पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/१४

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अद्भुत आलाप


बीस आदमी कुदारें और फावड़े लिए हुए यह काम कर रहे थे। कुछ देर में कोई ८ फ़ीट गहरा गढ़ा खुद गया।

"तब धार्मिक गीत-वाद्य आरंभ हुआ। फिर वेदी की प्रदक्षिणा हुई।यह हो चुकने पर उन तीन वयोवृद्ध योगियों ने परमहंसजी के शरीर को लकड़ी के एक बॉक्स में रखकर गर्त के भीतर उतार दिया। ऊपर से मिट्टी डाल दी गई, और स्तूप-सा बना दिया गया। स्तूप के ऊपर समाधिस्थ योगिराज का त्रिशूल गाड़ दिया गया।

"यहाँ पर समाधि-विधि समाप्त हुई। सब पुजारी और पंडित अपने-अपने घर गए। मैं उठकर समाधि-स्तूप के पास गया। उसे मैंने खूब ध्यान से देखा। आठ दिन तक मैं रोज़ वहाँ जाता रहा, और स्तूप को खूब सावधानी से देखता रहा। मुझे विश्वास है कि इन आठ दिनों में किसी ने उस पर हाथ तक नहीं लगाया। मेरे पास ऐसे अखंडनीय प्रमाण हैं कि वह स्तूप जैसा पहले दिन था, वैसा ही अंत तक बना रहा। किसी से छुए जाने के कोई चिह्न उस पर मैंने नहीं पाए ।

"आठवें दिन योगीश्वर का पुनरुत्थान हुआ--उनकी समाधि छूटी। फिर पूर्ववत् दर्शकों और पुजारियों की भीड़ हुई। फ़िर पूर्ववत् प्रदक्षिणा और गाना-बजाना हुआ। उन्हीं योगियों ने स्तूप को खोदकर मिट्टी हटाई, और बॉक्स को बाहर निकाला। वह लकड़ी के एक तख्त पर रक्खा गया। बॉक्स के ऊपर का तख्ता बिरंजियों से खूब बंद कर दिया गया था। वह वैसा ही