पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/४४

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अद्भुत आलाप
४--दिव्य दृष्टि

लदन से एक मासिक पुस्तक अँगरेज़ी में निकलती है। उसमें अनेक अद्भुत-अद्भुत बातें रहती हैं। विशेष कर के अध्यात्म-विद्या से संबंध रखनेवाली बातों की चर्चा उसमें रहती है। उसके एक अंक में दिव्य दृष्टि का एक विचित्र उदाहरण हमने पढ़ा है। उसे थोड़े में हम लिखते हैं---

दिव्य दृष्टि से हमारा मतलब उस दृष्टि से है, जिसमें किसी चीज़ के अवरोध से बाधा न पहुँचे। पदार्थों का सन्निकर्ष चक्षुरिद्रिय से होने ही से उनका चाक्षुप ज्ञान होता है। यह सर्वसम्मत मत है। पर इसमें अब परिवर्तन की जरूरत जान पड़ती है, क्योंकि किसी-किसी विशेष अवस्था में सन्निकर्ष, संघ या योग न होने से भी पदार्थों का ज्ञान हो सकता है। एलिस नाम के एक आदमी के घर पर एक बार तीन आदमी बैठे थे। उनके नाम हैं-- फ़ेल्टन, मोरले ओर गेट्स। इन लोगों को मेस्मेरिज्म अर्थात् अध्यात्म-विद्या से बहुत प्रेम है। इन्होंने दृष्टि-विषयक एक विचित्र तजुर्बा करने की मन में ठानी। मोरले को एक आराम-कुर्सी पर बिठलाकर फ़ेल्टन ने उस पर पाश देना शुरू किया। थोड़ी देर में मोरले सो गया, अर्थात् उसे आध्यात्मिक निद्रा आ गई। इसके बाद वह सचेत किया गया, और उसके सिर के पीछे एक किताब खोली गई। किताब में फ्रेडरिक दि ग्रेट-नामक बादशाह की ज़िंदगी का हाल था। जो पृष्ट खोला गया, उसमें एक लड़ाई का चित्र था। कितने