पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/४९

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परिचित्त-विज्ञान-विद्या

मुझे इस बात का पूरा विश्वास था कि यदि दो आदमियों के चित्त एक हों, तो वे परस्पर एक दूसरे के मन की बात, हज़ारों कोस दूर रहने पर भी, जान सकते हैं। पर मैं अब तक यही समझता था कि मन को अद्ध-सज्ञान दशा में ही यह बात हो सकती है, अन्यथा नहीं। मैं अब तक न जानता था कि साधारण तौर पर, चित्त की संपूर्ण सज्ञान अवस्था में भी, यह बात संभव है। पर डेनमार्क के रहनेवाले ज़ानसिग साहब और उनकी स्त्री ने मेरा यह संदेह दूर कर दिया। मुझे अब विश्वास हो गया है कि दो चित्तों का ऐक्य होने से कोई भी आदमी, सज्ञान अवस्था में भी, परस्पर एक दूसरे के अंत:-करण की बात जान सकता है।

ज़ानसिग और उनकी स्त्री की उम्र ४० पर्प की होगी। वे अच्छी तरह अँगरेज़ी बोल सकते हैं। वे एक ही गाँव के रहनेवाले हैं। लड़कपन में एक ही साथ उन्होंने खेला-कूदा और पढ़ा-लिखा है। नौकरी भी दोनो ने, कुछ समय तक, अमेरिका में, एक ही आदमी के यहाँ की है। दोनो का मन मिल जाने से उन्होंने शादी कर ली। इस बात को हुए १९ वर्ष हुए। शादी होने के बाद, पति-पत्नी का मन यहाँ तक एक हो गया कि पत्नी अपने पति के मन की बातें, बिना बतलाए ही, जानने लगी। जब ज़ानसिग को दृढ़ विश्वास हो गया कि उनकी स्त्री उनके मन की बातें जान लेती है, तब उन्होंने नौकरी छोड़ दी, और अपनी स्त्री के परिचित्त-ज्ञान की बदौलत रुपया कमाने की ठानी।