पृष्ठ:अंधकारयुगीन भारत.djvu/४४५

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नचना (४०३) चारों ओर कतार से रखी हुई थीं। यह भरहुत की वास्तु-कला और उस हिंदू आकारप्रद कला के बीच की श्रृंखला है, जिसका बाद में फिर से उद्धार किया गया था; और भरहुत के मंदिर की जो दुर्दशा हुई है, उससे भी कहीं बढ़कर इसकी दुर्दशा हुई है । नचना के मंदिर की इससे भी और अधिक दुर्दशा हुई है। इधर कुछ ही वर्षों के अंदर प्रसिद्ध पार्वती-मंदिर की बाहरी दीवारें पूरी तरह से ढह गई हैं। इसी पार्वती-मंदिर के कुछ पत्थरों आदि से एक स्थानीय ब्राह्मण ने शिव-मंदिर के शिखर के एक अंश की मरम्मत करा दी है; और उस ब्राह्मण के संबंध में यह कहा जाता है कि उसे नचना में घड़ों से भरी हुई सोने की मोहरें मिली थीं। पार्वती मंदिर की दीवारें चट्टानों और खोंहों की नकल पर बनाई गई थीं; परंतु अब वे पूरी तरह से नष्ट हो गई हैं और उनमें की पशुओं की वे मूर्तियाँ, जो हिंदू आकार-निर्माण कला के सबसे अधिक सुंदर नमूने हैं, या तो जमीन पर इधर-उधर १. जब लाल साहब का ध्यान मंदिर की वर्तमान अवस्था पर दिलाया गया, तब उन्होंने कृपा करके यह वचन दिया है कि इस समय जो कुछ बचा हुश्रा है, उसे रक्षित रखने का वे उपाय करेंगे । २. देखो माडर्न रिव्यू , कलकत्ता, अप्रैल १९३३, जिसमें इसका चित्र दिया गया है। १. देखो प्लेट ९, शिखर-मंदिर के सामने का जो कमरा है, वह बहुत हाल का बना है। फोटो लिए हुए पार्श्व में दिखाई देनेवाला शिखर वही है जो मंदिर के साथ बना था, उसका केवल बिल्कुल ऊपरी भाग हाल का बना हुआ है।