सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:अहंकार.pdf/२१७

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१९६
अहङ्कार

खड़ी थी, उस पर पैर रखे, और एक डण्डा नीचे उतरा कि उसका मुख गोरूपी कलश के सम्मुख आ गया। उसे देखकर यह गोमूति विचित्र रूप से मुसकिराई। उसे अब इसमें कोई सन्देह न था कि जिस स्थान को उसने शान्ति-लाभ और सद्कीर्ति के लिए पसन्द किया था, वह उसके सर्वनाश और पतन का सिद्ध हुआ। वह बड़े वेग से उतरकर जमीन पर आ पहुँचा। उसके पैरों को अब खड़े होने का भी अभ्यास न था,वे डगमगाते थे। लेकिन अपने ऊपर इस पैशाचिक स्तम्भ की परछाई पड़ते देख-कर वह ज़बरदस्ती दौड़ा,मानो कोई कैदी भागा जाता हो। संसार निद्रा में मग्न था। वह सबसे छिपा हुआ उस चौक से होकर निकला जिसके चारों ओर शराब की दुकानें,सराएँ,धर्मशालाएँ बनी हुई थी और एक गली में घुस गया, जो लाइ-बिया की पहाड़ियों की ओर जाती थी। विचित्र बात यह थी कि एक कुत्ता भी भूकता हुआ इसका पीछा कर रहा था और जब तक मरुभूमि के किनारे तक उसे दौड़ा न ले गया उसका पीछा न छोड़ा। पापनाशी ऐसे देहातों में पहुँच गया जहाँ सड़कें या पगडंडियाँ न थीं,केवल वन-जन्तुओं के पैरों के निशान थे। इस निर्जन देश में वह एक दिन और एक रात लगातार अकेला भागता चला गया ।

अंत में जब वह भूख,प्यास और थकन से इतना बेदम हो गया कि पाँव लड़खड़ाने लगे,ऐसा जान पड़ने लगा कि अब जीता न बचूँगा तो वह एक नगर में पहुँचा जो दायें बाये इतनी दूर तक फैला हुआ था कि उसकी सीमाएँ नीले क्षितिज में विलीन हो जाती थीं। चारों ओर निस्तब्धता छाई हुई थी,किसी प्राणी का नाम न था। मकानों की कमी न थी पर वह दूर दूर पर बने हुए थे,और उन मिश्री मीनारों की भाँति दीखते थे