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पृष्ठ:अभिधर्म कोश.pdf/५४

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प्रथम कोशस्थानः घातुनिर्देश किन्तु अन्य ९ आयतन भी आयतन और रूप हैं। फिर रूप-आयतन के नाम के लिए चक्षुरिन्द्रिय का विषय ही क्यों चुना गया? उसकी प्रधानता के कारण । यह रूप है (१) वाधनलक्षणरूपण के कारण : क्योंकि यह सप्रतिव है। इसमें पाण्यादि-संस्पर्श से 'रूपण' होता है; (२) देशनिदर्शनरूपण के कारण (१. १३, पृ. २५) : इसके सम्बन्ध में यह सूचित कर सकते हैं कि यह यहाँ है, वहाँ है; (३) लोक-प्रतीति से : जिसे लोक में 'रूप' कहते हैं वह वर्ण-संस्थान है। [४६] धर्मायतन को (१. १५ वी-डो) अन्य आयतनों से विशेषित करने के लिए धर्मायतन कहा है। पूर्वोक्त निरूपण के अनुसार इसका भी निर्देश है। इसमें वेदना, संज्ञा आदि बहु धर्म संगृहीत हैं । इसमें सर्वोत्तम धर्म निर्वाण संगृहीत है। इसीलिए प्राधान्य के कारण इसे धर्मायतन यह सामान्य नाम दिया गया है। एक दूसरे मत के अनुसार' रूप रूपायतन कहलाता है क्योंकि इसमें (नीलादि) २० प्रकार संगृहीत हैं. क्योंकि यह मांमत्रा, दिव्यचक्षु, प्रज्ञाचक्षु (इतिवृत्तक, ६१) इन तीन चक्षुओं का गोचर है। धर्मस्कन्वसहस्राणि यान्यशीतिं जगौ मुनिः । तानि वाङ्नाम वेत्येषां रूपसंस्कारसंग्रहः ॥२५॥ सूत्रों में अन्य स्कन्ध, अन्य आन्तन, अन्य धातु वर्णित हैं। क्या यह पूर्वोक्त स्कन्ध, आयतन, धातुओं में संगृहीत हैं ? २५. जिन ८०,००० धर्मस्कन्धों को मुनि ने कहा है उनका संग्रह रूपस्कन्ध में होता है यदि वह वाक्-स्वभाव के माने जाते हैं और संस्कारस्कन्ध में होता है यदि वह नाम-स्वभाव के माने जाते हैं। यह धर्मत्रात का मत है (नन्जियो १२८७), १. १७. २ धर्मस्कन्धसहस्राणि अशीतिर्यान्यवदन्मुनिः। तानि वाग् नाम वा तेषां रूपसंस्कारसंग्रहः ।। वसुमित्र, बहुश्रुतीय, वाद १--देशनास्वभाव, डेमोविल, मिलिन्द ५२-५७, ६२, सिद्धि, ७९५--दशभूमि, ७४ : चतुरशीतिक्लेशचरितनानात्वसहस्र. ८४००० में से २००० शारि- पुत्र के हैं। (१) सौत्रान्तिकों के अनुसार बुद्ध-वचन वाग्विज्ञप्ति (४.३ डी) है; निकायान्तरीय के अनुसार यह नामन है । माभिधार्मिकों को इष्ट है कि बुद्ध-वचन उभ्यस्वभाव है। यहां व्याख्या ज्ञानप्रस्थान, १२, १५ (बुद्धिस्ट कास्मालॉजी, पृ. ७ नोट) उद्धृत करती है। व्याख्या ५२.१५] (२) एक दूसरे निकाय में सूत्रपाठ है कि ८४००० धर्मस्कन्ध हैं। सूत्र में मानन्द कहते हैं कि "मैंने भगवत् से ८०,००० से अधिक धर्मस्कन्ध उद्गृहोत किए हैं : सातिरेकाणि मेऽशीतिधर्मस्कन्धसहस्राणि भगवतोऽन्तिकात् सम्मुखमुद्गृहीतानि । [व्याख्या ५२.२४] (बफ़ भूमिका पृ.३४ देखिए: सुमंगलविलासिनी, १.पृ.२४येरगाया १०२४, नागार्जुन के अकुतोभय में प्रज्ञापारनिता, १.८, अवदानशतक, २.१५५) ।