पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/२४

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अद्भुत आलाप

"मैंने उस साधु से कहा--क्या मैं तुम्हारे पास तक आ सकता हूँ? अब तक मैं परदे से कोई १५ फ़ीट और उस लड़के से कोई २० फ़ीट पर बैठा था। प्रयोक्ता ने कहा--जितना नजदीक आप चाहें, चले आवें, पर लड़के के बदन पर हाथ न लगाइएगा। कई और तमाशबीनों के साथ मैं आगे बढ़ा, और लड़के से छ इंच के फ़ासले तक चला गया। मैं उसके आसन के नीचे गया, पीछे गया, इधर गया, उधर गया--किसी जगह की जाँच मैंने बाकी न रक्खी। यहाँ तक कि मैंने अपनी छड़ी को सब तरफ़ फेरकर देखा कि कहीं कोई तार या और कोई आधार तो नहीं है, जिसके बल से यह लड़का आकाश में ठहरा हुआ है। पर मुझे कोई चीज़ न मिली। लड़का जहाँ-का-तहाँ मेरे सामने अधर में था। उसका चेहरा खुला था। उसकी छाती भी देख पड़ती थी। यहाँ तक कि साँस लेते समय मैं उसकी छाती पर श्वासोच्छवास की चाल भी देखता था।

"दो मिनट तक हम लोग वहाँ खड़े जाँच करते रहे कि कोई चालबाज़ी की बात हमको मिले, पर हमारा प्रयत्न बेकार हुआ। लड़का अपने स्थान पर, आकाश में, अचल रहा। तब हम लोग अपनी जगह पर लौट आए, और बैठ गए। पर उस साधु ने हमें अपनी जगह पर जाने के लिये नहीं कहा, और न उसने यही कहा कि हम लड़के के पास से हट जायँ, जिसमें वह तमाशे का अंतिम दृश्य भी दिखला सके। जब हम लोग अपनी जगह पर बैठ गए, तब तमाशे का अत्यंत ही अद्भुत और