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प्रसाद वाङ्मय द्वितीय खण्ड/ध्रुवस्वामिनी

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प्रसाद वाङ्मय
द्वारा जयशंकर प्रसाद

[ ७०१ ]



ध्रुवस्वामिनी
[ ७०३ ]
पात्र सूची



ध्रुवस्वामिनी

मन्दाकिनी

कोमा


चन्द्रगुप्त

रामगुप्त

शिखर स्वामी

पुरोहित


शकराज

खिंगिल

मिहिर देव


सामन्त कुमार, शक सामन्त, प्रतिहारी, प्रहरी, दासी, कुबड़ा, बौना, नर्त्तकियाँ [ ७०५ ]
प्रथम अंक

[शिविर का पिछला भाग, जिसके पीछे पर्वतमाला की प्राचीर है, शिविर का एक कोना दिखलाई दे रहा है, जिससे सटा हुआ चन्द्रातप टँगा है / मोटी-मोटी रेशमी डोरियों से सुनहले काम के परदे खम्भों से बंधे हैं / दो-तीन सुन्दर मंच रक्खे हुए हैं / चन्द्रातप और पहाड़ी के बीच छोटा-सा कुंज / पहाड़ी पर से एक पतली जलधारा उस हरियाली में बहती है / झरने के पास शिलाओं से चिपकी हुई लता की डालियाँ पवन में हिल रही हैं / दो-चार छोटे-बड़े वृक्ष, जिन पर फूलों से लदी हुई सेवती को लता छोटा-सा झुरमुट बना रही है।

शिविर के कोने से ध्रुवस्वामिनी का प्रवेश / पीछे-पीछे एक लम्बी और कुरूप स्त्री चुपचाप नंगी तलवार लिये आती]

ध्रुवस्वामिनी––(सामने पर्वत की ओर देख कर) सीधा तना हुआ, अपने प्रभुत्व की साकार कठोरता, अम्रभेदी उन्मुक्त शिखर! और इन क्षुद्र कोमल निरीह लताओं और पौधों को इसके चरण में लोटना ही चाहिए न! (साथवाली खड्गधारिणी की ओर देखकर) क्यों, मन्दाकिनी नहीं आई? (वह उत्तर नहीं देती है) बोलती क्यों नही? यह तो मैं जानती हूँ कि इस राजकुल के अन्तःपुर में मेरे लिए न जाने कब से नीरव अपमान संचित रहा, जो मुझे आते ही मिला; किन्तु क्या तुम-जैसी दासियों से भी वही मिलेगा? इसी शैलमाला की तरह मौन रहने का अभिनय तुम न करो, बोलो! (वह दाँत निकालकर विनय प्रकट करती हुई कुछ और आगे बढ़ने का संकेत करती है) अरे, यह क्या; मेरे भाग्य-विधाता! यह कैसा इन्द्रजाल? उस दिन राजमहापुरोहित ने कुछ आहुतियों के बाद मुझे जो आशीर्वाद दिया था, क्या वह अभिशाप था? इस राजकीय अन्तःपुर में अब जैसे एक रहस्य छिपाये हुए चलते हैं, बोलते हैं और मौन हो जाते हैं। (खड्गधारिणी विवशता और भय का अभिनय करती हुई आगे बढ़ने का संकेत करती है) तो क्या तुम मूक हो? तुम कुछ बोल न सको, मेरी बातों का उत्तर भी न दो, इसीलिए तुम मेरी सेवा में नियुक्त की गयी हो? यह असह्य है। इस राजकुल में एक भी सम्पूर्ण मनुष्यता का निदर्शन न मिलेगा क्या? जिधर देखो कुबड़े, बौने, हिजड़े, गूँगे और बहरे...। (चिढ़ती हुई ध्रुवस्वामिनी आगे बढ़कर झरने के [ ७०६ ]किनारे बैठ जाती है, खड्गधारिणी भी इधर-उधर देखकर ध्रुवस्वामिनी के पैरों के समीप बैठती है)

खड्गधारिणी––(सशंक चारों ओर देखती हुई) देवि, प्रत्येक स्थान और समय बोलने के योग्य नहीं होता, कभी-कभी मौन रह जाना बुरी बात नहीं है। मुझे अपनी दासी समझिए। अवरोध के भीतर में गूँगी हूँ। यहाँ संदिग्ध न रहने के लिए मुझे ऐसा ही करना पड़ता है।

ध्रुवस्वामिनी––अरे तो क्या तुम बोलती भी हो? पर यह तो कहो, यह कपट-आचरण किस लिए?

खड्गधारिणी––एक पीड़ित की प्रार्थना सुनाने के लिए। कुमार चन्द्रगुप्त को आप भूल न गयी होगी।

ध्रुवस्वामिनी––(उत्कण्ठा से) वही न, जो मुझे बंदिनी बनाने के लिए गये थे।

खड्गधारिणी––(दांतों से जीभ दबाकर) यह आप क्या कह रही हैं? उनको तो स्वयं अपने भीषण भविष्य का पता नहीं। प्रत्येक क्षण उनके प्राणों पर संदेह करता है। उन्होंने पूछा है कि मेरा क्या अपराध है?

ध्रुवस्वामिनी––(उदासी की मुस्कराहट के साथ) अपराध? मैं क्या बताऊँ! तो क्या कुमार भी बन्दी हैं?

खड्गधारिणी––कुछ-कुछ वैसा ही है देवि! राजाधिराज से कहकर क्या आप उनका कुछ उपकार कर सकेंगी?

ध्रुवस्वामिनी––भला मैं क्या कर सकूँगी? मैं तो अपने ही प्राणों का मूल्य नहीं समझ पाती। मुझ पर राजा का कितना अनुग्रह है, यह भी मैं आज तक न जान सकी। मैंने तो कभी उनका मधुर सम्भाषण सुना ही नहीं। विलासितियों के साथ मदिरा में उन्मत्त, उन्हें अपने आनन्द से अवकाश कहाँ!

खड्गधारिणी––तब तो अदृष्ट ही कुमार के जीवन का सहायक होगा। उन्होंने पिता का दिया हुआ स्वत्व और राज्य का अधिकार तो छोड़ ही दिया, इसके साथ अपनी एक अमूल्य निधि भी...। (कहते-कहते सहसा रुक जाती है)

ध्रुवस्वामिनी––अपनी अमूल्य निधि! वह क्या?

खड्गधारिणी––वह अत्यन्त गुप्त है देवि, किन्तु मैं प्राणों की भीख माँगती हुई कह सकूँगी।

ध्रुवस्वामिनी––(कुछ सोचकर) तो जाने दो, छुपी हुई बातों से मैं घबरा उठी हूँ। हाँ, मैंने उन्हें देखा था, वह निरभ्र प्राची का बाल-अरुण! आह! राजचक्र सबको पीसता है, पिसने दो, हम निस्सहायों को और दुर्बलों को पिसने दो।

खड्गधारिणी––देवि, वह वल्लरी जो झरने के समीप पहाड़ी पर चढ़ गयी है, [ ७०७ ]उसकी नन्हीं-नन्हीं पत्तियों को ध्यान से देखने पर आप समझ जायँगी कि वह काई की जाति की है। प्राणों की क्षमता बढ़ा लेने पर वही काई जो बिछलन बनकर गिरा सकती थी, अब दूसरों के ऊपर चढ़ने का अवलम्बन बन गयी है।

ध्रुवस्वामिनी––(आकाश की ओर देखकर) वह, बहुत दूर की बात है। आह, कितनी कठोरता है! मनुष्य के हृदय में देवता को हटाकर राक्षस कहाँ से घुस आता है? कुमार की स्निग्ध, सरल और सुन्दर मूर्ति को देखकर कोई भी प्रेम से पुलकित हो सकता है। किन्तु, उन्हीं का भाई? आश्चर्य?

खड्गधारिणी––कुमार को इतने में ही सन्तोष होगा कि उन्हें कोई विश्वासपूर्वक स्मरण कर लेता है। रही अभ्युदय की बात, सो तो उनको अपने बाहु-बल और भाग्य पर ही विश्वास है।

ध्रुवस्वामिनी––किन्तु उन्हें कोई ऐसा साहस का काम न करना चाहिए जिसमें उनकी परिस्थिति और भी भयानक हो जाय। (खड्गधारिणी खड़ी होती है)

––अच्छा, तो अब तू जा और अपने मौन संकेत से किसी दासी को यहाँ भेज दे। मैं अभी यहीं बैठना चाहती हूँ।

[खड्गधारिणी नमस्कार करके जाती है/और एक दासी का प्रवेश]

दासी––(हाथ जोड़कर) देवि, सायंकाल हो चला है। वनस्पतियाँ शिथिल होने लगी हैं। देखिए न, व्योम-विहारी पक्षियों का झुण्ड भी अपने नीड़ों में प्रसन्न कोलाहल से लौट रहा है। क्या भीतर चलने की अभी इच्छा नहीं है?

ध्रुवस्वामिनी––चलूँगी क्यों नही? किन्तु मेरा नीड़ कहाँ? यह तो स्वर्ण-पिञ्जर है।

[करूण भाव से उठकर दासी के कन्धे पर हाथ रखकर चलने को उद्यत होती है / नेपथ्य में कोलाहल / 'महादेवी कहाँ हैं? उन्हें कौन बुलाने गयी है?']

ध्रुवस्वामिनी––हें-हें, यह उतावली कैसी?

प्रतिहारी––(प्रवेश करके घबराहट से) भट्टारक इधर आये हैं क्या?

ध्रुवस्वामिनी––(व्यंग से मुस्कराती हुई) मेरे अंचल मे तो छिपे नही हैं। देखो किसी कुञ्ज में ढूँढो।

प्रतिहारी––(संभ्रम से) अरे महादेवी, क्षमा कीजिए। युद्ध-सम्बन्धी एक आवश्यक संवाद देने के लिए महाराज को खोजती हुई मैं इधर आ गयी हूँ।

ध्रुवस्वामिनी––होंगे कहीं, यहाँ तो नही हैं।

[उदास भाव से दासी के साथ ध्रुवस्वामिनी का प्रस्थान / दूसरी ओर से खड्गधारिणी का पुनः प्रवेश और कुञ्ज में से अपना उत्तरीय सँभालता [ ७०८ ]हुआ रामगुप्त निकलकर एक बार प्रतिहारी की ओर फिर खड्गधारिणी की ओर देखता है]

प्रतिहारी––जय हो देव! एक चिन्ताजनक समाचार निवेदन करने के लिए अमात्य ने मुझे भेजा है।

रामगुप्त––(झुँझला कर) चिन्ता करते-करते देखता हूँ कि मुझे मर जाना पड़ेगा / ठहरो (खड्गधारिणी से) हाँ जी, तुमने अपना काम तो अच्छा किया, किन्तु मैं समझ न सका कि चन्द्रगुप्त को वह अब भी प्यार करती है या नहीं?

[खड्गधारिणी प्रतिहारी की ओर देखकर चुप रह जाती है]

रामगुप्त––(प्रतिहारी की ओर क्रोध से देखता हुआ) तुमसे मैंने कह न दिया कि अभी मुझे अवकाश नहीं, ठहर कर आना।

प्रतिहारी––राजाधिराज! शकों ने किसी पहाड़ी राह से उतर कर नीचे का गिरि-पथ रोक लिया है। हम लोगों के शिविर का सम्बन्ध राज-पथ से छूट गया है। शकों ने दोनो ही ओर से घेर लिया है।

रामगुप्त––दोनों ओर से घिरा रहने में शिविर और भी सुरक्षित है। मूर्ख! चुप रह (खड्गधारिणी से) तो ध्रुवदेवी, क्या मन-ही-मन चन्द्रगुप्त को... है न मेरा सन्देह ठीक?

प्रतिहारी––(हाथ जोड़ कर) अपराध क्षमा हो देव! अमात्य, युद्ध-परिषद्में आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

रामगुप्त––(हृदय पर हाथ रखकर) युद्ध तो यहाँ भी चल रहा है, देखता नहीं, जगत् की अनुपम सुन्दरी मुझ से स्नेह नहीं करती और मैं हूँ इस देश का राजाधिराज!

प्रतिहारी––महाराज, शकराज का सन्देश लेकर एक दूत भी आया है।

रामगुप्त––आह! किन्तु ध्रुवदेवी! उसके मन में टीस है (कुछ सोच कर) जो स्त्री दूसरे के शासन में रहकर और प्रेम किसी अन्य पुरुष से करती है, उसमें एक गम्भीर और व्यापक रस उद्वेलित रहता होगा। वही तो ..नहीं, जो चन्द्रगुप्त से प्रेम करेगी वह स्त्री न जाने कब चोट कर बैठे? भीतर-भीतर न जाने कितने कुचक्र घूमने लगेंगे (खड्गधारिणी से) सुना न, ध्रुवदेवी से कह देना चाहिए कि वह मुझे और मुझसे ही प्यार करे। केवल महादेवी बन जाना ठीक नहीं।

[खड्गधारिणी का प्रतिहारी के साथ प्रस्थान और शिखरस्वामी का प्रवेश]

शिखरस्वामी––कुछ आवश्यक बातें कहनी है देव!

रामगुप्त––(चिन्ता से उँगली दिखाते हुए, जैसे अपने-आप बातें कर रहा हो) ध्रुवदेवी को लेकर क्या साम्राज्य से भी हाथ धोना पड़ेगा! नहीं तो [ ७०९ ]फिर? (कुछ सोचने लगता है) ठीक तो, सहसा मेरे राजदण्ड ग्रहण कर लेने से पुरोहित, अमात्य और सेनापति लोग छिपा हुआ विद्रोह-भाव रखते हैं। (शिखर से) है न? केवल एक तुम्हीं मेरे विश्वासपात्र हो। समझा न? यही गिरि-पथ सब झगड़ों का अन्तिम निर्णय करेगा। क्यों अमात्य, जिसकी भुजाओं में बल न हो, उसके मस्तिष्क में तो कुछ होना चाहिए?

शिखरस्वामी––(एक पत्र देकर) पहले इसे पढ़ लीजिए! (रामगुप्त पत्र पढ़ते-पढ़ते जैसे आश्चर्य से चौंक उठता है) चौंकिए मत, यह घटना इतनी आकस्मिक है कि कुछ सोचने का अवसर नहीं मिलना।

रामगुप्त––(ठहर कर) है तो ऐसा ही; किन्तु एक बार ही मेरे प्रतिकूल भी नहीं। मुझे इसकी सम्भावना पहले से भी थी।

शिखरस्वामी––(आश्चर्य से) ऐं? तब तो महाराज ने अवश्य ही कुछ सोच लिया होगा। मेघ-संकुल आकाश की तरह जिसका भविष्य घिरा हो, उसकी बुद्धि को तो बिजली के समान चमकना ही चाहिए।

रामगुप्त––(सशंक) कह दूँ! सोचा तो है मैंने; परन्तु क्या तुम उसका समर्थन करोगे?

शिखरस्वामी––यदि नीति-युक्त हुआ तो अवश्य समर्थन करूँगा। सबके विरुद्ध रहने पर भी स्वर्गीय आर्य समुद्रगुप्त की आज्ञा के प्रतिकूल मैंने ही आपका समर्थन किया था। नीति-सिद्धान्त के आधार पर ज्येष्ठ राजपुत्र को।

रामगुप्त––(बात काटकर) वह तो––वह तो मैं जानता हूँ, किन्तु इस समय जो प्रश्न सामने आ गया है उस पर विचार करना चाहिए। यह तुम जानते हो कि मेरी इस विजय-यात्रा का कोई गुप्त उद्देश्य है। उनकी सफलता भी सामने दिखाई पड़ रही है। हाँ, थोड़ा-सा साहस चाहिए।

शिखरस्वामी––वह क्या?

रामगुप्त––शक-दूत सन्धि के लिए जो प्रमाण चाहता हो, उसे अस्वीकार न करना चाहिए। ऐसा करने में इस संकट के बहाने जितनी विरोधी प्रकृति है उस सबको हम लोग सहज में ही हटा सकेंगे।

शिखरस्वामी––भविष्य के लिए यह चाहे अच्छा हो; किन्तु इस समय तो हम लोगों को बहुत-से विघ्नों का सामना करना पड़ेगा।

रामगुप्त––(हँसकर) तब तुम्हारी बुद्धि कब काम में आयेगी? और हाँ, चन्द्रगुप्त के मनोभाव का कुछ पता लगा?

शिखरस्वामी––कोई नयी बात तो नहीं।

रामगुप्त––मैं देखता हँ कि मुझे पहले अपने अन्तःपुर के ही विद्रोह का दमन [ ७१० ]करना होगा। (निःश्वास लेकर) ध्रुवदेवी के हृदय में चन्द्रगुप्त की आकांक्षा धीरे-धीरे जाग रही है।

शिखरस्वामी––यह असम्भव नही; किन्तु महाराज! इस समय आपको दूत से साक्षात् करके उपस्थित राजनीति पर ध्यान देना चाहिए। यह एक विचित्र बात है कि प्रबल पक्ष सन्धि के लिए सन्देश भेजे।

रामगुप्त––विचित्र हो चाहे सचित्र, अमात्य, तुम्हारी राजनीतिज्ञता इसी में है कि भीतर और बाहर के सब शत्रु एक ही चाल मे परास्त हों। तो चलो।

[दोनों का प्रस्थान / मन्दाकिनी का सशंक भाव से प्रवेश]

मन्दाकिनी––(चारों ओर देखकर) भयानक समस्या है। मूर्खों ने स्वार्थ के लिए साम्राज्य के गौरव का सर्वनाश करने का निश्चय कर लिया है। सच है, वीरता जब भागती है, तब उसके पैरों से राजनीतिक छल-छन्द की धूल उड़ती है। (कुछ सोचकर) कुमार चन्द्रगुप्त को यह सब समाचार शीघ्र ही मिलना चाहिए। गूंगी के अभिनय में महादेवी के हृदय का आवरण तनिक-सा हटा है, किन्तु वह थोड़ा-सा स्निग्ध भाव भी कुमार के लिए कम महत्त्व नही रखता। कुमार चन्द्रगुप्त। कितना समर्पण का भाव है उसमें––और उसका बड़ा भाई रामगुप्त! कपटाचारी रामगुप्त। जी करता है इस कलुषित वातावरण से कहीं दूर, विस्मृति मे अपने को छिपा लूं। पर मन्दा। तुझे विधाता ने क्यों बनाया? (सोचने लगती है) नहीं, मुझे हृदय कठोर करके, अपना कर्तव्य करने के लिए यहाँ रुकना होगा। न्याय का दुर्बल पक्ष ग्रहण करना होगा।

[गाती है]

यह कसक अरे आँसू सह जा।
बनकर विनम्र अभिमान मुझे
मेरा अस्तित्व बता, रह जा।
बन प्रेम छलक कोने कोने
अपनी नीरव गाथा कह जा।
करुणा बन दुखिया वसुधा पर
शीतलता फैलाता बस जा।

[जाती है / ध्रुवस्वामिनी का उदास भाव से धीरे-धीरे प्रवेश / पीछे एक परिचारिका पान का डिम्बा और दूसरी चमर लिये आती है / ध्रुवस्वामिनी एक मंच पर बैठकर अधरों पर उँगली रखकर कुछ सोचने लगती है और चमरधारिणी चमर डुलाने लगती है]

ध्रुवस्वामिनी––(दूसरी परिचारिका से) हाँ, क्या कहा! शिखरस्वामी कुछ कहना चाहते हैं? कह दो, कल सुनूँगी, आज नहीं। [ ७११ ]

परिचारिका––जैसी आज्ञा। तो मैं कह आऊँ कि अमात्य से कल महादेवी बातें करेंगी?

ध्रुवस्वामिनी––(कुछ सोच कर) ठहरो तो, वह गुप्त-साम्राज्य का अमात्य है, उससे आज ही भेंट करना होगा। हाँ, यह तो बताओ, तुम्हारे राजकुल में नियम क्या है? पहले अमात्य की मंत्रणा सुननी पड़ती है, तब राजा से भेंट होती है?

परिचारिका––(दांतों से जीभ दबा कर) ऐसा नियम तो मैंने नही सुना। यह युद्ध-शिविर है न? परमभट्टारक को अवसर न मिला होगा। महादेवी! आपको सन्देह न करना चाहिए।

ध्रुवस्वामिनी––मैं महादेवी ही हूँ न? यदि यह सत्य है तो क्या तुम मेरी आज्ञा से कुमार चन्द्रगुप्त को यहाँ बुला सकती हो? मैं चाहती हूँ कि अमात्य के साथ ही कुमार से भी कुछ बातें कर लूँ।

परिचारिका––क्षमा कीजिए, इसके लिए तो पहले अमात्य से पूछना होगा।

[ध्रुवस्वामिनी क्रोध से उसकी ओर देखने लगती है और वह पान का डिब्बा रख कर चली जाती है / एक बौने का कुबड़े और हिजड़े के साथ प्रवेश]

कुबड़ा––युद्ध! भयानक युद्ध!!

बौना––हो रहा है, कि कहीं होगा मित्र!

हिजड़ा––बहनों, यही युद्ध करके दिखाओ न, महादेवी भी देख लें।

बौना––(कुबड़े से) सुनता है रे! तू अपना हिमाचल इधर कर दे––मैं दिग्विजय करने के लिए कुबेर पर चढ़ाई करूंगा।

[उसकी कूबड़ को दबाता है और कुबड़ा अपने घुटनों और हाथों के बल बैठ जाता है / हिजड़ा कुबड़े की पीठ पर बैठता है / बौना एक मोर्छल लेकर तलवार की तरह उसे घुमाने लगता है]

हिजड़ा––अरे! यह तो मैं हूँ नल-कूबर की वधू! दिग्विजयी वीर, क्या तुम स्त्री से युद्ध करोगे? लौट जाओ, कल आना। मेरे श्वशुर और आर्यपुत्र दोनों ही उर्वशी और रम्भा के अभिसार से अभी नहीं आये। कुछ आज ही तो युद्ध करने का शुभ मुहूर्त नहीं है।

बौना––(मोर्छल से पटा घुमाता हुआ) नहीं, आज ही युद्ध होगा। तुम स्त्री नहीं हो, तुम्हारी उँगलियाँ तो मेरी तलवार से भी अधिक चल रही है। कूबड़ तुम्हारे नीचे है। तब मैं कैसे मान लूँ कि तुम न तो नल-कूबर हो और न कुबेर! तुम्हारे वस्त्रों से मैं धोखा न खा जाऊँगा। तुम पुरुष हो, युद्ध करो।

हिजड़ा––(उसी तरह मटकते हुए) अरे, मैं स्त्री हूँ। बहनों कोई मुझसे ब्याह भले ही कर सकता है, लडाई मैं क्या जानूं? [ ७१२ ]

[दासी के साथ शिखरस्वामी का प्रवेश]

शिखरस्वामी––महादेवी की जय हो।

[दूसरी ओर से एक युवती दासी के कन्धे का सहारा लिये कुछ-कुछ मदिरा के नशे में रामगुप्त का प्रवेश / मुस्कराता हुआ बौने का खेल देखने लगता है / ध्रुवस्वामिनी उठकर खड़ी हो जाती है और शिखरस्वामी रामगुप्त को संकेत करता है]

रामगुप्त––(कुछ भर्राये हुए कंठ से) महादेवी की जय हो!

ध्रुवस्वामिनी––स्वागत महाराज!

[रामगुप्त एक मंच पर बैठ जाता है और शिखरस्वामी ध्रुवस्वामिनी के इस उदासीन शिष्टाचार से चकित होकर सिर खुजलाने लगता है]

कुबड़ा––दोहाई राजाधिराज की। मुझ हिमालय का कूबड़ दुखने लगा। न तो यह नल-कूबर की बहू मेरे कूबड़ से उठती है और न तो यह बौना मुझे विजय ही कर लेता है।

रामगुप्त––(हँसते हुए) वाह रे वामन वीर! यहाँ दिग्विजय का नाटक खेला जा रहा है क्या?

बौना––(अकड़ कर) वामन के बलि-विजय की गाथा और तीन पगों की महिमा सब लोग जानते हैं। मैं भी तीन लात में इसका कूबड़ सीधा कर सकता हूँ।

कुबड़ा––लगा दे भाई बौने! फिर यह अचल हेमकूट बनना तो छूट जाय!

हिजड़ा––देखो जी, मै नल-कबर की वधू इस पर बैठी हूँ।

बौना––झूठ! युद्ध के डर से पुरुष होकर भी यह स्त्री बन गया है।

हिजड़ा––मैं तो पहले ही कह चुकी मैं युद्ध करना नहीं जानती।

बौना––तुम नल-कूबर की स्त्री हो न, तो अपनी विजय का उपहार समझ कर मै तुम्हारा हरण कर लूँगा। (और लोगों की ओर देखकर उसका हाथ पकड़ कर खींचता हुआ) ठीक होगा न? कदाचित् यह धर्म के विरुद्ध न होगा!

[रामगुप्त ठठाकर हँसने लगता है]

ध्रुवस्वामिनी––(क्रोध से कड़ककर) निकलो! अभी निकलो, यहाँ ऐसी निर्लज्जता का नाटक मैं नहीं देखना चाहती। (शिखरस्वामी की ओर भी सक्रोध देखती है / शिखर के संकेत करने पर वे सब भाग जाते हैं)

रामगुप्त––अरे, ओ दिग्विजयी! सुन तो (उठ कर ताली पीटता हुआ हँसने लगता है। ध्रुवस्वामिनी क्षोभ और घृणा से मुँह फिरालेती है / शिखरस्वामी के संकेत से दासी मदिरा का पात्र ले आती है, उसे देख कर प्रसन्नता से आँखें फाड़ कर शिखर की ओर अपना हाथ बढ़ा देता है) [ ७१३ ]अमात्य, आज ही महादेवी के पास मैं आया और आप भी पहुँच गये, यह एक विलक्षण घटना है। है न? (पात्र लेकर पीता है)

शिखरस्वामी––देव, मैं इस समय एक आवश्यक कार्य से आया हूँ।

रामगुप्त––ओह, मैं तो भूल ही गया था! वह बर्बर शकराज क्या चाहता है? मैं आक्रमण न करूँ, इतना ही तो? जाने दो, युद्ध कोई अच्छी बात तो नही!

शिखरस्वामी––वह और भी कुछ चाहता है।

रामगुप्त––क्या कुछ सहायता भी माँग रहा है?

शिखरस्वामी––(सिर झुका कर गम्भीरता से) नहीं देव, बह बहुत ही असंगत और अशिष्ट याचना कर रहा है।

रामगुप्त––क्या? कुछ कहो भी।

शिखरस्वामी––क्षमा हो महाराज! दूत तो अबध्य होता ही है; इसलिए उसका सन्देश सुनना ही पड़ा। वह कहता था कि शकराज से महादेवी ध्रुवस्वामिनी का (रुक कर ध्रुवस्वामिनी की ओर देखने लगता है––ध्रुवस्वामिनी सिर हिला कर कहने की आज्ञा देती है) विवाह-सम्बन्ध स्थिर हो चुका था, बीच में ही आर्य समुद्रगुप्त की विजय यात्रा में महादेवी के पिताजी ने उपहार में उन्हें गुप्तकुल में भेज दिया, इसलिए महादेवी को वह....।

रामगुप्त––ऐं, क्या कहते हो अमात्य? क्या वह महादेवी को माँगता है!

शिखरस्वामी––हाँ देव! साथ ही वह अपने सामन्तों के लिए भी मगध के सामन्तों की स्त्रियों को माँगता है।

रामगुप्त––(श्वांस लेकर) ठीक ही है, जब उसके यहाँ सामन्त हैं, तब उन लोगों के लिए भी स्त्रियाँ चाहिए। हाँ, क्या यह सच है कि महादेवी के पिता ने पहले शकराज से इनका सम्बन्ध स्थिर कर लिया था

शिखरस्वामी––यह तो मुझे नहीं मालूम?

[ध्रुवस्वामिनी रोष से फूलती हुई टहलने लगती है]

रामगुप्त––महादेवी, अमात्य क्या पूछ रहे हैं?

ध्रुवस्वामिनी––इस प्रथम सम्भाषण के लिए मैं कृतज्ञ हुई महाराज! किन्तु मैं भी यह जानना चाहती हूँ कि गुप्त-साम्राज्य क्या स्त्री-सम्प्रदान से ही बढ़ा है?

रामगुप्त––(झेंप कर हँसता हुआ) हे-हे-हे, बताइए अमात्य जी!

शिखरस्वामी––मैं क्या कहूँ? शत्रु-पक्ष का यही सन्धि-सन्देश है। यदि स्वीकार न हो तो युद्ध कीजिए। शिविर दोनों ओर से घिर गया है। उसकी बातें मानिए, या मर कर भी अपनी कुल-मर्यादा की रक्षा कीजिए। दूसरा कोई उपाय नहीं। [ ७१४ ]रामगुप्त––(चौंक कर) क्या प्राण देने के अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं? ऊँ-हूँ, तब तो महादेवी से पूछिए।

ध्रुवस्वामिनी––(तीव्र स्वर से) और आप लोग, कुबड़ों, बौनों और नपुंसकों का नृत्य देखेंगे। मैं जानना चाहती हूँ कि किसने सुख-दुख में मेरा साथ न छोड़ने की प्रतिज्ञा अग्नि-वेदी के सामने की है?

रामगुप्त––(चारों ओर देख कर) किसने की है, कोई बोलता क्यों नहीं?

ध्रुवस्वामिनी––तो क्या मैं राजाधिराज रामगुप्त की महादेवी नही हूँ?

रामगुप्त––क्यों नही? परन्तु रामगुप्त ने ऐसी कोई प्रतिज्ञा न की होगी। मैं तो उस दिन द्राक्षासव में डुबकी लगा रहा था। पुरोहितों ने न जाने क्या-क्या पढ़ा दिया होगा। उन सब बातों का बोझ मेरे सिर पर! (सिर हिला कर) कदापि नही!

ध्रुवस्वामिनी––(निस्सहाय होकर दीनता से शिखरस्वामी के प्रति) यह तो हुई राजा की व्यवस्था, अब सुनो मंत्री महोदय क्या कहते है!

शिखरस्वामी––मैं कहूँगा देवि, अवसर देख कर राज्य की रक्षा करने वाली उचित सम्मति दे देना ही तो मेरा कर्तव्य है। राजनीति के सिद्धान्त में राष्ट्र की रक्षा सब उपायों से करने का आदेश है। उसके लिए राजा, रानी, कुमार और अमात्य सब का विसर्जन किया जा सकता है; किन्तु राज-विसर्जन अन्तिम उपाय है।

रामगुप्त––(प्रसन्नता से) वाह! क्या कहा तुमने! तभी तो लोग तुम्हें नीति-शास्त्र का बृहस्पति समझते हैं!

ध्रुवस्वामिनी––अमात्य, तुम बृहस्पति हो चाहे शुक्र, किन्तु धूर्त होने से ही क्या मनुष्य भूल नहीं करता? आर्य समुद्रगुप्त के पुत्र को पहचानने में तुमने भूल तो नहीं की? सिंहासन पर भ्रम से किसी दूसरे को तो नही बिठा दिया!

रामगुप्त––(आश्चर्य से) क्या? क्या?? क्या???

ध्रुवस्वामिनी––कुछ नहीं, मैं केवल यही कहना चाहती हूँ कि पुरुषों ने स्त्रियों को अपनी पशु-सम्पत्ति समझ कर उन पर अत्याचार करने का अभ्यास बना लिया है, वह मेरे साथ नहीं चल सकता। यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते, अपने कुल की मर्यादा नारी का गौरव, नहीं बचा सकते, तो मुझे बेच भी नहीं सकते हो। हाँ, तुम लोगों को आपत्ति से बचाने के लिए मैं स्वयं यहाँ से चली जाऊँगी।

शिखरस्वामी––(मुँह बना कर) उँह, राजनीति में ऐसी बातों को स्थान नहीं। जब तक नियमों के अनुकूल सन्धि का पूर्ण रूप से पालन न किया जाय, तब तक सन्धि का कोई अर्थ ही नहीं।

ध्रुवस्वामिनी––देखती हूँ कि इस राष्ट्र-रक्षा-यज्ञ में रानी की बलि होगी ही। [ ७१५ ]


शिखरस्वामी––दूसरा कोई उपाय नहीं।

ध्रुवस्वामिनी––(क्रोध से पैर पटक कर) उपाय नहीं, तो न हो निर्लज्ज अमात्य! फिर ऐसा प्रस्ताव मैं सुनना नहीं चाहती।

रामगुप्त––(चौंक कर) इस छोटी सी बात के लिए इतना बड़ा उपद्रव! (दासी की ओर देख कर) मेरा तो कण्ठ सूखने लगा।

[वह मदिरा देती है]

ध्रुवस्वामिनी––(दृढ़ता से) अच्छा, तो अब मैं चाहती हूँ कि अमात्य अपने मंत्रणा-गृह में जायें। मैं केवल रानी ही नहीं, किन्तु स्त्री भी हूँ; मुझे अपने को पति कहनेवाले पुरुष से कुछ कहना है, राजा से नहीं।

[शिखरस्वामी का दासियों के साथ प्रस्थान]

रामगुप्त––ठहरो जी, मैं भी चलता हूँ (उठना चाहता है / ध्रुवस्वामिनी उसका हाथ पकड़ कर रोक लेती है) तुम मुझसे क्या कहना चाहती हो?

ध्रुवस्वामिनी––(ठहर कर) अकेले यहाँ भग लगता है क्या? बैठिए, सुनिए। मेरे पिता ने उपहार-स्वरूप कन्या-दान किया था। किन्तु गुप्त-सम्राट् क्या अपनी पत्नी शत्रु को उपहार में देंगे? (घुटने के बल बैठकर) देखिए, मेरी ओर देखिए। मेरा स्त्रीत्व क्या इतने का भी अधिकारी नहीं कि अपने को स्वामी समझने वाला पुरुष उसके लिए प्राणों का पण लगा सके।

रामगुप्त––(उसे देखता हुआ) तुम सुन्दर हो, ओह, कितनी सुन्दर; किन्तु सोने की कटार पर मुग्ध होकर उसे कोई अपने हृदय में डुबा नहीं सकता। तुम्हारी सुन्दरता––तुम्हारा नारीत्व––अमूल्य हो सकता है। फिर भी अपने लिए मै स्वयं कितना आवश्यक हूँ, कदाचित् तुम यह नहीं जानती हो।

ध्रुवस्वामिनी––(उसके पैरों को पकड़ कर) मैं गुप्त-कुल की वधू होकर इस राज-परिवार मे आयी हूँ। इसी विश्वास पर।

रामगुप्त––(उसे रोक कर) वह सब मैं नही सुनना चाहता।

ध्रुवस्वामिनी––मेरी रक्षा करो। मेरे और अपने गौरव की रक्षा करो। राजा, आज मैं शरण की प्रार्थिनी हूँ। मैं स्वीकार करती हूँ, कि आज तक मैं तुम्हारे विलास की सहचरी नहीं हुई; किन्तु वह मेरा अहंकार चूर्ण हो गया है। मैं तुम्हारी होकर रहूँगी। राज्य और सम्पत्ति रहने पर राजा को––पुरुष को बहुत-सी रानियाँ और स्त्रियाँ मिलती हैं; किन्तु व्यक्ति का मान नष्ट होने पर फिर नहीं मिलता।

रामगुप्त––(घबराकर उसका हाथ हटाता हुआ) ओह, तुम्हारा यह घातक स्पर्श बहुत ही उत्तेजनापूर्ण है। मैं, नहीं। तुम, मेरी रानी? नहीं, नहीं। जाओ, तुमको जाना पड़ेगा। तुम उपहार की वस्तु हो। आज मैं तुम्हें किसी दूसरे को देना चाहता हूँ। इसमें तुम्हे क्यों आपत्ति हो? [ ७१६ ]

ध्रुवस्वामिनी––(खड़ी होकर रोष से) निर्लज्ज! मद्यप!! क्लीव!!! ओह, तो मेरा कोई रक्षक नहीं? (ठहर कर) नहीं, मैं अपनी रक्षा स्वयं करूँगी! मैं उपहार में देने की वस्तु, शीतल मणि नहीं हूँ। मुझमे रक्त की तरल लालिमा है। मेरा हृदय उष्ण है और उसमें आत्म-सम्मान की ज्योति है। उसकी रक्षा मैं ही करूँगी। (रशना से कृपाणी निकाल लेती है)

रामगुप्त––(भयभीत होकर पीछे हटता हुआ) तो क्या तुम मेरी हत्या करोगी?

ध्रुवस्वामिनी––तुम्हारी हत्या? नहीं, तुम जिओ। भेड़ की तरह तुम्हारा क्षुद्र जीवन! उसे न लूंगी! मैं अपना ही जीवन समाप्त करूँगी।

रामगुप्त–– किन्तु तुम्हारे मर जाने पर उस बर्बर शकराज के पास किसको भेजा जायगा? नहीं, नहीं, ऐसा न करो। हत्या! हत्या!! दौड़ो! दौड़ो!! (भागता हुआ निकल जाता है। दूसरी ओर से वेग सहित चन्द्रगुप्त का प्रवेश)

चन्द्रगुप्त–– हत्या! कैसी हत्या!! (ध्रुवस्वामिनी को देख कर) यह क्या? महादेवी ठहरिए!

ध्रुवस्वामिनी––कुमार, इसी समय तुम्हें भी आना था! (सकरुण देखती हुई) में प्रार्थना करती हूँ कि तुम यहाँ से चले जाओ! मुझे अपने अपमान में निर्वसन-नग्न देखने का किसी पुरुष को अधिकार नहीं। मुझे मृत्यु की चादर से अपने को ढँक लेने दो।

चन्द्रगुप्त––किन्तु क्या कारण सुनने का मैं अधिकारी नहीं हूँ?

ध्रुवस्वामिनी––सुनोगे? (ठहर कर सोचती हुई) नहीं, अभी आत्महत्या नहीं करूँगी। जब तुम आ गये हो थोड़ा ठहरूंगी। यह तीखी छुरी इस अतृप्त हृदय में, विकासोन्मुख कुसुम में विषैले कीट के डंक की तरह चुभा दूँ या नहीं, इस पर विचार करूँगी। यदि नहीं तो मेरी दुर्दशा का पुरस्कार क्या कुछ और है? हाँ, जीवन के लिए कृतज्ञ, उपकृत और आभारी होकर किसी के अभिमानपूर्ण आत्म-विज्ञापन का भार होती रहूँ––यही क्या विधाता का निष्ठुर विधान है? छुटकारा नहीं? जीवन नियति के कठोर आदेश पर चलेगा ही? तो क्या यह मेरा जीवन भी अपना नहीं है?

चन्द्रगुप्त––देवि, जीवन विश्व की सम्पत्ति है। प्रमाद से, क्षणिक आवेश से, या दुःख की कठिनाइयों में उसे नष्ट करना ठीक तो नहीं। गुप्त-कुल-लक्ष्मी आज यह छिन्नमस्ता का अवतार किसलिए धारण करना चाहती हैं? सुनूँ भी?

ध्रुवस्वामिनी––नही, मैं न मरूँगी! क्योंकि तुम आ गये हो। मेरी शिविका के माथ चामर-सज्जित अश्व पर चढ़ कर तुम्हीं उस दिन आये थे? तुम्हारा विश्वासपूर्ण मुखमण्डल मेरे साथ आने में क्यों इतना प्रसन्न था? [ ७१७ ] चन्द्रगुप्त—मैं गुप्त-कुल-वधू को आदरसहित ले आने के लिए गया था। फिर प्रसन्न क्यों न होता?

ध्रुवस्वामिनी—तो फिर आज मुझे शक-शिविर मे पहुँचाने के लिए उसी प्रकार तुमको मेरे साथ चलना होगा। (आँखों से आँसू पोंछती है)

चन्द्रगुप्त—(आश्चर्य से) यह कैसा परिहास!

ध्रुवस्वामिनी—कुमार! यह परिहास नहीं, राजा की आज्ञा है। शकराज को मेरी अत्यन्त आवश्यकता है। यह अवरोध, बिना मेरा उपहार दिये नहीं हट सकता।

चन्द्रगुप्त—(आवेश से) यह नहीं हो सकता। महादेवि। जिस मर्यादा के लिए––जिस महत्त्व को स्थिर रखने के लिए, मैंने राजदण्ड ग्रहण न करके अपना मिला हुआ अधिकार छोड़ दिया, उसका यह अपमान! मेरे जीवित रहते आर्य समुद्रगुप्त के स्वर्गीय गर्व को इस तरह पद-दलित होना न पड़ेगा! (ठहर कर) और भी एक बात है। मेरे हृदय के अन्धकार में प्रथम किरण-सी आकर जिसने अज्ञातभाव से अपना मधुर आलोक ढाल दिया था, उसको भी मैंने केवल इसीलिए भूलने का प्रयत्न किया कि - (सहसा चुप हो जाता है)

ध्रुवस्वामिनी—(आँख बन्द किये हुए कुतूहल-भरी प्रसन्नता से) हाँ-हाँ, कहो-कहो।

[शिखरस्वामी के साथ रामगुप्त का प्रवेश]

रामगुप्त—देखो तो कुमार! यह भी कोई बात है? आत्महत्या कितना बड़ा अपराध है!

चन्द्रगुप्त—और आप से तो वह भी नहीं करते बनता।

रामगुप्त—(शिखरस्वामी से) देखो, कुमार के मन में छिपा हुआ कलुष कितना....कितना....भयानक है?

शिखरस्वामी—कुमार, विनय गुप्त-कुल का सर्वोत्तम गृह-विधान है, उसे न भूलना चाहिए!

चन्द्रगुप्त—(व्यंग्य से हँसकर) अमात्य, तभी तो तुमने व्यवस्था दी है, कि महादेवी को देकर भी सन्धि की जाय! क्यों, यही तो विनय की पराकाष्ठा है! ऐसा विनय प्रवंचकों का आवरण है, जिसमें शील न हो। और शील परस्पर सम्मान की घोषणा करता है। कापुरुष! आर्य समुद्रगुप्त का सम्मान....

शिखरस्वामी—(बीच में बात काट कर) उसके लिए मुझे प्राणदण्ड दिया जाय! मैं उसे अविचल भाव से ग्रहण करूँगा परन्तु राजा और राष्ट्र की रक्षा होनी चाहिए।

मन्दाकिनी—(प्रवेश करके) राजा अपने राष्ट्र की रक्षा करने में असमर्थ है, तब भी उस राजा की रक्षा होनी ही चाहिए। अमात्य, यह कैसी विवशता है! तुम [ ७१८ ]मृत्युदण्ड के लिए उत्सुक! महादेवी आत्महत्या करने के लिए प्रस्तुत! फिर यह हिचक क्यों? एक बार अन्तिम बल से परीक्षा कर देखो। बचोगे तो राष्ट्र और सम्मान भी बचेगा, नही तो सर्वनाश!

चन्द्रगुप्त––आहा, मन्दा! भला तू कहाँ से यह उत्साहभरी बात कहने के लिए आ गयी? ठीक तो है अमात्य! सुनो, यह स्त्री क्या कह रही है?

रामगुप्त––(अपने हाथों को मसलते हुए) दुरभिसन्धि, छल, मेरे प्राण लेने का कौशल!

चन्द्रगुप्त––तब आओ, हम स्त्री बन जायें और बैठ कर रोएं।

हिजड़ा––(प्रवेश करके) कुमार, स्त्री बनना सहज नही है। कुछ दिनों तक मुझसे सीखना होगा। (सबका मुँह देखता है और शिखरस्वामी के मुँह पर हाथ फेरता है) उहूँ, तुम नही बन सकते। तुम्हारे ऊपर बड़ा कठोर आवरण है। (कुमार के समीप जाकर) कुमार! मैं शपथ खाकर कह सकती हूँ कि यदि मैं अपने हाथों से सजा दूँ तो आपको देख कर महादेवी का भ्रम हो जाय।

[चन्द्रगुप्त उसका कान पकड़ कर बाहर कर देता है]

ध्रुवस्वामिनी––उसे छोड़ दो कुमार। यहाँ पर एक वही नपुंसक तो नहीं है। बहुत-से लोगों में से किसको-किसको निकालोगे?

[चन्द्रगुप्त उसे छोड़ कर चिन्तित-सा टहलने लगता है और शिखरस्वामी रामगुप्त के कानों में कुछ कहता है]

चन्द्रगुप्त––(सहसा खड़े होकर) अमात्य, तो तुम्हारी ही बात रही। हाँ, उसमें तुम्हारे सहयोगी हिजड़े की भी सम्मति मुझे अच्छी लगी। मैं ध्रुवस्वामिनी बन कर अन्य सामन्त कुमारों के साथ शकराज के पास जाऊँगा। यदि मैं सफल हुआ तब तो कोई बात ही नहीं, अन्यथा मेरी मृत्यु के बाद तुम लोग जैसा उचित समझना, वैसा करना।

ध्रुवस्वामिनी––(चन्द्रगुप्त को अपनी भुजाओं मे पकड़ कर) नहीं, मैं तुमको न जाने दूँगी। मेरे क्षुद्र, दुर्बल नारी-जीवन का सम्मान बचाने के लिए इतने बड़े बलिदान की आवश्यकता नहीं।

रामगुप्त––(आश्चर्य और क्रोध से) छोड़ो, छोड़ो, यह कैसा अनर्थ! सब के सामने यह कैसी निर्लज्जता!

ध्रुवस्वामिनी––(चन्द्रगुप्त को छोड़ती हुई जैसे चैतन्य होकर) यह पाप है? जो मेरे लिए अपनी बलि दे सकता हो, जो मेरे स्नेह (ठहर कर) अथवा इससे क्या? शकराज क्या मुझे देवी बना कर भक्ति-भाव से मेरी पूजा करेगा! वाह रे लज्जाशील पुरुष! [ ७१९ ]

[शिखरस्वामी फिर रामगुप्त के कान में कुछ कहता है/रामगुप्त स्वीकारसूचक सिर हिलाता है]

शिखरस्वामी—राजाधिराज, आज्ञा दीजिए, यही एक उपाय है, जिसे कुमार बता रहे हैं। किन्तु राजनीति की दृष्टि से महादेवी का भी वहाँ जाना आवश्यक है।

चन्द्रगुप्त—(क्रोध से) क्यों आवश्यक है! यदि उन्हे जाना ही पड़ा, तो फिर मेरे जाने से क्या लाभ! तब मैं न जाऊँगा।

रामगुप्त—नहीं, यह मेरी आज्ञा है। सामन्त-कुमारों के साथ जाने के लिए प्रस्तुत हो जाओ।

ध्रुवस्वामिनी—तो कुमार हम लोगों का चलना निश्चित ही है। अब इसमें विलम्ब की आवश्यकता नहीं।

[चन्द्रगुप्त का प्रस्थान/ध्रुवस्वामिनी मंच पर बैठ कर रोने लगती है]

रामगुप्त—अब यह कैसा अभिनय! मुझे तो पहले से ही शंका थी, और आज तो तुमने मेरी आँखें भी खोल दी।

ध्रुवस्वामिनी—अनार्य! निष्ठुर! मुझे कलंक-कालिमा के कारागार में बन्द कर, मर्म-वाक्य के धुएँ से दम घोंटकर मार डालने की आशा न करो। आज मेरी असहायता मुझे अमृत पिलाकर मेरा निर्लज्ज जीवन बढ़ाने के लिए तत्पर है। (उठ कर, हाथ से निकल जाने का संकेत करती हुई) जाओ, मैं एकान्त चाहती हूँ।

[शिखरस्वामी के साथ रामगुप्त का प्रस्थान]

ध्रुवस्वामिनी—कितना अनुभूतिपूर्ण था वह एक क्षण का आलिंगन! कितने सन्तोष से भरा था! नियति ने अज्ञान भाव से मानो लू से तपी हुई वसुधा को क्षितिज के निर्जन में सायंकालीन शीतल आकाश से मिला दिया हो। (ठहर कर) जिस वायुविहीन प्रदेश में उखड़ी हुई साँसों पर बन्धन हो—अर्गला हो, वहीं रहते-रहते यह जीवन असह्य हो गया था। तो भी मरूँगी नहीं। संसार के कुछ दिन विधाता के विधान में अपने लिए सुरक्षित करा लूँगी। कुमार! तुमने वही किया, जिसे मैं बचाती रही। तुम्हारे उपकार और स्नेह की वर्षा में मैं भीगी जा रही हूँ। ओह, (हृदय पर ऊँगली रख कर) इस वक्षस्थल में दो हृदय हैं क्या? जब अन्तरंग 'हाँ' करना चाहता है, तब ऊपरी मन 'ना' क्या कहला देता है?

चंद्रगुप्त(प्रवेश करके) महादेवि, हम लोग प्रस्तुत हैं किन्तु ध्रुवस्वामिनी के साथ शक-शिविर में जाने के लिए हम लोग सहमत नहीं।

ध्रुवस्वामिनी(हँस कर) राजा की आज्ञा मान लेना ही पर्याप्त नहीं। रानी की भी एक बात न मानोगे? मैंने तो पहले ही कुमार से प्रार्थना की थी कि मुझे जैसे ले आये हो, उसी तरह पहुँचा भी दो। [ ७२० ]

चन्द्रगुप्त––नहीं,––मैं अकेला ही जाऊँगा।

ध्रुवस्वामिनी––कुमार! यह मृत्यु और निर्वासन का सुख, तुम अकेले ही लोगे, ऐसा नहीं हो सकता। राजा की इच्छा क्या है, यह जानते हो? मुझसे और तुमसे एक साथ ही छुटकारा। तो फिर वही क्यों न हो? हम दोनों ही चलेंगे। मृत्यु के गह्वर मे प्रवेश करने के समय मैं भी तुम्हारी ज्योति बनकर बुझ जाने की कामना रखती हूँ। और भी एक विनोद, प्रलय का परिहास, देख सकूँगी। मेरी सहचरी, तुम्हारा वह ध्रुवस्वामिनी का वेश, ध्रुवस्वामिनी ही न देखें तो किस काम का?

[दोनों हाथों से चन्द्रगुप्त का चिबुक पकड़ कर सकरुण देखती है]

चन्द्रगुप्त––(अधखुली आँखों से देखता हुआ) तो फिर चलो।

[सामन्त-कुमारों के आगे-आगे मन्दाकिनी का गम्भीर स्वर से गाते हुए प्रवेश]

पैरों के नीचे जलधर हों, बिजली से उनका खेल चले,
संकीर्ण कगारों के नीचे, शत-शत झरने बेमेल चलें,
सन्नाटे में हो विकल पवन, पादप निज पद हों चूम रहे,
तब भी गिरि पथ का अथक पथिक, ऊपर ऊँचे सब झेल चले,
पृथ्वी की आँखों में बन कर छाया का पुतला बढ़ता हो,
सूने तम में हो ज्योति बना, अपनी प्रतिमा को गढ़ता हो,
पीड़ा को धूल उड़ाता-सा, बाधाओं को ठुकराता-सा,
कष्टों पर कुछ मुसक्याता-सा, ऊपर ऊँचे सब झेल चलें,
खिलते हों क्षत के फूल जहाँ, बन व्यथा तमिस्रा के तारे,
पद-पद पर ताण्डव नर्तन हो, स्वर सप्तक होवें लय सारे,
भैरव रव से हो व्याप्त दिशा, हो काँप रही भय-चकित निशा,
हो स्वेद धार बहती कपिशा, ऊपर ऊँचे सब झेल चलें,
विचलित हो अचल न मौन रहे निष्ठुर शृंगार उतरता हो,
क्रंदन कंपन न पुकार बने, निज साहस पर निर्भरता हो,
अपनी ज्वाला को आप पिये, नव नील कंठ की छाप लिये,
विश्राम शान्ति को शाप दिए, ऊपर ऊँचे सब झेल चलें,

[चन्द्रगुप्त और ध्रुवस्वामिमी के साथ सब का धीरे-धीरे, प्रस्थान/
अकेली मन्दाकिनी क्रमशः मन्द होते आलोक में खड़ी रह जाती है]

प टा क्षे प