर छोड़ देंगे।

यह कार्य्य आरम्भ करने से पहले हम यह स्वीकार किये लेते हैं, जैसा कि एक पिछले अध्याय में स्वीकार भी कर चुके हैं, कि भारतवर्ष में बाल विवाह एक ऐसी बात अवश्य है जो विषय-भोग की प्रवृत्ति को उत्तेजित करती है और शारीरिक शक्ति को क्षीण करती है। मिस मेयो ने जो कुछ कहा है वह एक भयङ्कर और द्वेष-पूर्ण अतिशयोक्ति है। इसकी परीक्षा हम पिछले अध्याय में कर आये हैं। परन्तु, हाँ, इस कुप्रथा की उपस्थिति को हम अस्वीकार नहीं कर सकते।

इस एक कारण के अतिरिक्त हमें भारतवर्ष की रवाजों और स्थितियों में कोई ऐसी बात देखने को नहीं मिलती जो पाश्चात्य देशों की रवाजों और स्थितियों के समान देश के सामाजिक वायुमंडल को विषय-वासना से घटा-टोप कर देनेवाली हो। वास्तव में जूता दूसरे ही पैर में है। आधुनिक औद्योगिक और निवास-सम्बन्धी दशाएँ, इनसे उत्पन्न सस्ती उत्तेजना की लिप्सा, बड़े बड़े नगर, व्यापारिक ढङ्ग पर दुर्वासना-सम्बन्धी समस्त संघ–ये सब बातें पाश्चात्य देशों में इतना कामोद्दीपन उत्पन्न कर देती हैं कि भारतवर्ष में उनकी कल्पना तक नहीं की जा सकती।

पाश्चात्य देशों में विवाह के पूर्व और विवाह के अतिरिक्त विषय-भोग करने के लिए जैसी सुविधाएँ हैं वैसी भारतवर्ष में मुश्किल से मिलेंगी। पाश्चात्य देशों में बाल-विवाह भले ही अज्ञात हो पर बाल्यावस्था में ही उन्हें स्त्री-पुरुष के सम्भोग-सम्बन्धी समस्त बातों का अनुभव हो जाता है। भारत[ २२९ ]वर्ष में बाल-विवाह का प्रायः यह अर्थ नहीं होता कि लोग बाल्यावस्था में ही सम्भोग करने लगे। उलटा यह विवाह से पूर्व ही सम्भोग करने से लोगों को बहुत अंशों में बचाता भी है। इसके अतिरिक्त पश्चिम में विषय-भोग-सम्बन्धी बातों पर स्वतन्त्रता के साथ विचार करनेवाले लोग, चाहे सही हो चाहे गलत, अब विवाह से पहले सम्भोग की बातों को जानने की आज्ञा ही नहीं बल्कि उनका अनुभव करने की राय भी देते हैं। 'विवाह से स्वतंत्र सम्बन्धों' का रवाज तो केवल स्वतंत्र विचारकों तक ही परिमित नहीं है। हेवलक एलिस[१] का कथन है कि ऐसे सम्बन्ध इँगलैंड के अधिकांश या प्रायः समस्त गांवों में खूब पाये जाते हैं।' इसी लेखक का आगे कथन है कि 'कुछ देशों में यह सर्वमान्य प्रथा-सी चल पड़ी है कि स्त्रियों कानूनी विवाह के पहले ही सम्भोग-सम्बन्ध स्थापित कर लेती हैं। कभी कभी वे जिस व्यक्ति से प्रथम बार सम्भोग करती हैं, उसी के साथ विवाह कर लेती हैं। परन्तु कभी कभी अनुकूल पति पाने से पूर्व वे अनेक व्यक्तियों के साथ सम्भोग कर चुकती हैं। इस प्रकार स्टफोर्ड शायर के कुछ भागों में तो यहाँ तक रवाज है कि एक बच्चा उत्पन्न हो जाता है तब स्त्रियाँ विवाह करती है 'एलेन के' का प्रमाण देकर स्वीडन के सम्बन्ध में एलिस ने लिखा है कि 'वहाँ के अधिकांश लोग इसी प्रकार वैवाहिक जीवन का आरम्भ करते हैं।' यह व्यवस्था लाभदायक बतलाई जाती है और कहा जाता है कि 'इससे वैवाहिक पवित्रता उतनी ही बढ़ती है जितनी कि विवाह के पूर्व बन्धन-रहित स्वतंत्रता होती है।' 'डेन मार्क में भी कानूनी सम्बन्ध स्थापित होने से पहले स्त्रिर्या अनेक बार गर्भ धारण कर चुकती हैं।'

सच बात तो यह है कि योरप में जहाँ जहाँ ट्यूटोनिक जाति के वंशज बसते हैं वहीं ऐसे स्वतन्त्र सम्बन्धों की प्रथा अति प्राचीन काल से चली आ रही है और खूब अच्छी तरह से स्थापित हो गई है। इसी लेखक ने आगे लिखा है कि 'जर्मनी में अनुचित सम्बन्धों से उत्पन्न शिशुओं की जन्म-संख्या ही नहीं बढ़ [ २३० ]रही है––बर्लिन में यह १७ प्रतिशत और कुछ दूसरे नगरों में इससे भी अधिक है––बरन आधी या उससे अधिक विवाहितायें भी अपने विवाह-सम्बन्ध से पूर्व ही गर्भ धारण कर लेती हैं। इस प्रकार बर्लिन में नियमानुकूल जो शिशु जन्म ग्रहण करते हैं उनमें भी ४० प्रतिशत ऐसे होते हैं जिनका गर्भाधान विवाह से पूर्व हो चुकता है। परन्तु देहातों में (जहाँ अनुचित सम्बन्ध से उत्पन्न शिशुओं की जन्म-संख्या शहरों के मुकाबिले में कम होती है) गर्भाधान के पश्चात् होनेवाले विवाहों की संख्या बर्लिन के मुकाबिले में बहुत अधिक होती है। जर्मनी के देहातों में इस बात की एक कमेटी द्वारा विशेष रूप से जांच की गई थी। कुछ वर्ष हुए इस कमेटी ने अपने अनुसन्धान को दो भागों में प्रकाशित किया था। इन पुस्तकों से जर्मनी के इंद्रियगत धर्माचरण की बहुत सी बातें मालूम होती हैं। इस ग्रन्थ में हनोवर के संबन्ध में लिखा गया है कि वहाँ विवाह के पूर्व पारस्परिक सहवास का नियम है। कम से कम विवाह के पूर्व एक दूसरे की परीक्षा कर लेने के लिए तो सहवास आवश्यक ही समझा जाता है। क्योंकि 'थैले में बन्द सुअर को खरीदना कोई पसन्द नहीं करता।'............सक्सोनी में एक जर्मन पादरी से कहा गया कि 'यहाँ कोई बिना आज़माये एक पाई की चिलम भी नहीं खरीदता।' दूसरे जिलों और राज्यों के सम्बन्ध में भी यही बात कही जाती है। 'कानून के अनुसार विवाह करनेवाली स्त्रियों में अक्षतयोनि कुमारियों की संख्या अधिक नहीं होती' (यह बात विशेष कर ब्रिटेन के सम्बन्ध में कही गई है) परन्तु ये बातें ऐसी हैं जिन्हें लोग वैवाहिक पवित्रता के अनुकूल समझते हैं।

यह बात मानने के योग्य है या नहीं और स्वतंत्र विचारकों की सम्मति श्रेष्ट है या मठाधीशों की––ये प्रश्न हमारे वर्तमान विषय के बाहर के हैं। हमारे विषय से जो बात सम्बन्ध रखती है वह केवल इतना ही स्मरण रखना है कि भारतवर्ष में सम्भोग का अवसर विवाह के बहुत पश्चात् प्राप्त होता है और पाश्चात्य देशों में विवाह के बहुत पूर्व। इस देश की और पाश्चात्य देशों की वैवाहिक आयु की तुलना करते समय इस बात को सदैव दृष्टि के समीप ही रखना चाहिए। [ २३१ ]यह निष्कर्ष एलिस के इस निरीक्षण में भी मिलता है कि[२]––

"नियमानुकूल विवाह करने की आयु में क्रमशः वृद्धि से भी यही बात सिद्ध होती है। इतना ही नहीं, इससे केवल स्वतंत्र सम्बन्धों की वृद्धि का ही पता नहीं चलता परन्तु विवाह के बाहर भी क्षम्य और अक्षम्य सब प्रकार के अनुचित-सम्बन्धों की वृद्धि प्रकट होती है।"

***

जो स्वयं पवित्र हो वह पत्थर फेंके तो एक बात भी है। मिस मेयो का यदि कोई राजनैतिक स्वार्थ न होता तो वह अमरीका के बालक-बालिकाओं की काम-विपयक बातों की ओर ध्यान आकर्षित करके अपने देश का अधिक उपकार करती। अमरीका के एक सच्चे और उत्साही सुधारक श्रीयुत बेन लिन्डसे ने[३], जो बालकों की एक अदालत के २५ वर्ष तक जज भी रह चुके हैं, जिन बातों का भण्डाफोड़ किया है उनका पढ़ना बहुत अच्छा नहीं लगता। परन्तु लिन्डसे ने जो कुछ लिखा है वह इधर-उधर की बातों पर नहीं, बल्कि सन सच्ची बातों पर अवलम्बित है जिनका उसने अपना जजी का कार्य करते समय स्वयं अनुभव किया था।

जज लिन्डसे ने हाई स्कूल के बालकों और बालिकाओं के जीवन से अपनी पुस्तक की सामग्री ली है। ये बालक-बालिकायें भी ऐसे वैसे नहीं, सम्पन्न और सम्माननीय घरानों के हैं। जब लिन्डस को इस परिणाम पर पहुँचना पड़ा है कि 'अमरीका की साधारण बालिका अपने मस्तिष्क के सँभालने या नियन्त्रण करने के योग्य परिपक्व होने से वर्षों पहले कामोचेजना का अनुभव करने लगती है।

जज लिन्डसे कहते हैं कि––"इन हाई स्कूल के छात्रों और छात्राओं के सम्बन्ध में पहली बात यह है कि जितनी युवक और युवतियाँ सहभोजों में या नाच में भाग लेती हैं या एक साथ मोटरगाड़ियों में बैठ कर सैर करती हैं उनमें ९० प्रतिशत ऐसी होती हैं जो आलिङ्गन और चुम्बन में आनन्द लेती हैं। [ २३२ ]·········इस अनुमानित ९० प्रतिशत के सम्बन्ध में मुझे जितने प्रमाण मिले हैं, सब एक-स्वर से इस बात की पुष्टि करते हैं।·········"कुछ बालिकायें ऐसी होती हैं जो जिन बालकों के साथ घूमने निकलती हैं उनसे ऐसा करने का हठ करती हैं। और ऐसे रोमाञ्च उत्पन्न करनेवाले सुखों की खोज में छिपे छिपे चतुराई के साथ उतनी ही अग्रसर रहती हैं जितने कि स्वयं बालकगण!"

इस प्रकार के आलिङ्गन, चुम्बन और नृत्य का अर्थ है अत्यन्त कामोद्दीपन और शरीर के तन्तुओं पर गहरा दबाव। जज महोदय कहते हैं कि बालिकाओं में जो तन्तु-सम्बन्धी बीमारियाँ और कतिपय विशेष प्रकार की शारीरिक पीड़ायें पाई जाती हैं वे इन्हीं 'परिचित बातों' के परिणाम-स्वरूप उत्पन्न होती हैं। इसके पश्चात् जज महोदय कुछ प्रख्यात चिकित्सकों की सम्मतियाँ देते हैं कि 'इस प्रकार के अर्द्ध सम्भोग का प्रभाव बालिकाओं के शरीर और मन पर इतना गहरा पड़ता है कि वे पूर्ण सम्भोग की शिकार-सी प्रतीत होने लगती हैं।'

परन्तु चुम्बन, आलिङ्गन और नृत्य आरम्भ की बातें हैं। इनसे ही अन्त नहीं हो जाता। 'जो लोग चुम्बन और आलिङ्गन आरम्भ कर देते हैं उनमें कम से कम ५० प्रतिशत यहीं तक नहीं रुके रह सकते। वे और आगे बढ़ते हैं और विषय-भोग-सम्बन्धी दूसरे प्रकार की ऐसी स्वतंत्रता भी लेने लगते हैं जो समस्त सभ्य समाजों में बोर अनुचित समझी जाती है।'

पूर्ण रूप से इन्हीं बातों में निमग्न हो जानेवालों की भी कमी नहीं है। 'जो लोग आलिङ्गन और बुम्बन से आरम्भ करते हैं उनमें १५ से लेकर २५ प्रतिशत तक सीमा पार कर जाते हैं।' अधिकांश में इसका यह अर्थ नहीं है कि एक एक बालिका का कई कई बालकों से सम्बन्ध हो जाता है या ऐसी बातें प्रायः होती रहती हैं। परन्तु यह सत्य है कि ये घटनाएं होती रहती हैं। जज साहब इसी सिलसिले में लिखते हैं कि 'मैं यही कह सकता हूँ कि ये अङ्क हाई स्कूल के छात्रों और छात्राओं के हैं। और इतने सत्य हैं कि इनमें परिवर्तन नहीं किया जा सकता।'

जज लिंडसे को बाल-माताओं से प्रायः काम पड़ता रहता था। क्योंकि अनके जज होने के कारण सभी उनसे विपरीत परिस्थितियों में सम्मति लेने [ २३३ ]आती थीं। १९२०-२१ में डेनबेर की बालकों की अदालत में हाई स्कूल में पढ़ने योग्य आयु की "७६९ बालिकाओं पर पथ-भ्रष्ट होने का मुकदमा चलाया था। ......उनकी आयु १४ से १७ वर्ष तक थी।"

"उन ७६९ बालिकाओं के मुकदमों में कम से कम २,००० मुकदमे प्रत्यक्ष रूप से सम्मिलित थे। इसका एक कारण यह था कि लड़के से भी जवाब तलव करना पड़ता था। फिर इसके अतिरिक्त उन दोनों के घनिष्ठ मित्रों का दल अलग ही होता था। उनमें से अधिकांश गुप्त रूप से ऐसे ही अनुभवों में आनन्द लेनेवाले होते थे। इस प्रकार यह दुराचार एक बालिका से दूसरी तक और एक बालक से दूसरे तक पहुँच जाता है। मैंने ऐसे बहुत से बगल के मार्गों का सहारा लिया है जिनसे मुझे इस सम्बन्ध में खोज होने की कुछ भी आशा प्रतीत हुई। परन्तु यह एक ऐसी अँधेरी गुफा के अनुसन्धान के समान था जिसमें अनेक अन्त-रहित मार्ग होते हैं और जिसके बरामदों तथा रहस्यों का पता लगाते लगाते अन्वेषकों का धैर्य छूट जाता है।"

और भी बहुत सी बातें हैं जिनसे जज लिन्डसे ने निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले हैं:––

"जहाँ एक बालिका के विषय-भोग-सम्बन्धी अपराध का भण्डाफोड़ होता है वहाँ बहुत-सी पूर्ण रूप से बच जाती हैं। उदाहरण के लिए हाई स्कूल में पढ़ने योग्य आयु वाली ४९५ बालिकाओं ने (यद्यपि सब हाईस्कूल में नहीं थीं) मुझसे कहा था कि बालकों के साथ विषय-भोग का अनुभव चे कर चुकी हैं। पर इनमें से केवल २५ गर्भवती हुई। यह केवल ५ प्रतिशत होता है अर्थात् बीस में एक का औसत है। दूसरी बालिकानों ने गर्भ नहीं धारण किया। कुछ ने सौभाग्य से और कुछ ने उसे कृत्रिम उपायों के द्वारा इस प्रकार कृत्रिम उपायों के द्वारा गर्भ रोकने की बातें बालिकाओं को खूब मालूम हैं। जितना लोग समझते हैं उससे भी बहुत ज्यादा।

"अब ध्यान देने की प्रथम बात यह है कि उन लगभग ५०० बालिकाओं की सूची की तीन चौथाई मेरे पास अपने आप आई थीं। कोई किसी कारणवश आई, कोई किसी कारणवश। कुछ गर्भवती थीं। कुछ रोगग्रस्त थीं। कुछ को पश्चात्ताप हो रहा था। कुछ सलाह लेना चाहती थीं। इसी प्रकार कुछ न कुछ प्रयोजन सब का था। दूसरी बात यह है कि उनका मेरे [ २३४ ]पास आने का कारण मुझसे किसी न किसी प्रकार की सहायता की उनकी अनिवार्य आवश्यकता थी। वे उस आवश्यकता को अनुभव न करती तो मेरे पास कदापि न पातीं। मेरे पास जहाँ एक लड़की आई वहाँ बहुत-सी ऐसी भी हो सकती हैं जो नहीं आई। वे इसलिए नहीं आई कि उन्हें सहायता की आवश्यकता प्रतीत नहीं हुई। इसलिए उन्होंने अपनी ही राय से काम लिया।

"दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि वे ५०० बालिकाएँ जो दो वर्ष से कुछ कम के समय में मेरे पास आई, एक छोटे समूह में समाज के सब वर्गो को उपस्थित करती थीं। ...... परन्तु एक बहुत बड़ा समूह...... यह उपाय नहीं जानता था। इससे मेरे पास आया भी नहीं। मेरी निजी सम्मति यह है कि यदि एक लड़की मेरे पास सहायता के लिए आती है क्योंकि वह गर्भवती है, या रोगिणी है और सुख की खोज में है तो बहुत सी ऐसी रह जाती हैं जो नहीं पाती क्योंकि वे सम्भोग के परिणामों से या तो बिल्कुल बच जाती हैं था ऐसी परिस्थिति में होती हैं कि प्रत्येक बात की स्वयं व्यवस्था कर सकती हैं। उदाहरण के लिए सैकड़ों, गर्भपात करनेवाले चिकित्सकों का सहारा लेती हैं। मेरा यह अनुमान नहीं है। मैं इस बात को जानता हूँ।"

जज महोदय अपने पाठकों को सावधान करते हैं कि वे अतिशयोक्ति नहीं कर रहे हैं। और जिन बातों का उन्होंने वर्णन किया है वे डेनवर के लिए आश्चर्यजनक नहीं हैं।

"मैं इन अनुमानों की जड़ तक नहीं जाना चाहता। जो कम से कम अङ्क प्राप्त हैं वहीं दिल दहला देनेवाले हैं। गत वर्ष (१९२४ ई॰) मुझे १०० अनुचित सम्बन्ध से गर्भवती बालिकाओं के लिए व्यवस्था करनी पड़ी। इनमें से अधिकांश माताओं और बच्चों की देख-रेख भी करनी पड़ी। अधिकांश दशाओं में बच्चों के पालन-पोषण का भार भी मुझी को लेना पड़ा। इनमें से प्रत्येक बालिका अपनी चेष्टाओं से यह कहती थी कि क्या वह मेरे पास आये और शिशु को जन्म दे जाय या गर्भपाती के पास जाकर गर्भ गिरवा दे।"

"यह केवल हाई स्कूल में पढ़ने के योग्य प्रायुवाली बालिकाओं का किस्सा है। कुछ स्कूल में पढ़ती हैं कुछ नहीं, पढ़तीं। जिस नगर की यह बात है उसकी जन-संख्या ३०,००,००० है।" [ २३५ ]अमरीका की बालिकाएँ कितनी शीत्र शारीरिक यौवन प्राप्त कर लेती हैं यह जज लिंडसे के निम्नलिखित अङ्कों से स्पष्ट हो जायगा:––

"हमने मालूम किया कि ३१३ बालिकाओं में से २६५ बालिकाएँ ११ और १२ वर्ष की आयु में यौवनावस्था को प्राप्त हो गई थीं। इनमें से अधिकांश १२ वर्ष की अपेक्षा ११ वर्ष की ही आयु में युवती हुई थीं। ३१३ बालिकाओं को हम दो दलों में विभक्त कर दें तो हमें २८५ ऐसी मिलेंगी जो ११, १२ और १३ वर्ष की आयु में युवती हुई और केवल २८ ऐसी मिलेंगी जिन्होंने १४, १५ और १६ वर्ष में युवावस्था प्राप्त की।"

हेवलक एलिस का पूर्वी जर्मनी के सम्बन्ध में एक रिपोर्ट से उद्धरण देखिए[४]:––

"जब पुरुष-सङ्ग करने की बालिकाओं में ऐसी प्रवृत्ति है तब इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि बहुत से लोगों का यह विश्वास है कि १६ वर्ष की आयु के पश्चात् कोई बालिका अक्षत-योनि नहीं रहती।"

इसका अर्थ यह हुआ कि उल्लिखित योरपियन देशों की समस्त बालिकाएँ १६ वर्ष की आयु से पहले यौवना हो जाती हैं और कदाचित् अधिकांश इसके बहुत ही पहले ऐसी हो जाती हैं। अमरीका की स्कूल की बालिकाओं के सम्बन्ध में जज लिंडसे ने ऐसी ही बात कही हैं। यह हम ऊपर देख ही चुके हैं।

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जब वायु-मण्डल विषय-वासना से इस प्रकार घटाटोप है तब दाम्पत्य पवित्रता और संयम के रूप में सदाचार सम्बन्धी उन्नति की आशा करनी निरी काहिली है। अधिकांश योरपियन लेखकों के मतानुसार एक-विवाह-व्रत एक लुप्त गाथा के समान हो गया है। एलिस का कथन है[५]––'संसार के किसी भाग में बहुविवाह की प्रथा इतनी प्रचलित नहीं है जितना कि ईसाइयों से बसे देशों में। संसार के किसी अन्य भाग में बहु-विवाह के [ २३६ ]बोझों से बचकर निकल जाना किसी मनुष्य के लिए इतना आसान नहीं है।' स्कोपेन हेर ने भी यही सम्मति प्रकट की थी।

ऊपर से देखा जाय ते पश्चिम में विवाह की जो प्रथा है वह एक आनन्दमय और पूर्ण विकसित प्रेम-विवाह की प्रथा प्रतीत होगी। परन्तु मैक्स नार डौ के समान विद्वान् ने इसे 'विवाह का ढकोसला'-मात्र कहा है। नार डौ का ख़याल है कि ऐसे विवाहों की संख्या ७५ प्रतिशत से कम नहीं है जो 'सुविधा के लिए विवाह' के नाम से प्रसिद्ध हैं और वे वास्तव में प्रेम-विवाह नहीं हैं। जार्ज हर्थ (ब्लाच द्वारा उद्धृत) का अनुमान है कि यह संख्या और भी ऊँची होगी।

इसलिए प्रोफेसर ब्रूनो मेयर के प्रमाण के साथ एलिस के इस कथन को पढ़कर हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि 'आज-कल जितने सहवास होते हैं उनमें आधे से अधिक कानूनी विवाह के बाहर होते हैं[६]

इन बातों को स्वीकार करते हुए योरप के स्वतन्त्र विचारक लोग विवाह की अपेक्षा निम्न दर्जे का विषय-सम्बन्ध स्थापित कर लेने की और इसी भाँति के अन्य पारस्परिक सम्बन्ध जोड़ने की सलाह दे रहे हैं। ये उदार सुधारक इस बात के लिए योरप और अमरीका में बढ़ते हुए विवाह विच्छेदों को एक बड़ी भारी दलील के रूप में उपस्थित करते हैं।

एलिस[७] का कथन है कि 'आज-कल के स्वेच्छानुसार किये गये सन्तानरहित विवाह यह प्रकट करते हैं कि कानूनी विवाह के बाहर भी ऐसे सम्बन्ध सम्भव हो सकते हैं। और श्रीमती पार्सन्स के मतानुसार इस प्रकार के ये स्वतन्त्र सम्बन्ध विवाह का स्थान ग्रहण करने के लिए बड़े वेग से अग्रसर हो रहे हैं।'

पाश्चात्य नगरों में विषय-भोग एक वैज्ञानिक रूप से संगठित और अत्यन्त उन्नतिशील व्यवसाय हो गया है। एक फ्रांसीसी लेखक श्रीयुत पाल ब्यूरो ने हाल ही में लिखी अपनी 'सदाचार का दिवाला' नामक पुस्तक में [ २३७ ] इस व्यवसाय के भयङ्कर रूपों और प्रसार का वर्णन किया है[८] पेरिस के सम्बन्ध में लिखते हुए वे कहते हैं:—

"युद्ध के कुछ समय पूर्व एक एजन्सी की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य यह है कि प्रत्येक स्त्री वह चाहे जिस दशा या परिस्थिति में हो,उसकी आर्थिक आय चाहे जो हो, उसका स्वभाव और धर्माचरण चाहे जैसा हो 'नवीन सम्भोग का अनुभव' करने के लिए लाई जा सकती है। और कोई भी पुरुष जो किसी अन्य स्त्री से सम्भोग करना चाहे, उसे इस एजन्सी से पत्रव्यवहार करने के अतिरिक्त और कुछ करने की आवश्यकता नहीं। हाँ उसे व्यय के लिए २५ फ़्रैङ्क भेज देना चाहिए और लिखना चाहिए कि वह जिस स्त्री के साथ सम्भोग करना चाहता है उसको क्या दे सकेगा। एजेन्सी तब उस कामी पुरुष की प्रार्थना उस स्त्री के पास पहुँचाती है। और उत्तर मिलने पर उसे सूचना देती है कि 'आपको अपना विचार छोड़ देना चाहिए। कम से कम इस समय में।' या इसके विरुद्ध प्रार्थना स्वीकृत हो जाती है तो उस व्यक्ति को यह सूचना मिलती है कि 'आपकी प्रार्थना धन्यवाद के साथ स्वीकार कर ली गई।' मुझे विश्वास दिलाया गया है कि दोनों ओर के पत्र-व्यवहार पढ़ने से बड़ी शिक्षा मिल सकती है। इससे पेरिस के सम्पूर्ण आर्थिक और सामाजिक संसार का प्रशंसनीय परिचय मिल जाता है।

मिस्टर ब्यूरो हमें इस बात का विश्वास दिलाते हैं कि यह व्यापार म्युनिसिपैलिटी और पुलिस के संरक्षण में डङ्के की चोट पर किया जा रहा है। और फ्रांस के सब परिस्थितियों के और सब विचारों के बहुसंख्यक ईमानदार व्यक्तियों की इसे मौन-स्वीकृति प्राप्त है। मार्च १९१२ ईसवी में पेरिस में जो द्वितीय राष्ट्रीय महासभा हुई थी उसमें 'ले बिलनला पोर्नोंग्रैफी' ने व्यभिचार के विरुद्ध एक विवरण उपस्थित किया था। मिस्टर ब्यूरो ने एक पाद-टिप्पणी में इस विवरण का निम्नलिखित अंश उद्धृत किया है:—

"इस सभ्य-व्यभिचार-व्यवसाय के साथ साथ और भी अनेक सस्ते और सुगम उपाय काम कर रहे हैं। बड़े दिन के त्योहार के समय सार्वजनिक नृत्यशाला में नर्तकियों पर चिट्ठी छोड़ी जाती है। वे स्वयं अपने आपको इस [ २३८ ] कार्य्य के लिए उपस्थित करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति को दस सेंटिम जमा करना पड़ता है। जिसके नाम चिट्ठी निकलती है वह उस रात को उस नर्तकी और उसके कमरे पर अधिकार रख सकता है। फिर तो उसे कमरे की कुञ्जी बिना मोलभाव के मिल जाती है। एक दूसरे त्योहार के अवसर पर सङ्गीत-भवन की सुन्दरियों की प्रदर्शिनी की जाती है। सञ्चालक दर्शकों की भीड़ के सम्मुख प्रत्येक का मूल्य उपस्थित करता है। यह सौदा महीने भर के लिए, रात भर के लिए या दिन भर के लिए होता है। यह एक वास्तविक बाज़ार—सफेद गुलामों का व्यापार है।"

मिस्टर ब्यूरो एक दूसरी पाद-टिप्पणी से युद्ध के समय की बातें लिखते हैं[९]

"युद्ध की 'देव-माताओं' का संघ—उसके स्थापित करनेवालों ने कभी ऐसे व्यभिचार की कल्पना भी न की होगी—शीघ्र ही वेश्यावृत्ति करने लगा। विक्रेता और क्रयी दोनों की ओर से चेष्टाएँ आरम्भ हुईं। कई एक दैनिक समाचार-पत्रों को जिनकी कि ग्राहक संख्या बहुत बढ़ी चढ़ी थी और विशेषतः फैंटेसियो' और 'वी पेरिसिनी' नामक दो सचित्र पत्रों को ऐसी 'देव-माताओं' की आवश्यकता और आवश्यकतापूर्ति सम्बन्धी विज्ञापन छापने से बड़ा लाभ हुआ। १९१७ ई॰ के आरम्भ में वी पेरिसिनी की केवल एक संख्या में ऐसी आवश्यकता पूर्ति के १९९ विज्ञापन थे।"

भारतवर्ष में जिस प्रकार का जीवन केवल वेश्याओं और देवदासियों तक ही परिमित है वह पश्चिम में समाज के अत्यन्त विस्तृत भाग तक फैला हुआ है। युवक डुमास ने एक साहित्यिक लेख में 'डेमी मोण्डी'—अर्द्धवेश्याओं की व्याख्या इस प्रकार की है:—

"ये समस्त स्त्रियाँ पहले ही पथ-भ्रष्ट हो चुकी थीं। उनके नाम पर एक छोटा सा कलङ्क लग चुका है। इस कलङ्क का प्रभाव कम करने के उद्देश से ये यथा-सम्भव संघ बनाकर रहती हैं। अच्छे समाज में उत्पत्ति, दिखलावा, द्वेष आदि जो बातें होती हैं वे उनमें भी पाई जाती हैं। परन्तु अन्तर इतना ही है कि इस समाज में वे सम्मिलित नहीं हैं। उनका पृथक्क समाज है जिसे हम 'डेमी मोण्डी' कहते हैं। यह 'डेमी मोण्डी' समाज पेरिस के समुद्र में तैरते हुए एक द्वीप के समान है। प्रत्येक स्त्री को जिसका दृढ़ [ २३९ ] भूमि से पतन होता है या जो वहां से भटक जाती है या भग निकलती है, यह समाज अपनी ओर आकर्षित करता है, अपने में हजम कर लेता है और उसे अपना स्वीकार कर लेता है।......वर्तमान समय में यह अनियमित संसार अपने पूर्ण रूप से विकसित हो उठा है और नव-युवकों को यह पतितसमाज अत्यन्त प्रिय हो गया है। क्योंकि यहां प्रेम करने में उतनी कठिनाई नहीं है जितनी कि उच्च श्रेणियों में है; और व्यय भी इतना नहीं करना पड़ता जितना कि निम्न श्रेणियों में।"

ब्लाच की सम्मति यह है कि आज 'डेमी-मोंडियों' का मूल्य बहुत बढ़ गया है। 'वे ऊँचाई पर स्थित दस हज़ार जनों की वेश्याएँ हैं। ये आधुनिक अर्द्धवेश्याएँ आधुनिक उच्च कोटि के जीवन की एक विशेषता हैं।' आधुनिक समाज में इस अर्द्ध-वेश्या-दल की व्यापकता का वर्णन करते हुए ब्लाच कहते हैं—'चाहे हम घुड़दौड़ में जायँ, चाहे प्रथम रात्रि के थियेटरों में जायँ, चाहे बड़े दानी पुरुषों के बाज़ार में जायँ, चाहे गुप्त नृत्य में जायँ, चाहे विनोद के लिए समुद्र-तट पर जायँ, चाहे 'मोंटीकरलो' और फ्नोरल के त्योहार-उत्सवों में जायँ, सर्वत्र हमें यह अर्द्ध-वेश्या-दल दिखाई पड़ेगा और इसकी सदस्याएँ सौंदर्य में, केश-विन्यास में, देखने में, संस्कृति में, बातचीत में, उच्च समाज की महिलाओं से किसी प्रकार न्यून नहीं प्रतीत होती। ब्लाच फिर कहते[१०] हैं कि यह अद्ध-वेश्या-समाज सार्वजनिक जीवन में अपना बड़ा हाथ रखता है। हमारे युग की सबसे बड़ी शक्ति—समाचार-पत्रों की शक्ति—के साथ पेरिस की डेमी मोंडी का बड़ा प्रभावोत्पादक सम्बन्ध है। जो पत्रकार इन अर्द्ध-वेश्याओं की सेवा में रहते हैं उनको जार्ज डाहल्न ने 'प्रेसी फ़्रिडोडिन' कहा है। क्योंकि उनकी लेखनी का मूल्य रुपयों से नहीं, सुसज्जित कमरों में प्रेमालिङ्गनों से चुकाया जाता है जिसके लिए बड़े बड़े लोग तरसते रहते हैं।'

राष्ट्र-निरीक्षण-संघ के मिस्टर डब्ल्यू॰ ए॰ कूट कहते हैं कि वर्तमान लन्दन की तुलना अब से ४० वर्ष पूर्व के लन्दन से की जाय तो यह खुले मैदान में उपासना के समान प्रतीत होगी[११][ २४० ]परन्तु तब भी वर्तमान अवस्था यथेष्ट रूप से बुरी हो गई है। फ्लेसनर का कहना है कि ट्रैफ़ैलगर स्कायर के पड़ोस में और वहाँ से निकलनेवाली सड़कों पर, आक्सफोर्ड सरकस में, रिजेंट स्ट्रीट में, और भिन्न-भिन्न रेलवे स्टेशनों पर स्त्रियाँ बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाती हैं[१२]

उसी लेखक का कहना है कि वर्तमान समय में वेश्या-गृहों की अवस्था शोचनीय है। वहाँ स्त्रियों को छिपे छिपे, अस्थायी और अशान्तिमय जीवन व्यतीत करना पड़ता है। कतिपय स्थानों में वे थपकी आदि देकर शरीर की थकावट दूर करने की दुकानों की आड़ में काम करते हैं। कहीं स्नान-गृह, कहीं भाषाएँ या व्याख्यान देना सिखाने के गृहों का रूप धारण किये हुए हैं। लोगों को आकर्षित करने के लिए प्रातः, दिन या शाम के समाचार पत्रों में छोटे-छोटे विज्ञापन दिये रहते हैं।

ये वेश्या-गृह प्रायः चिकित्सा-भवनों के नाम से अपना काम करते हैं[१३]। इनमें काम के घंटों में कुछ 'दायियां' और उनकी 'सहायक स्त्रियां' होती हैं। यदि ग्राहक इनमें किसी को पसन्द नहीं करता तो इन गृहों से सम्बन्ध रखनेवाली अभ्य स्त्रियों के चित्र दिखलाये जाते हैं। चित्र देखकर ग्राहक जिस स्त्री को पसन्द करता है वह बुलवाई जाती है। इस गुप्त व्यभिचार ने अब भयङ्कर रूप धारण कर लिया है। 'शाप असिस्टेंट' ने परिस्थिति की ओर निम्नलिखित टिप्पणी लिखकर जनता को सावधान किया है[१४]:—

"दूकानों में काम करनेवाली सहस्रों कुमारियों की क्या दशा है? वे अत्यन्त अल्प वेतन पर काम करती हैं। वह वेतन इतना भी नहीं होता कि वे उससे अपने शरीर और आत्मा की रक्षा कर सकें। इस प्रकार काम करनेवाली यदि कुछ कुमारियाँ अच्छे घरों में रहती हैं तो इसका यह अर्थ है कि उन्हें अपने माता-पिता से वेतन के अतिरिक्त भी कुछ आर्थिक सहायता मिल जाती है। परन्तु जिन कुमारियों के कोई नहीं होता, जिन्हें जीवन-संग्राम में अपने ही निर्बल साधनों का भरोसा रहता है, उन्हें इस [ २४१ ] अन्याय-पूर्ण प्रतिद्वन्द्विता में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है और प्रायः एक शर्म का जीवन व्यतीत करने के लिए विवश होना पड़ता है। इस प्रकार उन्हें अपना अस्तित्व भी भार-स्वरूप मालूम होने लगता है। इसे अतिशयोक्ति न समझिए। यह अत्यन्त सत्य है। कोई भी व्यक्ति—जिसकी हमारे बड़े शहरों के दूकान के जीवन से घनिष्ठता होगी—इसे सत्य स्वीकार करेगा।"

युवती कुमारियों को बड़े-बड़े जोखिम उठाने पड़ते हैं। और जो लोग सफेद गुलामों के व्यापार में लगे हैं उनके दुष्ट कृत्यों के कारण इन लड़कियों को नौकर रखनेवाले दूकानदारों पर भी बड़ा उत्तरदायित्व रहता है। इस बात को १९१३ ई॰ में ब्रिटिश-गवर्नमेंट को भी स्वीकार कर लेना पड़ा और टेलीफ़ोन पर काम करनेवाली कुमारियों को ऐसे व्यापारियों के ढङ्गों से सावधान करने के लिए एक असाधारण विज्ञप्ति प्रकाशित की गई। इस विज्ञप्ति के साथ निम्नलिखित पर्चा भी बांटा गया था। उसे हम यहाँ 'मास्टर प्राब्लेम'[१५] नामक पुस्तक से सविस्तर उद्धृत करते हैं:—

कुमारियों को चेतावनी—

कुमारियों को सड़कों पर, दुकानों में, स्टेशनों पर, रेलगाड़ियों में, देहात के निर्जन मार्गों में या विनोद के स्थानों में अपरिचित व्यक्तियों से कदापि वार्तालाप नहीं करना चाहिए। चाहे वे पुरुष हो चाहे स्त्री।

कुमारियों को अपनी ड्यूटी पर नियुक्त सरकारी-कर्मचारी, जैसे पुलिस का सिपाही, रेल का कर्म्मचारी या चिट्ठीरसा, के अतिरिक्त और किसी से मार्ग नहीं पूछना चाहिए।

कुमारियों को सड़क पर अकेली नहीं फिरना चाहिए या खड़ी नहीं होना चाहिए। यदि कोई अपरिचित एकाएक आकर बात करने लगे—चाहे पुरुष हो चाहे स्त्री—तो उन्हें सबसे निकट के पुलिस के सिपाही के पास जितनी शीघ्र हो सके दौड़कर पहुँच जाना चाहिए।

यदि कोई स्त्री मूर्छित होकर किसी कुमारी के पास सड़क पर गिर पड़े तो उस कुमारी को उसकी सहायता स्वयं नहीं करनी चाहिए बल्कि तुरन्त पुलिस के सिपाही को उसकी सहायता के लिए बुलाना चाहिए। [ २४२ ]कुमारियों को अपरिचित व्यक्तियों के कहने पर रविवार की पाठशाला या बाइबिल की पाठशाला में नहीं सम्मिलित होना चाहिए। वे ईसाई-धर्मप्रचारिका की या क्लर्क की पोशाक पहने हों तब भी नहीं।

कुमारियों को अपरिचित व्यक्तियों की प्रार्थना पर मोटर, टैक्सी या किसी प्रकार की गाड़ी में न बैठना चाहिए।

कुमारियों को किसी अपरिचित व्यक्ति के दिये पते पर कदापि नहीं जाना चाहिए। या अपरिचित मनुष्य के कहने पर किसी गृह, विश्रामगृह,या विनोद-भवन में नहीं प्रवेश करना चाहिए।

कुमारियों को अपरिचितों के साथ कहीं नहीं आना चाहिए। (वे अस्पताल की दाई के समान पोशाक पहने हों तब भी नहीं) यदि यह कहें कि तुम्हारा कोई सम्बन्धी अचानक घायल हो गया है या बीमार पड़ गया है तो ऐसी कथा पर विश्वास नहीं करना चाहिए। क्योंकि कुमारियों के उड़ाने का यह प्रसिद्ध ढङ्ग है।

कुमारियों को अपरिचित व्यक्तियों का दिया हुआ मिष्टान्न, भोजन, या पानी नहीं स्वीकार करना चाहिए। और न उनका दिया हुआ फूल सूँघना चाहिए। न उन्हें फेरीवालों से इत्र या अन्य वस्तुएँ खरीदनी चाहिए। क्योंकि सम्भव है इन वस्तुओं में कोई दवा मिली हो।

कुमारियों को विज्ञापन में देखकर या किसी नौकरी दिलानेवाली अपरिचित्त संस्था के द्वारा बिना उस नौकरी के सम्बन्ध में जांच-पड़ताल किये, उसे नहीं स्वीकार करना चाहिए।

कुमारियों को जब तक किसी सुरक्षित निवास का पता न हो तब तक लन्दन में या किसी अन्य बड़े शहर में एक रात के लिए भी न जाना चाहिए।

ये बातें उस देश की हैं जो हमारे यहाँ धर्मोपदेशक भेजता है!

एक बड़े प्रामाणिक लेखक डाक्टर अल्फ़्रेड ब्लास्को ने बड़े परिश्रम के साथ वेश्या-वृत्ति के सम्बन्ध में खोज करने के पश्चात् निम्न-लिखित बात कही है[१६]

"यद्यपि वेश्या-वृत्ति की प्रथा सब युगों में थी पर उसे एक भीषण सामाजिक संस्था के रूप में परिणत करने का श्रेय केवल १९ वीं शताब्दी को प्राप्त [ २४४ ]दुखी भारत

दुखी भारत.pdf

लाला लाजपतराय (पेरिस में)

[ २४५ ]है। प्रतिद्वन्द्विता के बाज़ार में विशाल जनसंख्या के साथ व्यवसायों की उन्नति, बड़े बड़े शहरों की उन्नति और सघन बस्ती, नौकरी का अरक्षित और अनिश्चित होना; आदि बातों ने वेश्या-वृत्ति को इतना बड़ा क्षेत्र दे दिया है कि जितना मानव-जाति के इतिहास में कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा गया।"

सार्वजनिक वेश्याओं और अर्द्ध-वेश्याओं के अतिरिक्त आधुनिक नगरों में 'बहुत दूर तक गुप्त-रूप से व्यभिचार फैला हुआ है।' डाक्टर ब्लाच ने गुप्त व्यभिचार के भिन्न-भिन्न स्थानों और रूपों का वर्णन किया है। 'स्त्री-सेविकाओं' से युक्त सार्वजनिक गृहों, नृत्य-गृहों और नाच की दूकानों, थियेटरों, निम्न कोटि के सङ्गीत-भवनों, मुसाफिरखानों, और सङ्गीत विद्यालयों आदि को व्यभिचार के अड्डे ही समझना चाहिए। ये सब अधिकांश में वेश्यागृहों से किसी प्रकार अच्छे नहीं हैं।

इन अर्द्ध-वेश्या-गृहों के द्वारा जो कामोद्दीपन किया जाता है उसे सुसंघटित और व्यापक रूप से फैले अश्लील साहित्य से और भी सहायता मिलती है। मिस्टर पाल ब्यूरो कहते हैं[१७]––'विषय-भोग और व्यभिचार की इन बड़ी-बड़ी संस्थाओं को अश्लील साहित्य से बड़ी सहायता मिलती है। अर्थात् काम-वासना की क्षुधा जागृत की जाती है और तुरन्त ही तृप्ति का भी सामान कर दिया जाता है। इससे यह मांग दिनों दिन बढ़ती जाती है।' अश्लील साहित्य और चित्रों आदि का समाचार-पत्रों में खूब विज्ञापन और समावेश रहता है। क्योंकि अश्लीलता-प्रचार एक अत्यन्त सफल व्यापार है। एम॰ ब्यूरो कहते हैं[१८]––

"फ्रांस में अश्लील पर्चों और पुस्तकों का प्रकाशन इतना अधिक बढ़ गया है कि उस पर कदाचित् ही किसी को कुछ सन्देह हो। इनमें से कुछ पुस्तकों की प्रथम संस्करण में ही ५०,००० प्रतियाँ निकल गई। और अब उनका सोलहवाँ संस्करण ९५ सेंटिम्स में बिक रहा है। इन पुस्तकों के मूल्य में जो भिन्नता है वही भिन्नता अश्लील वर्णनों में भी है। इस प्रकार 'ट्राइस नुइट्स डेमर' नामक पुस्तक ३० सेंट में ख़रीदीं जा सकती है। 'लेस [ २४६ ]पिचीज़ रोज़ेज़' २५ सेंट में। 'लेस ऐडवेंचर्स डुराय पौज़ले' या 'मैरेटी' ९५ सेंट में। 'ला मार्ट डे सेक्सेज़' या 'अफ्रीडिट' या 'लेस डेमी विरजेज़' या 'जर्नल ऊनी फेमी डे चैम्बर' या......प्रसिद्ध लेखकों के समस्त प्रेमपन्यास ३ फ्रैंक ५० सेंट प्रति के हिसाब से ख़रीदे जा सकते हैं। अश्लील पुस्तक लिखने में किसी प्रकार का अनादर नहीं समझा जाता। कई संस्करण निकल जायँ तो और भी अच्छा। इस प्रकार प्रसिद्धि प्राप्त लोगों को विश्वविद्यालयों में स्थान मिल सकता है या कम से कम 'क्राइक्स डे आनर' का सम्मान तो मिलता ही है। कभी कभी ये माननीय लेखक महाशय अपरिपक्व आयु की कुमारियों के, कोई चोट पहुँचने या गर्भ-पात के, मुक़दमों में जज बनाकर बैठाये जाते हैं परन्तु जान पड़ता है कि इन अपराधों की गिनती केवल युवावस्था की भूलों में की जाती है जिन्हें उदार जज महोदय बड़ी सरलता के साथ क्षमा कर देते हैं। और कुछ आक्षेप करने योग्य कृत्यों का उनके सुन्दर साहित्यिक जीवन पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। इतनी ही सरलता से वे ऐसे समझौते भी कर लेते हैं जिनसे उन्हें कुछ राजनैतिक लाभ होता है।........."

अतः इस बात पर पाठकों को आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि एम॰ ब्यूरो की पुस्तक में वर्णित आधुनिक सभ्य-समाज की कुमारी को अन्त में यह कहना पड़ा कि 'कैसी थकानेवाली बात है! इतना अश्लील साहित्य पढ़ने के पश्चात् अब मुझे कोई ऐसी वस्तु पढ़ने को नहीं मिलती जो मेरे गालों पर लज्जा की लाली दौड़ा सके।' एम॰ ब्यूरो इसी सिलसिले में लिखते हैं[१९]

"इन पर्चों और पुस्तकों के सस्ती होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति उन्हें सरलतापूर्वक खरीद कर पढ़ सकता है। पाठकों की बड़ी संख्या है। तम्बाकू और समाचार-पत्रों की दुकानों में, पुस्तकालयों में, तथा स्टेशन पर पुस्तक बेचनेवालों के पास ऐसी पुस्तकों का ढेर लगा रहता है। इस अश्लील साहित्य के अतिरिक्त इससे भी अश्लील साहित्य होता है जो थोड़े में सन्तुष्ट न होनेवाले व्यभिचारियों और विशेषकर ऐसी ही वस्तुएँ संग्रह करनेवालों के लिए होता है। 'लायन्स' और पेरिस के सूची-पत्रों में ऐसी अश्लील पुस्तकों का विज्ञापन मिलता है एक सूची-पत्र में ११४ मिन्न-भिन्न पुस्तकों का विज्ञापन है जिनका मूल्य २० फ़्रैंक प्रति पुस्तक तक है। दूसरे में २२९ पुस्तकों [ २४७ ]का विज्ञापन है जिनका मूल्य ५ से १० फ़्रेंक तक प्रति पुस्तक है। ये पुस्तकें इतनी अश्लील हैं कि इनका नाम भी मैं यहाँ देना उचित नहीं समझता। कुछ पुस्तकें ऐसी भी हैं जो ६०,१०० और १५० क प्रति के हिसाब से बेची जाती हैं। अश्लील पुस्तकों के एक विशेषरूप से प्रचलित सूचीपत्र में केवल एक ही लेखक की २२ पुस्तकों का विज्ञापन है। विदेशियों में फ्रांस की इन गन्दी पुस्तकों के प्रचार के लिए इटली और स्पेन मुख्य केन्द्र हैं। 'मैडरिड' से एक सूची-पत्र––नम्बर १०८––प्रकाशित हुआ है। इसमें अत्यन्त ही गन्दी २९८ पुस्तकों का विज्ञापन है। ये पुस्तकें एक फ्रैंक में ही प्रति के हिसाब से मिल जाती हैं। बड़ी पुस्तकों के दाम १० से १५ फ्रैंक तक हैं। ब्रासीलोना के एक पुस्तक-विक्रेता ने एक सूचीपत्र प्रकाशित कराया है। उसमें १०० पुस्तक-मालाओं का विज्ञापन है जो एक से एक बढ़कर गन्दी और अश्लील हैं। इस सूचीपत्र में अँगरेज़ी की जिन पुस्तकों का विज्ञापन दिया गया है वे ११३ भिन्न-भिन्न शीर्षकों में विभक्त करके दी एक प्रति २५ से लेकर २५० फ्रैंक तक में मिलती है। एक पुस्तक ६ बड़े बड़े भागों में समाप्त हुई है। इसका मूल्य १८७५ फ्रैंक हैं जो कुछ नहीं समझा जाता।"

"यह अश्लील साहित्य अपने पाठकों को और भी भड़कानेवाले प्रकाशन––अश्लील फोटो-की ओर ले जाता है। परन्तु यहाँ हम ऐसे विषय पर पहुँच जाते हैं जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, जिसकी कथा नहीं सुनाई जा सकती और जो अश्लीलता की सीमा को पार कर जाता है।............

"यह व्यापार एक शक्तिमान् अन्तर्जातीय संघ के अधिकार में चल रहा है और ऐसा अश्लील चित्र-साहित्य बेचने में इसे बहुत ही सफलता मिलती है। क्योंकि फोटोग्राफी को भी अन्य चित्र-कलाओं की भाँति भाषा की विभिन्नता समझने से रोक नहीं सकती। पुर्तगाल, स्पेन, इटली, हालेंड, हङ्गरी, जर्मनी, बेलजियम, स्वीजरलैंड अपनी अश्लीलता और गन्दगी से फ्रांस को घेरे हुए हैं। कदाचित् इस बात में हमारा देश औरों के लिए भयोत्पादक नहीं है बल्कि स्वयं भयभीत है। पेरिस की इन पुस्तकों की दूकानों का प्रबन्ध बिना भेद-भाव के कहीं स्वयं फ्रांसीसी लोग करते हैं कहीं विदेशी लोग। एम्स्टर्डन में केवल एक दूकान ६,००० विभिन्न पुस्तकमालाएँ बेचती है। प्रत्येक में २५ फोटोग्राफ़ होते हैं। टूरिन में एक दूकान है उसकी कतिपय मालाओं की पुस्तकें ५,००,२,०००,३,००० और ७,००० फ्रैंक प्रति पुस्तक के हिसाब से बड़ी शीघ्रता के साथ विकती हैं।...... एम॰ पोर्सी लिखते हैं––'सत्य हमें यह कहने के लिए विवश करता है कि प्रति सप्ताह पेरिस के सचित्र समाचार-पत्रों की ३,००,००० से अधिक प्रतियों में ऐसे सूची[ २४८ ]पन्नों को देखने की सलाह दी जाती है जिनमें कि अत्यन्त अश्लील पुस्तक मालाओं का विज्ञापन रहता है।'

"पुलिस भी इस गन्दे व्यापार की ओर से आँखें बन्द किये रहती है। यह ऐसी समस्यायें उपस्थित कर देता है कि जिसकी भयङ्करता का जनता को अनुमान तक नहीं होता। एम॰ इमाइल पोर्सी का कहना है कि इन अश्लील चित्रों के प्रभाव से हृदय में बड़ी अशान्ति उत्पन्न हो जाती है और जो अभागे व्यक्ति इन्हें खरीदते हैं वे अत्यन्त भयङ्कर पापाचार करने के लिए काम-उत्तेजित हो उठते हैं। इन चित्रों आदि का प्रभाव बालकों और बालिकाओं पर तो और भी भयङ्कर पड़ता है। इन्हीं के कारण हमने अनेक कालिजों के छात्रों और छात्राओं को शरीर तथा मन दोनों से बर्बाद होते देखा है। बालिकाओं के सर्वनाश का तो इससे प्रबल उपाय और हो ही नहीं सकता। स्वयं व्यभिचार में लिप्त स्त्री-पुरुषों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है––उसके सम्बन्ध में हम कुछ नहीं कहेंगे। इनको तो ये तुरन्त अनाचार और नाश के गड्ढे में ढकेल देते हैं।"

इन अश्लील प्रकाशनों द्वारा केवल सदाचार को धक्का ही नहीं लगता बरन इनसे मनुष्य को सब प्रकार के अनाचारों की शिक्षा भी मिलती है। मिस मेयो ने कुछ शैव-मन्दिरों की नङ्गी मूर्तियों को लेकर बड़ा शोर मचाया है। परन्तु योरप की चित्रकला और मूर्ति-निर्माण-कला से नग्न-प्रदर्शन कमी भी पृथक् नहीं रहा है। लिडनर्ड डा बिंसी के समान महान् चित्रकार––कदाचित् जाग्रति-काल के सर्वश्रेष्ठ चित्रकार के सम्बन्ध में भी कहा जाता है कि उसने अपने उल्लेखनीय चित्रों में से एक में विषय-भोग का गाढ़ालिङ्गन अङ्कित किया था। परन्तु वर्तमान काल में व्यापारिक उद्देश्य को सामने रखकर जिस अश्लीलता का प्रकाशन किया जा रहा है उसे कला की दृष्टि से भी कदापि उचित नहीं कहा जा सकता। ब्लाच ने इस अश्लील प्रकाशन का वर्णन करते हुए इस व्यवसाय के केन्द्रों का भी वर्णन किया है:––

"इन बड़े बड़े अश्लील ग्रन्थों[२०] के साथ ही साथ निम्न कोटि का प्रकाशन भी हो रहा है। ये चित्र और लेख गन्दगी और अश्लीलता में सीमा पार कर जाते हैं। और अत्यन्त ही नीचे दर्जे के तथा कुरुचि-पूर्ण होते हैं। पोस्ट[ २४९ ]कार्डों पर या तो चित्र होते हैं या नृत्य के फोटो होते हैं। जिनमें सम्भोग के समस्त अश्लील दृश्यों का चित्र में या लेख में वर्णन रहता है। सब बातों को हम यहाँ नहीं देना चाहते। कौतुक-प्रेमी लोग ब्लाच की पुस्तक देख सकते हैं।......"ये चिन्न और फोटो आदि फ्रांस, जर्मनी, वेलजियम और स्पेन में तैयार किये जाते हैं (विशेषकर वार्सीलोना में)[२१]

व्यभिचार करने के लिए रबड़ के पुतलों का बनाना तथा अन्य रबड़ की चीज़ों का बनना भी एक इसी प्रकार का व्यवसाय है।

ये सब व्यवसाय विज्ञापन में बहुत कुछ व्यय करते हैं। मिस मेयो ने भारतीय सामाचार-पत्रों में, नपुंसकता आदि दूर करने के विज्ञापनों से यहाँ के निवासियों की दशा सिद्ध करने की चेष्टा की है। परन्तु पाश्चात्य देशों के समाचार-पत्रों में जो विज्ञापन प्रकाशित होते हैं वे इससे कहीं अधिक निन्दनीय होते हैं। डाक्टर ब्लाच ने अपनी पुस्तक में इनके नमूने[२२] दिये हैं।

"विवाह-सम्बन्धी अधिकांश विज्ञापन अर्थलाभ या अन्य दिल-बहलाव के उद्देश्य से प्रकाशित कराये जाते हैं। और वास्तव में इन्हें 'व्यभिचार के विज्ञापनों' में ही समझना चाहिए। यद्यपि प्रत्येक सम्भव उपाधियों-द्वारा विज्ञापन-दाता लोग अपनी इस कृति को छिपा रखते हैं

"सत्ताइस वर्ष की एक युवती विधवा किसी ऐसे पदाधिकारी से दोस्ती करना चाहती है जो अपने कर्म और वचन से उसे सन्तुष्ट कर सके।"

"एक विदेशी युवती किसी ऐसे व्यक्ति का परिचय प्राप्त करना चाहती है जो एक क्षणिक-कठिनाई से उसे बचा सके।"

"एक अधेड़ व्यापारी दोस्ताना बर्ताव के लिए किसी ऐसी स्त्री का परिचय प्राप्त करना चाहता है जो देखने में सुन्दर हो। पतले शरीर की हो तो और भी अच्छा।"

"एक दूकानदार युवती जिसकी आयु २० और ३० वर्ष के बीच में है किसी अच्छे कुल के युवक के साथ मित्रालाप करना चाहती है।" [ २५० ]"एक प्रशंसा-पत्र प्राप्त २४ वर्ष का वीर्यवान् स्विस युवक किसी ऐसी सुन्दरी के यहाँ नौकरी करना चाहता है जो अकेली रहती हो।"

"एक बुद्धिमान्, धनी और सुन्दर युवक एक कुलीन, धनी और सुन्दरी की संरक्षा में रहना चाहता है।"

ऐसे अनेक विज्ञापन, जिनमें युवती कुमारियाँ, स्त्रियाँ या विधवाएँ 'अकेले रहनेवाले धनी व्यक्तियों' की गृह-प्रबन्धिका बनने या उनके साथ रहने की इच्छा प्रकट करती हैं, प्रायः व्यभिचार के उद्देश्य से ही छपवाये जाते हैं। भाषाएँ सिखानेवाले विज्ञापनों का भी प्रायः यही उद्देश्य होता है।

"कमरों के विज्ञापन––इस प्रकार के विज्ञापनों में हमें 'सुविधासम्पन्न कमरा', 'पृथक द्वार का कमरा', 'विद्यार्थियों के लिए एकान्त कमरा' आदि बातें मिलती हैं। ऐसे कमरों का विज्ञापन प्रायः पुरुषों को ही सम्बोधित करके दिया जाता है। स्त्रियों को स्वयं इनकी खोज कर लेनी चाहिए। निम्न लिखित विज्ञापन से यह बात प्रकट हो जायगी।

"दिन में किराये पर दिये जानेवाले कमरों से जो विज्ञापन सम्बन्ध रखते हैं उनमें से अभिकांश का निर्देश 'सब प्रकार के साधनों––स्त्री-सुख-भोग आदि की ओर रहता है।"

व्यक्तिगत अनुसन्धान––इस शीर्षक के स्तम्भ से लोग समाचार-पत्रों में विज्ञापन छपाते हैं कि पुरस्कार स्वरूप कुछ पाने पर (जो कि प्रायः बहुत अधिक होता है) वे गुप्त-रीति से किसी मनोवाञ्छित्त व्यक्ति पर दृष्टि रखने का कार्य हाथ में ले सकते हैं। और अधिकतर यह दृष्टि रखने का कार्य केवल सम्बन्धित व्यक्ति के विषय-भोग संबन्धी जीवन और उद्योगों का पता लगाना ही होता है। नौकर रख लिये जाने पर ये लोग अत्यन्त नीच जासूस के समस्त डङ्गों का अवलम्बन करते हैं।......इस प्रकार का एक जासूसी विज्ञापन नीचे दिया जाता है:––

व्यक्तिगत अनुसन्धान

"गोपनीय! ज्ञातव्य! सदा-सफल! सत्य! व्यापक! असाधारण रूप से संतोष-प्रद दाम्पत्य अनुसन्धान; जीवनचर्या, पारिवारिक सम्बन्ध, सम्भोग, चरित्र की विशेषताएँ, व्यवसाय, वर्तमान दशा, भूतकालीन दुराचार, भावी लक्षण, सम्पत्ति की स्थिति, गुप्त सम्भोग; इत्यादि, [ २५१ ]ब्लाच ने जिस 'उच्च कोटि' की अश्लीलता का ऊपर के उद्धृत पैराग्राफ में वर्णन किया है, वह साहित्य और नाटक इत्यादि की अश्लीलता है। फ्रांस के नाटकों आदि के सम्बन्ध में एम॰ ब्यूरो लिखते हैं[२३]:––

"फ्रांस में या फ्रांस के बाहर कौन नहीं जानता कि हमारे नाटक लिखने वालों ने गत तीस वर्षों से व्यभिचार, स्वतंत्र प्रेम, गन्दा जीवन और विवाह-विच्छेद के अत्यन्त दूषित दृश्यों को रङ्गमन्च पर लाने के लिए अपने आपको खूब संलग्न कर रक्खा है। हमारे समय के रवाजों को अङ्कित करने के बहाने कोई यह कह सकता है कि फ्रांस में विश्वासघातिनी नियतमाओं के अतिरिक्त और प्रियतमाएँ नहीं है; भद्दे और मूर्ख पतियों के अतिरिक्त और कोई पति नहीं हैं, और कोमल तथा सम्मानयोग्य भावों की एक मात्र अधिकारिणी केवल अर्द्धवेश्याएं हैं। रङ्गमन्च पर केवल पतित व्यक्तियों के हाव-भाव और घोर कामोलेजना को ही आदर मिलता है।......

"कहीं उपाख्याल और गीत अत्यन्त अश्लील होते हैं। नाटक में बने ऐतिहासिक पुरुष और अन्य दृश्य भी विषय-भोग-सम्बन्धी बातों को ही चित्रित करते हैं। दर्शक––उनमें एक सहत्र से अधिक प्रसिद्ध पुरुष होते हैं (कम से कन वे दिखलाई इसी प्रकार पड़ते हैं)––अत्यन्त प्रशंसोदार प्रकट करते हैं। कहीं छोटे गीत और उपाख्यान बहुत ही अश्लील होते हैं। और हाव-भाव ऐसे प्रदर्शित किये जाते हैं कि सदाचार का सार्वजनिक रूप से संहार होने लगता है। इन दृश्यों को देखकर छोटे बच्चे भी खूब प्रसन्न होते हैं और अपने माता-पिता की आँखों के सामने ही तालियाँ बजाकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करते हैं। कहीं दर्शकों की एक बड़ी जमात एक ऐसे नाटककार को जो अपना कार्य एक अत्यन्त अश्लील गीत के साथ समाप्त करता है, पाँच बार खुल्लाकर वही गीत सुनती है।

"जिन नाटकों में गुप्त और अनुचित प्रेम अधिन रहता है उनकी और भी प्रशंसा होती है। क्योंकि वे प्रत्येक पद में अधिक से अधिक गन्दगी का रसास्वादन कराते हैं,

युद्ध के पश्चात् से इन बातों का प्रचार और भी अधिक बढ़ गया है। जिन नाटकों का मुख्य विषय 'माता या बहन के साथ व्यभिचार' करना रहता है उनकी और भी प्रशंसा होती है। नोएल कावर्ड के एक नाटक में [ २५२ ]माता और पुत्र परस्पर सम्भोग करते हुए उपस्थित किये गये हैं। झुण्ड के झुण्ड ऐसे लोग हैं जिनमें मिस्टर कावर्ड के समान भी कलात्मक गुण नहीं है पर कुरुचि प्रचार में वे खूब सफल हो रहे हैं। अँगरेज़ी नाटक साहित्य के समालोचक श्रीयुत जेम्स अगेट अपनी गत वर्ष में प्रकाशित एक पुस्तक में लिखते हैं कि मिस्टर सोमर्स्ट मौघम जिन्हें 'नटखट-नाट्य' कहते हैं उनको लिखने की बुद्धि नहीं रखते। परन्तु उनकी 'अवर वेटर्स' नामक पुस्तक ने लोगों के लिए एक फैशन की उत्पत्ति कर दी है। आज-कल लन्दन के रङ्गमञ्च पर इन्हीं 'नटखट नाट्यों' का साम्राज्य है। परन्तु मिस्टर अगेट को यह विश्वास है कि यह केवल एक सामयिक फैशन है और अधिक काल तक नहीं टिकेगा। अच्छा हो यदि यह अधिक काल तक न टिके।

भारत-सरकार ने सिनेमा के सम्बन्ध में जाँच करने के लिए एक कमेटी बनाई है। क्योंकि वह अमरीका की फिल्मों के विरुद्ध ब्रिटिश फिल्मों को प्रोत्साहन देना चाहती है। अमरीका की फिल्मों के विरुद्ध जो बातें कही जाती हैं उनमें एक यह है कि वे अत्यन्त कामोत्तेजक होती हैं। इससे सरकार भारत के नव-युवकों को इनसे बचाना चाहती है। अमरीका के विरुद्ध इस भेद-नीति से भारतीय-मतैक्य नहीं है। क्योंकि भारत के पास वर्तमान स्थिति में ग्रेट ब्रिटेन या साम्राज्य का कृतज्ञ होने का कोई कारण नहीं है। 'युवकों के सदाचार की रक्षा करने की बात' सरकार का वहाना-मात्र है। सिनेमा के नियंत्रण की बात भी कोरी बात ही है। बनेर्ड -शा ने अपनी पुस्तक की एक भूमिका में इस बहाने का जो भण्डाफोड़ किया था, उसे कोई भूल नहीं सकता है। जान पड़ता है कि इस नियंत्रण ने केवल उन्हीं लेखकों की रचना पर बनी फिल्मों को जब्त किया है जिनका उद्देश्य 'पूर्णरूप से सदाचार का प्रचार करना रहा है। जैसे––शा, टाल्सटाय और इबसन। शा की 'मिसेज़ वारेन्स प्रोफेसन' की फिल्म ज़ब्त कर ली गई थी और वर्षों वह रङ्गमञ्च पर नहीं आ सकी। नाटक की भूमिका में शा ने बड़ी सफलता के साथ यह दर्शाया है कि मेरा नाटक प्रदर्शन की आज्ञा प्राप्त करने के लिए यथेष्ट अश्लील नहीं था।

*** [ २५३ ]उदार और स्वतंत्र विचार इस समस्या को हल करेंगे या कट्टर नियमानुकूल दिवार? जिनकी कि आज नियम-पालन करने की अपेक्षा नियम भङ्ग करने में ही प्रतिष्ठा है––यह प्रश्न स्वयं ही अभी एक समस्या बना हुआ है।

हाँ, दक्ष निरीक्षकों को जो बात निश्चयरूप से दिखाई देती है वह यह है कि आधुनिक पाश्चात्य जीवन में कामेात्तेजना स्वास्थ्य की सीमा को उल्लंघन कर गई है। ब्लाच कहते हैं[२४]

"एक महान् चिकित्सक का कथन है 'हम तीन बार––बहुत अधिक भोजन करते हैं।' इस कथन को और स्पष्ट करने के लिए मैं इसमें इतना और जोड़ देता हूँ कि हम केवल तीन बार-बहुत अधिक भोजन ही नहीं करते हैं बदन हम समस्त दूसरे इन्द्रिय-सुखों को भी बहुत अधिक मात्रा में चाहते हैं इसलिए हम प्रेम भी तीन बार––बहुत अधिक करते हैं या यह कि हम प्रायः सम्भोग करने में लगे रहते हैं।"

इस 'आवश्यकता से अधिक कामी जीवन का हमारे मनोभावों पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ता है। 'हमारे एक अत्यन्त बुद्धिमान् मनोविज्ञान नेत्ता' विली हेलपैक की निम्नलिखित सम्मति को स्वीकार करके ब्लाच ने अपनी पुस्तक में उद्धत किया है:––

"हमारे नवयुवकों की एक बड़ी संख्या के लिए स्त्री-प्रसंग वैसी ही साधारण बात है जैसे ताश खेलना, शाम को क्लब में जाना, और शराब पीना और उन अल्प-संख्यक जनों में भी जो अन्य प्रकार से रहते हैं अधिकांश ऐसे होते हैं जो केवल भयवश या शक्ति की कमी के कारण ऐसा करते हैं।"

एक लोकप्रिय अँगरेज़ लेखक––'एक गर्द साफ करनेवाले सज्जन' ने 'दी ग्लास आफ फैशन'[२५] नामक अपनी एक लोकप्रिय पुस्तक में यही विचार व्यक्त किये हैं :-

"मैं इस वायुमण्डल को जो प्रायः समस्त समाज को आच्छादित किये हुए है मानव-जाति के उच्च जीवन के लिए धातक समझता हूँ। इसने प्रेम को [ २५४ ]जीवन की एक गन्दगी––दाँत दिखाने और कान में कहने का विषय, अश्लील प्रदर्शन का विषय, गप्पबाज़ी, सभी चार व्यक्तियों में एक किसी दूषित कथा का विषय––बना दिया है। यह संहारक वायुमण्डल है। यह प्रेम को उतनी ही शीघ्रता के साथ नष्ट कर डालता है जितनी शीघ्रता के साथ गर्भ-पात कराने वाला वैद्य भावी मनुष्य को।"

विषय-भोग अब केवल समय नष्ट करने का साधन माना जा रहा है। ब्लाच के शब्दों में समय नष्ट करना भी एक महान् आधुनिक रोग है। 'समय नष्ट करना' या 'सुख से समय काटना' वर्तमान समय में किसी रोग से कम नहीं प्रतीत होता। 'दी ग्लास आफ़ फ़ैशन[२६] के रचयिता ने यह सर्वया सत्य लिखा है कि आधुनिक पापाचार अधिकांश में 'सुख से समय काटने' की रुग्ण लालसा का परिणाम है:––

"हमारी सार्वजनिक सड़कों पर होनेवाले पापाचार में महान् परिवर्तन हो गया है। पतिता स्त्रियों की एक नवीन जाति उत्पन्न हो गई है। वे दफ्तरों और दुकानों से शिक्षित होकर निकलती हैं। वे युवती होती हैं और शिखर की चमक पर विमुग्ध हो जाती हैं। वे फ़ैशन, सदाचार पर आक्रमण करने वाली पोशाक, सुनहले विश्रामगृह, नाट्यशाला और रात्रि के विनोद-भवन का जीवन चाहती हैं।

"वे दुष्टा नहीं होती। वेश्याओं को यह शिकायत है कि वे उनकी प्रतिद्वन्द्विता करती हैं। पर उनका स्वभाव वेश्याओं का-सा पापी नहीं होता। उनसे पूछिए कि तुम क्या चाहती हो तो वे तुरन्त उत्तर देंगी––'दिल बहलाने का समय'। बस इतना ही,और कुछ नहीं। वे जीवन का आनन्द लेना चाहती हैं! हमारी समाज की सर्व-सम्पन्न तथा श्रेष्ट स्त्रियों के जीवन को उन्होंने अपना आदर्श बनाया है। और अपने अल्प साधनों के अनुसार उसी का अनुकरण करती हैं। इसलिए पहले वे अपनी लज्जा बेचती हैं और फिर उसके पश्चात् अपना सदाचार। यही मूल्य है जिसे देकर वे अपने 'दिल बहलाव का समय' खरीदती हैं।"

***

इन बातों का अन्त यहीं नहीं हो जाता। इस प्रकार की यह कुव्यवस्था बड़े-बड़े भयङ्कर पाप करवाती है और भयङ्कर इन्द्रिय-रोगों का प्रसार करती [ २५५ ]है। मिस मेयो ने भारतवासियों में इन्द्रिय रोगों की बहुलता की बात कही है। इस बात का समर्थन करने के लिए न तो उसके पास अङ्क हैं, न चिकित्सकों के प्रमाण हैं और न उसने कोई अनुसन्धान ही किया है। वह केवल अस्पताल की कुछ घटनाओं का वर्णन करती है; पाठकों को यह भी नहीं बतलाती कि इन घटनाओं का ज्ञान उसे कहीं से और कैसे हुआ; और उन्हीं पर अपनी सम्मति प्रकट करने लगती। इस बात के मानन का यथेष्ट कारण है कि भारतवर्ष में इन्द्रिय-रोगों का विस्तार इतना अधिक नहीं है जितना कि पाश्चात्य देशों में। इतिहास इस बात का प्रमाण दे सकता है कि इस सम्बन्ध में योरप से ही 'संसार को खतरा' है। एशिया के अन्य देशों के साथ भारतवर्ष को गर्मी का रोग ४ या ५ शताब्दी पूर्व पुर्तगालवालों से और योरप की अन्य जातियों से मिला था। ठीक उसी भांति जैसे कि अफ्रीका के मूल निवासियों को आज यह उनमें सभ्यता का प्रचार करनेवाले गोरों से मिल रहा है। भारतवासी गर्मी की बीमारी को 'फिरङ्गी रोग' कहते हैं, क्योंकि यह उन्हें 'फिरङ्ग' अर्थात् योरपनिवासियों से मिला था। डाक्टर इवान ब्लाच ने अपनी गर्मी रोग के इतिहास नामक पुस्तक में इस विषय का पूर्ण रूप से वर्णन किया है और निश्चय के साथ यह दिखलाया है कि ५५ वीं शताब्दी के अन्त तक सभ्य संसार में यह रोग अज्ञात था। इस प्रसिद्ध प्रामाणिक लेखक ने निम्नलिखित शब्दों में इस इतिहास का संक्षिप्त वर्णन कर दिया है[२७]:––

"गर्नी का रोग पहले पहल १४९३ और १४९४ में कोलम्बस के जहाजी साथीयों द्वारा स्पेन में लाया गया था। वे लोग इस रोग को मध्य अमरीका से और विशेषकर 'इती' नामक टापू से ले आये थे! अष्टम चार्लस की सेना-द्वारा यह स्पेन से इटली पहुँचा। वहीं इसने महामारी का रूप धारण कर लिया। और इस सेना के तोड़ दिलो जाने के पश्चात् सैनिकों द्वारा यह रोग योरप के दूसरे देशों में भी पहुँच गया। पुर्तगालवाले इसे दूर के पूर्वी देशों––भारतवर्ष, चीन और जपान––में भी ले गये।"

इस रोग के इतिहासकार बतलाते हैं कि १६ वीं शताब्दी में यह योरप में महामारी के समान फैला हुआ था। और सम्पन्न लोगों में विशेषरूप से था। [ २५६ ]डाक्टर ब्लाच का कथन है कि अब योरप में गर्मी रोग का प्रकोप पहले की अपेक्षा कुछ कम हो गया है। क्योंकि योरपवासियों के पूर्वजों में यह रोग इतना अधिक फैला हुआ था कि अब वर्तमान सन्तति के रक्त में इसका प्रभाव कम करने की बहुत कुछ शक्ति पैदा हो गई है। ब्लाच[२८]कहते हैं––'हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए गर्मी रोग से बड़ा घोर युद्ध किया था। स्वयं इस रोग से पीड़ित होकर उन्होंने हमें इसके ज़ोर से बचा दिया। ब्लाच ने अलबर्ट रीम्बेर का निम्नलिखित वाक्य उद्धृत किया है:––

"इस समय योरप में जो लोग बसे हैं उनमें से प्रत्येक के गत ४०० वर्षों में ४,००० पूर्वज रह चुके हैं। इसमें से एक बड़ी संख्या को गर्मी-रोग से अवश्य युद्ध करना पड़ा होगा। यह बात सुनने में चाहे जितनी कडुवी प्रतीत हो पर है सत्य।"

भिन्न भिन्न पाश्चात्य देशों और नगरों में इन्द्रिय-रोगों के सम्बन्ध में जो अनुसन्धान हो रहे हैं उनसे पश्चिम की अवस्था कुछ अच्छी नहीं जान पड़ती। पाश्चात्य राज्य इस रोग के विरुद्ध आन्दोलन और उससे बचने के उपार्यों का प्रचार करने में अत्यन्त धन व्यय कर रहे हैं। इस दिशा में भारत सरकार ने अभी बहुत कम उद्योग किया है। फिर भी यह तो प्रत्यक्ष ही है कि इस संबन्ध में भारत की अपेक्षा पश्चिम की कहीं अधिक बुरी आवस्था है।

ब्लाच ने १९०० ई॰ में प्रूसिया में किये गये एक अनुसन्धान का फल प्रकाशित किया है और क्रिचनर की इस सम्मति को उद्धृत किया है कि 'प्रूसिया में एक से दूसरे को हो जानेवाले इन्द्रिय-रोगों से प्रतिदिन १,००,००० व्यक्ति पीड़ित रहते हैं।' ब्लासेक्का की जाँच के आधार पर ब्लाच कहते हैं कि 'जान पड़ता है कि जो लोग ३० वर्ष से ऊपर की आयु में प्रथम बार विवाह करते हैं उनमें से औसत दर्जे पर प्रत्येक को दो बार सुज़ाक हो चुका रहता है और प्रत्येक चार या पाँच में एक को गर्मी का रोग हो चुका रहता है।'[२९] [ २५७ ]ब्लाच के प्रामाणिक ग्रन्थ से नीचे एक और पैराग्राफ़ उद्धत किया जाता है। यह उन्होंने कोपेनहेगेन के अङ्कों के आधार पर लिखा था[३०]:––

"२० वर्ष से लेकर ३० वर्ष तक की आयु के समस्त युवकों में प्रतिवर्ष १०० में १६ से २० तक इन्द्रिय-रोगों से ग्रसित रहते हैं। ८ में १ सुज़ाक से और ५५ में १ गर्मी से पीड़ित रहते हैं। गत दस वर्षों में प्रतिशत ११९ मनुष्य इन्द्रिय-रोगों से पीड़ित पाये गये। अर्थात् प्रत्येक मनुष्य को एक बार से अधिक इन रोगों का शिकार होना पड़ा।"

इतने पर भी डेनमार्क की दशा योरप के दूसरे देशों की अपेक्षा कहीं अच्छी है। ब्लाच कहते हैं[३१]:––

"डेनमार्क, जर्मनी, जर्मन-आस्ट्रिया और स्वीज़लेंड में परिस्थिति अत्यन्त-अनुकूल प्रतीत होती है। इसके पश्चात् बेलजियम, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल तथा उत्तर और मध्य इटली का नम्बर आता है। दक्खिन इटली, यूनान, टर्की रूस, और इँगलैंड की अवस्था अत्यन्त शोचनीय है।"

हेवलाक एलिस की पुस्तक में हमें निम्नलिखत बात पढ़ने को मिलती है[३२]:––

"इस प्रश्न पर विचार करने के लिए अमरीका में न्यूयार्क के चिकित्सा-संघ ने एक अनुसन्धान समिति बनाई। इस समिति ने पूर्ण रूप से अनुसन्धान करने के पश्चात् अपना इस आशय का फल प्रकाशित किया कि न्यूयार्क नगर में प्रतिवर्ष कम से कम २,५०,००० व्यक्ति इन्द्रिय-रोगों के शिकार होते हैं।––और न्यूयार्क के एक प्रमुख चर्मरोग चिकित्सक ने कहा कि उच्च घराने के लोगों में कम से कम एक तिहाई ऐसे हैं जिनके बेटों को गर्मी का रोग है। मैं अन्तरङ्ग रूप से यह बात जानता हूँ। एक प्रामाणिक लेखक के अनुमान के अनुसार जर्मनी में प्रतिवर्ष कम से कम ८,००,००० व्यक्ति इन्द्रिय-रोगों के शिकार होते हैं। बड़े विश्वविद्यालयों में २५ प्रतिशत विद्यार्थी इन रोगों से ग्रस्त पाये जाते हैं। यह लिखने की आवश्यकता नहीं कि विद्यार्थियों में इन्द्रिय[ २५८ ]रोग विशेषरूप से पाये जाते हैं। फ्रांस और ग्रूसिया के युद्ध में जितने मनुष्य थे उनकी एक तिहाई संख्या इन्द्रिय-रोगों के कारण प्रतिवर्ष जर्मन-सेना से अयोग्य ठहराकर पृथक् कर दी जाती है। परन्तु इतने पर भी यदि जर्मन-सेना की तुलना ब्रिटिश-सेना से की जाय तो वह इन्द्रिय-रोगों से कहीं अधिक स्वतन्त्र प्रतीत होगी। ब्रिटिश सेना में गर्मी का रोग जितना पाया जाता है उतना किसी भी अन्य योरपीयन सेना में नहीं पाया जाता।"

इस वक्तव्य के साथ एलिस ने निम्नलिखित पाद-टिप्पणी भी लगा दी है:––

"भारतवर्ष में भी जहाँ तक अँगरेज़ी सेना का सम्बन्ध है (एच॰ सी॰ फ्रेंच-लिखित सेना में गर्मी का रोग, १९०७) इन्द्रिय-रोग देशी सिपाहियों की अपेक्षा गोरे सिपाहियों में दसगुना अधिक पाया जाता है। राष्ट्रीय सेनाओं के बाहर अस्पताल में भर्ती हुए रोगी सिपाहियों की संख्या और इस रोग से मृत्यु-संख्या देखने पर पता चलता है कि इन्द्रिय-रोगों में अमरीका सबसे प्रधान ही नहीं है––बल्कि सब देशों से बहुत आगे भी बढ़ गया है। अमरीका के पश्चात् ग्रेटब्रिटेन का नम्बर है। तब फ्रांस और उसके पश्चात् आस्ट्रियाहङ्गरी, रूस और जर्मनी आदि हैं।........."

१९१४ ई॰ में इन्द्रिय-रोगों के सम्बन्ध ने शाही जाँच कमीशन के सामने गवाही देते हुए डाक्टर डगलस ह्वाइट ने कहा था कि मेरे आनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष अकेले लन्दन में १,२२,५०० नवीन व्यक्तियों को इन्द्रिय-रोग हो जाता है, और संयुक्त राज्य अमरीका में ८,००,००० नवीन व्यक्तियों को। इनमें १,१४,००० व्यक्तियों को गर्मी का रोग होगा। इन अङ्कों के आधार पर उन्होंने यह अनुमान किया है कि संयुक्त राज्य अमरीका में ३,००,००० गर्मी के रोगी अवश्य होंगे।[३३] यदि इस अङ्क में उन लोगों की भी एक बहुत बड़ी संख्या जोड़ दीजिए जिन्हें अपने जीवन के किसी न किसी समय में सुज़ाक हो चुका हो तो आपको ज्ञात होगा कि मिस क्रिस्टेबुल पैंकर्स्ट का यह अनुमान कि समस्त जन-संख्या का ७५ प्रतिशत भाग किसी न किसी समय में इन्द्रिय-रोगों का शिकार रह चुका है, अतिशयोक्ति-पूर्ण नहीं है। [ २५९ ]हम एलिस[३४] के नीचे दो और संक्षिप्त उद्धरण देकर इन्द्रिय-रोगों का विषय समाप्त कर देंगे:––

"उड रगिल्स ने अमरीका के सम्बन्ध में लिखा है (जैसा कि नोगरेध ने पहले न्यूयार्क के सम्बन्ध में लिखा था) कि युवा पुरुषों में ७५ से ८० प्रतिशत तक सूज़ाक पाया जाता है।"

इँगलेंड के सम्बन्ध में लिखा है कि:––

"इँगलैंड में कुछ वर्ष पूर्व नश्तर से लम्बन्ध रखनेवाले एक लेखक ने अपने अनुभवों और अनुसन्धानों के परिणाम स्वरूप लिखा था कि युवा पुरुषों में ७५ प्रतिशत ऐसे हैं जिन्हें एक बार सूज़ाक हुया था, ४० प्रतिशत ऐसे हैं जिन्हें दो बार सूज़ाक हुआ था और १५ प्रतिशत ऐसे हैं जिन्हें तीन या इससे भी अधिक बार सूज़ाक हुआ था।"

भारतवर्ष से इस सम्बन्ध में संसार को आशङ्का हो या न हो। परन्तु इतिहास से यह बात सिद्ध है कि योरप से उसके इन्द्रिय-रोग फैलाने के कारण संसार को आशंका है। आज भी योरप मूल जातियों में––जिन्हें यह सभ्य बनाने का दम भरता है––इन रोगों का प्रचार कर रहा है। और आज भी उसके पास इन रोगों का इतना बड़ा भाण्डार है कि उससे संसार को खतरा हो सकता है[३५]

*****
[ २६० ]योरोपियन समाज के समस्त वर्गों में गर्भावरोध के समस्त उपायों का खूब प्रचार होने पर भी वर्तमान समय में गर्भपातों की संख्या बढ़ती ही चली जा रही है। एम॰ पाल ब्यूरो लिखते हैं[३६]:—

"१९०५ ईसवी में डाक्टर डालरिस ने प्रसव-दात्री संस्था के सम्मुख कुछ अङ्क उपस्थित किये थे। 'उसके सात वर्ष पश्चात् बोसीकौट अस्पताल में गर्भपात और जीवित प्रसूत बच्चों की संख्या का समानुपात ७:७ था। उनकी संख्या का समानुपात १७:७ है।"

एक पाद-टिप्पणी में वे कहते हैं:—

"फिर भी एम॰ लुकास चैम्पोनियर (सर्जन) ने चैलेंज किया है कि ये अङ्क पर्याप्त नहीं हैं।"

पुनश्च[३७]:—

"लायन्स निवासी प्रोफ़ेसर लैकस्सेग्न ने अपनी पुस्तक 'प्रेसिस डे मेडिसियन लिगेल' में लिखा है कि लायन्स में, प्रतिवर्ष १० हज़ार गर्भ गिराये जाते हैं। यह बात उन्होंने एक बड़े गम्भीर विवरण के आधार पर लिखी है। स्थानाभाव के कारण उसको यहाँ सविस्तर देना असम्भव है। अब जनसंख्या देखिए। यह लगभग ५,५०,००० है। और वार्षिक जन्म-संख्या ८,००० से ९,००० के बीच में है। उसी चिकित्सक के अनुसार प्रतिवर्ष गिराये जानेवाले गर्भों की संख्या ५,००० है। अर्थात् जन्म-संख्या की दो-तिहाई। [ २६१ ] पेरिस के सम्बन्ध में डाक्टर राबर्ट मोनिन कहते हैं—'प्रतिवर्ष गिराये जानेवाले गर्भों की संख्या हम १,००,००० अनुमान कर सकते हैं। परन्तु हमें इस बात का दृढ़ निश्चय रखना चाहिए कि यह संख्या वास्तविक संख्या से बहुत कम है। प्रोफ़ेसर वोर्डिन का अनुमान है कि समस्त देश में प्रति दिन ५०० गर्भ गिराये जाते हैं। अर्थात् एक वर्ष में १,८२,०००। चिकित्सक-संघ के भूतपूर्व सभापति डाक्टर पाल लड्राय इस बात पर दृढ़ हैं कि आज-कल जन्म-संख्या की अपेक्षा गर्भ-पात-संख्या अधिक है। ये सब अनुमान एक दूसरे से बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं। यदि मुझे स्वयं अपनी सम्मति भी इसमें सम्मिलित करनी पड़े तो मैं कहूँगा कि यह संख्या लगभग २,७५,००० और ३,२५,००० के बीच में है। ये अङ्क उन अङ्कों से मिलते हैं जिन पर फ्रांस की प्रसव-दात्री संस्था १९०० ईसवी में पहुँची थी। उस संस्था का तब अनुमान था कि गर्भ गिराने की प्रथा के कारण गर्भाधान के एक तिहाई फल नष्ट हो जाते हैं।

"डाक्टर व्वायसर्ड के मतानुसार (जनरल डु प्रैक्टिसीन, १९०८) लायन्स में १५० धात्रियाँ थीं। इनमें कम से कम १०० पर गर्भ गिराने का सन्देह था। उनमें से एक ने स्वीकार किया था कि उसने प्रतिसप्ताह ३ गर्भपात किये थे। अर्थात् वर्ष भर में १५०। यदि सन्देहग्रस्त धात्रियों की संख्या १०० मान ली जाय तो हम देखते हैं कि ५०,००० की जन-संख्या में प्रतिवर्ष १०,००० गर्भ गिराये जाते हैं। इसलिए यह सिद्ध है कि लायन्स में जन्म की अपेक्षा गर्भपात अधिक है।"

एम॰ ब्यूरो कहते हैं कि फ्रांस में 'लोकमत पर भ्रूण-हत्या का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसीलिए अदालत पर भी इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।' 'पार्लियामेंट द्वारा बिना कोई परिवर्तन कराये ही रवाज ने क़ानून को रद्द कर दिया।' ऐसी दशा में सोवियट रूस ने गर्भ गिराने के लिए सब सामग्री से युक्त चिकित्सा-भवनों की स्थापना करके एक प्रकार से प्रशंसा का कार्य्य किया है। यह वास्तविकता का स्पष्टरूप से स्वीकार कर लेना है और बुरे सौदे को अच्छे से अच्छा बनाना है। वोलशेविकों के व्यभिचार को सभ्य योरपियन लोग बड़ा भयङ्कर बताते हैं। और उनके प्रतिवर्ष एक बड़ी संख्या में गर्भ गिराने पर आश्चर्य्य करते हैं। परन्तु अमरीकन लोगों की भांति रूसी लोग अपने गर्भपातों को छिपाते नहीं।

गर्भपात से शिशु-हत्या एक ही क़दम पर है। और शिशु-हत्या भी किसी अंश में कम नहीं है। एक ऐसे समय में, जब कि भारतवर्ष से शिशु-हत्या [ २६२ ]मिट रही है, कुछ पाश्चात्य देशों में इसकी वृद्धि हो रही है, और इस वृद्धि का कारण भी बिल्कुल भिन्न है। फ्रांस के सम्बन्ध में एम॰ व्यूरो कहते हैं[३८]

"गर्भ-पात के साथ ही साथ शिशु-हत्या, माता-बहन के साथ व्यभिचार और ऐसे ऐसे पाप होते हैं कि प्रकृति अत्याचार से घबड़ा उठती है। शिशु-हत्या के सम्बन्ध में विशेष कहना नहीं। अविवाहिता माताओं को समस्त सुविधाएँ प्रदान की गई हैं। गर्भावरोध तथा गर्भपात का बाज़ार गर्म है। फिर भी शिशु-हत्या का पाप बढ़ता ही जा रहा है। सम्माननीय कहे जानेवाले लोगों के हृदयों में अब इसके प्रति पहले जैसा धृणा का भाव नहीं पैदा होता। ऐसे व्यक्तियों को ज्यूरी लोग भी अपने निर्णय में प्रायः 'निरपराध' घोषित कर देते हैं।"

शिशु-हत्या[३९] के सम्बन्ध में फ्रांस के न्यायालयों का झुकाव किस ओर है? इसको दिखलाने के लिए एम॰ व्यूरो ने निम्नलिखित दो उदाहरण उद्धृत किये हैं:––

"फरवरी १९१८ ईसवी में लायर ज़िला के लिए स्थापित एसाइज़ की अदालत ने एफ॰ और डी॰ नाम की दो कुमारियों को शिशु-हत्या के अपराध में दो भिन्न भिन्न मुक़दमों में छोड़ दिया। पहली स्त्री के कुटुम्बियों ने उसके पहले शिशु की भाँति इस शिशु का भी पालन-पोषण करने का बचन दिया था। परन्तु उसने इसका ध्यान न कर नव-जात को पानी में डुबोकर मार डाला था। डी॰ नामक कुमारी ने अपने शिशु का गला घोट कर और उसका सिर दीवाल पर पटक कर उसे समाप्त कर दिया था।

"मार्च १९१८ ईसवी में सीन के ज्यूरीगण इससे भी बहुत आगे निकल गये। और ला स्कैला की मेरिया एम॰ नामक २१ वर्षीया नर्तकी को छोड़ दिया। इस नर्तकी ने अपने शिशु की जिह्या बाहर खींच लेने की चेष्टा की थी, उसकी खोपड़ी को चूर कर डाला था और उसका गला काट दिया था। इस कृति के पश्चात् उसने लाश को एक आलमारी में छिपा दिया था। यह फ्रांस की राजधानी की मार्च १९१८ की उस समय की घटना है जब, उन रक्त के प्यासे दिनों के आरम्भ में, देश की युवावस्था के सुमन मृत्यु का सामना करने गये थे ताकि फ्रांस बना रहे।" [ २६३ ]यह शिशु-हत्या, उन जातियों की अपेक्षा जो बिगड़ी हुई प्राचीन प्रथा के वशीभूत होकर शिशु-हत्या करती हैं, कहीं अधिक जान बूझ कर की जाती है। इस बात पर विचार करते हुए बच्चों के प्रति कठोर भाव और 'उनके विरुद्ध किये गये पापाचार' पर किसी को आश्चर्य्य नहीं करना चाहिए। अस्तु, इस विषय पर हम एक पृथक् अध्याय में विचार करेंगे।

योरप और अमरीका के अन्य इससे भी भयङ्कर पापों—माता-बहन के साथ व्यभिचार, पाशविक व्यभिचार इत्यादि—का वर्णन अत्यन्त भड़कानेवाला और वीभत्स होगा। अतः उसे हमने छोड़ दिया है। जो इनके सम्बन्ध में जानना चाहें वे ब्लाच, क्रैफ़्ट एवनिङ्ग, और दूसरे सरकारी चिकित्सकों के प्रामाणिक ग्रन्थ पढ़ें।

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मिस मेयो ने ऐंग्लो इंडियन अफ़सरों की गणना सन्तों में की है। वह कहती है—उनमें बहुत से साधु हैं। ये 'साधु' लोग मन ही मन में उसकी गन्दगी-संग्रह पर प्रसन्न हो रहे होंगे। क्योंकि यह उनके राजनैतिक विरोधियों को दुष्ट और कामी के रूप में उपस्थित करती है। हम उनकी समाज पर आक्षेप करना नहीं चाहते। परन्तु उन्हें यह बतला देना उचित है कि यदि एक अमरीकन यात्री ने भारतीय धर्माचरण का वर्णन करने के लिए अलकतरे की कूची का प्रयोग किया है तो दूसरे ऐंग्लो इंडियनों का चरित्र-चित्रण करने में भी ऐसा ही कर सकते हैं और सच तो यह है कि किया भी है। मिस मेयो की पुस्तक के इँगलिश प्रकाशक—जोनाथन केप—ने केवल ५ वर्ष पूर्व 'बारबारा विङ्गफील्ड स्ट्रैटफोर्ड' नामक एक अँगरेज़ महिला की पुस्तक प्रकाशित की थी। इस महिला ने कदाचित् मिस मेयो की अपेक्षा भारतवर्ष में अधिक समय व्यय किया था। इस पुस्तक में ऐंग्लो इंडियनों के समाज के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन मिलता है[४०]:—

"क्योंकि इस पृथ्वी पर ऐंग्लो इंडियन से बढ़कर बुरा समाज कभी नहीं था। कला-साहित्य और सङ्गीत तो मानों उनके लिए है ही नहीं। युद्ध के दिनों


[ २६४ ]में उनकी यह सुख-भोग की इच्छा और गम्भीर परिणामों से भागने की प्रवृत्ति विशेषरूप से स्पष्ट हो गई थी। यदि कोई युद्ध के आरम्भ के दिनों में इँगलैंड के अन्धकारमय और दुःखी जीवन से निकल कर सीधा भारतवर्ष के इस सुख में मन तथा विचारविहीन समाज में प्रवेश करता तो उसके आश्चर्य्य का ठिकाना न रहता। यहां यह कहना कठिन था कि कहीं कोई युद्ध भी हो रहा है। इससे सन्देह नहीं कि सरकारी तौर पर किये गये उत्सवों—जैसे सिविल सर्विस और रेजिमेंट सम्बन्धी नृत्यों को कुछ काल के लिए बन्द कर दिया गया था। परन्तु तब भी यथेष्ट चहल-पहल रहती थी। क्लब में प्रति सप्ताह या सप्ताह में दो बार नृत्य होते थे। खेल-कूद के मैदानों और व्यायाम-शालाओं में अच्छी भीड़ रहती थी। सरकारी अफ़सरों की ओर से दावतें होती रहती थीं। व्यक्तिगत सहभोजों का भी बाहुल्य था। आगे क्या होनेवाला है? इसकी किसी को चिन्ता नहीं प्रतीत होती थी। युद्ध के समाचार जानने की भी किसी को विशेष इच्छा नहीं होती थी। सच बात तो यह है कि युद्ध की चर्चा ही बहुत कम होती थी।"

ऐंग्लो इंडियन समाज के स्त्री-पुरुष-विषयक सदाचार के सम्बन्ध में इस अँगरेज़ महिला ने लिखा है[४१]:—

"ऐंग्लो इंडियन समाज के विरुद्ध प्रायः यह आक्षेप किया गया है कि उनका सदाचार-सम्बन्धी आदर्श इँगलैंड की अपेक्षा निम्न कोटि का है। परन्तु इस समाज के समर्थकों ने इस बात का सदैव घोर-विरोध किया है। वहाँ परिस्थिति ही सर्वथा भिन्न है। और इस बात को ध्यान में रखकर कि अस्थायी नौकरों का जीवन सुखभोग को ही सब कुछ समझ बैठता है, हमें उनके सम्बन्ध में सहानुभूति के साथ विचार करना चाहिए ।......किसी प्रकार भी हो यह बात अवश्य कौतूहल-पूर्ण है कि जो श्रीमती स्मिथ यदि सौभाग्य से ब्रोमली, या पिनर या पश्चिम हैम्पस्टेड में रहने को स्वच्छ और छोटा सा गृह पा जातीं तो निष्कलङ्क, योग्य, सुगृहिणी, और सुमाता होतीं, सम्मान से ऊब जातीं और केवल अपने बच्चों में, अपने गृहकार्य्य में और अपनी अल्पसंख्यक सहेलियों में निमग्न रहतीं, वे ही दुर्भाग्य से भारतवर्ष में रहने पर सांसारिक वासनाओं में फँस जाती हैं, केवल सुख-भोग की बातें सोचती हैं और प्रतिमास एक नये "युवक" को अपने पास रखती हैं। क्योंकि भारतवर्ष में प्रायः प्रत्येक स्त्री, जिसकी अवस्था ५० वर्ष से कम होती है, अपना एक ख़ास 'युवक' रखती [ २६५ ]है। उसी के साथ वह सवार होकर निकलती है, नाचती है और पहाड़ियों में सैर करने जाती है। क्लब में निरन्तर वही युवक उसकी सेवा में रहता है। वास्तव में वह लार्ड बायरन द्वारा प्रशंसित 'प्रेमी नौकर' का ही प्रायः सब काम करता है। इसमें सन्देह नहीं कि ये चञ्चल मित्रताएँ धनी-भूत होने पर विभिन्न रूप धारण कर लेती हैं। कुछ वास्तविक मित्रता में और कुछ गम्भीर प्रेम में परिणत हो जाती हैं। पर उनमें से अधिकांश प्रेम के खेल, नष्टप्राय यौवन-गुमान के सन्तोष, और जो स्त्रियां यह सुनकर भयभीत हो उठती है कि वे इन सब बातों में अनुरक्त और दृढ़ पत्नियां नहीं हैं उनके आवेश-पूर्ण सैल-सपाटों के अतिरिक्त और कुछ नहीं होती।....."

आगे ऐसी ही बातों का सावेस्तर वर्णन किया गया है। परन्तु उन्हें हम यहां उद्धृत नहीं करना चाहते। भारतवर्ष के ब्रिटिश-समाज का अपमान करने की हमें तनिक भी इच्छा नहीं है। परन्तु यदि वे मिस मेयो के सुर में सुर मिलाना आरम्भ कर दें तो उन्हें यह स्मरण दिलाया जा सकता है कि मिस मेयो भारतवासियों के सम्बन्ध में जितना जान सकती है, बारबारा विङ्गफील्ड स्ट्रैडफोर्ड से अपने इन चचेरे भाइयों के सम्बन्ध में उससे कहीं अधिक अच्छा ज्ञान रखने की आशा की जा सकती है।

मिस मेयो अपने विषय-भोग-सम्बन्धी गन्दे वर्णनों का पक्ष समर्थन करने के लिए एबे डुबोइस के सन्देहजनक प्रमाणों को उपस्थित करना भी अनावश्यक समझती है। हम देख चुके हैं कि एबे भी उसके इस कथन का समर्थन नहीं करता कि भारतीय स्त्रियां भारत के पुरुष की पहुँच में जाने का साहस नहीं कर सकती। इस संबन्ध में उसके पास प्रमाण-स्वरूप केवल मार्शल ला के समय की एक सूचना-पत्र की कथा है जिसकी कि बहुत कुछ निन्दा हो चुकी है। उसने यह सूचना-पत्र मार्शल ला और अशान्ति के संबन्ध में हन्टर कमेटी द्वारा की गई जांच-पड़ताल के विवरण में से खोद निकाला है। कांग्रेस की जांच-समिति ने जिसके सदस्यों में महात्मा गांधी और स्वर्गीय सी॰ आर॰ दास भी सम्मिलित थे, इस कथा का अनुसन्धान किया था और अपने विवरण में इसे पूर्ण रूप से असत्य सिद्ध कर दिया था। इस बात का मिस मेयो कहीं उल्लेख तक नहीं करती। सच तो यह है कि इस संबन्ध में [ २६६ ]भारतीय आदर्श विशेष उच्च है। डाक्टर कार्नेलियस ने अपने करेन्ट हिस्ट्री (चालू इतिहास) के लेख में—इसके कुछ अंश उपसंहार में मिलेंगे—मिस मेयो के इस आक्षेप पर टिप्पणी करते हैं कि 'जिन क़िलों और छावनियों में ब्रिटिश सिपाही रहते हैं उन्हीं के आस पास स्त्रियां सुरक्षित नहीं रहतीं।' मिस विङ्गफील्ड स्ट्रैटफोर्ड ने अपनी 'भारत और अँगरेज़' नामक पुस्तक में भारतीय सदाचार के इस अङ्ग पर लिखा है[४२]:—

"यह कभी सिद्ध नहीं किया गया कि बलवे के दिनों में एक अँगरेज़ महिला का भी सतीत्व नष्ट किया गया हो। कानपूर में भी सिपाहियों ने स्त्री और बच्चों की हत्या करना दृढ़ता के साथ अस्वीकार कर दिया था और इस काम के लिए बाज़ार से मुसलमान क़साई बुलवाये गये थे। यह बात सरकारी क़ाग़जों में दर्ज है कि १८२४ ईसवी में बारकपुर के बलवे में बलवे के नेताओं ने अपने आप यह पवित्र प्रतिज्ञा की थी कि चाहे जो हो वे योरपियन स्त्रियों और बच्चों को कोई कष्ट न पहुँचावेंगे और न उनकी लज्जा अपहरण करेंगे। बलवे के दिनों तक एक अँगरेज़ अफ़सर अपने बच्चों को सिपाहियों के घरों में जाने देता था और उनके साथ खेलने देता था। और जब तक बन्दूक़ों की आवाज़ साफ़ साफ़ नहीं सुनाई पड़ने लगी तब तक स्त्रियों को अपना निवास छोड़ने का कष्ट नहीं उठाना पड़ा था। सर एण्ड्रूफ्रेसर कहते हैं—'वे (भारतवासी) भली स्त्रियों के प्रति, चाहे वे योरपियन हो चाहे भारतीय, वीरतापूर्ण सम्मान प्रकट करते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं।"



  1. विशेष-भोज और समाज (विषय-भोग-सम्बन्धी मनोभावों के अध्ययन की छठी पुस्तक) एफ॰ ए॰ डेविस, फिलाडेल्फिया, १९२१, पृष्ठ ३८०।
  2. एलिस। उसी ग्रन्थ से––पृष्ठ ३७८।
  3. आधुनिक युवकों की बगावत। बोनी एण्ड लिवरीघट, न्यूयार्क १९२५––अध्याय ५––७।
  4. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३८७
  5. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ४९३
  6. एलिस, उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३७७
  7. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३७७-८८। डाक्टर एल्सी क्लूज़ पार्सन का उल्लेख उसकी पुस्तक-दी फेमिली पृष्ठ ३५१ के लिए है।
  8. टुवर्ड्स मारल बैंक्रप्टसी। डाक्टर मैरी स्कार लीव लिखित भूमिका। लन्दन, कान्स्टैबुल—१९२५। पृष्ठ—१६।
  9. उसी पुस्तक से, पृष्ठ १५।
  10. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३४७।
  11. स्वामी की समस्या, जेम्स मारचैंट लिखित। (मोफ़द एंड यार्ड, न्यूयार्क, १९१७) पृष्ठ १८६।
  12. उसी पुस्तक से, पृष्ठ १८६।
  13. उसी पुस्तक से, पृष्ठ १८७।
  14. मारचैंट-द्वारा उद्धृत उसी पुस्तक से, पृष्ठ १८८।
  15. पृष्ठ १६५-६६
  16. एम्मा गोल्ड मैन द्वारा उद्धृत। उसी पुस्तक से पृष्ठ १८७।
  17. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३९।
  18. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३९।
  19. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ४०––४२।
  20. इसके सम्बन्ध में हम आगे लिखेंगे।
  21. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ७३६-७।
  22. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ७२३ और आगे।
  23. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ४३-४५।
  24. उसी पुस्तक से।
  25. लन्दन मिल्स एण्ड बून १३१-१३२।
  26. पृष्ठ १४२।
  27. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३५५।
  28. पृष्ठ ३८४
  29. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३९४-५
  30. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३९३।
  31. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३९२।
  32. 'विषय-वासना और समाज' नामक पुस्तक, पृष्ठ ३२७।
  33. दी मास्टर प्रोब्लेम।
  34. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३३०-३।
  35. संसार के लिए भयस्वरूप होने के सम्बन्ध में सोवियत रूस की जितनी निन्दा की गई है उतनी और किसी देश की नहीं की गई। निस्सन्देह रूस उनके हितों के लिए अवश्य भयप्रद है जो उसकी इस प्रकार निन्दा करते हैं। कुछ भी हो, एक बात की ओर ध्यान आकर्षित करना आवश्यक प्रतीत होता है। "गर्मी के रोग ने करीब करीब भयङ्कर प्लेग का रूप धारण कर लिया है। शहरों की इससे बुरी दशा तो है ही, कोई गाँव भी ऐसा नहीं है जो इससे अछूता बचा हो। इस वक्तव्य में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है। यह मैंने डाक्टर शीमस्को (स्वास्थ्य के अध्यक्ष) से स्वयं मालूम किया है। और मैंने उन सरकारी विज्ञप्तियों का भी सहारा लिया है जो समय समय पर बोलशेविक समाचार-पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं। गर्मी की बीमारी बहुत बुरी तरह फैली हुई है। साधारण मनुष्य जितना सोच सकता है उससे भी बहुत अधिक। यहाँ हम देखते हैं कि १३ करोड मानवों का राष्ट्र रोग-ग्रस्त है। यह सोचने पर कि भावी सन्तति पर और अन्य सम्बन्धित जातियों पर इसका क्या भयङ्कर प्रभाव पड़ेगा दिल दहल उठता है।" देखिए पृष्ठ २३८, रूसी क्रान्ति १९१७-१६२६ लैंसलाट लाटन, मैकमिलन लिखित। यह वर्णन, यदि सत्य हो तो रूस को संसार के हित में भयप्रद कहना किसी अंश तक क्षम्य हो सकता है।
  36. उसी पुस्तक से, २६।
  37. वही पुस्तक, पृष्ठ २८।
  38. वही पुस्तक, पृष्ठ ३५।
  39. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३५, पादटिप्पणी।
  40. भारतवर्ष और अँगरेज़, भूमिका लेखक, माननीय श्रीनिवास शास्त्री, (१९२३) पृष्ठ ३५।
  41. उसी पुस्तक से, पृष्ठ ३६-३८
  42. उसी पुस्तक से, पृष्ठ १२६।