सिवाय और कुछ नजर न आता था। भूमि कितने ही स्थलों पर फट गई थी और उसमे से आग की लपट निकल रही थी। जन्तु ने पापनाशी को धीरे से उतार दिया और कहा-देखो!
पापनाशी ने एक खोह के किनारे झुककर नीचे देखा। आग की नदी पृथ्वी के अंतस्थल में, दो काले-काले पर्वतों के बीच से बह रही थी। वहाँ धुंधले प्रकाश मे नरक के दूत पापात्माओं को कष्ट दे रहे थे। इन आत्माओं पर उनके मृत शरीर का होने का आवरण था, यहाँ तक कि वह कुछ वस्त्र भी पहने हुए थे। ऐसे दारुण कष्टों में भी यह आत्माएँ बहुत दुःखी न जान पाती थी।, उनमें से एक जो लम्बी, गौरवर्ण आँखे बन्द किये हुए थी, हाथ में एक तलवार, लिए,जा रही थी। उसके मधुर स्वरों से समस्त मरुभूमि गूंज रही थी। यह देवताओं और शूर-वीरों की विरुवावली गा रही थी। छोटे-छोटे हरे रंग के दैत्य उसके ओंठ और कंठ को लाल लोहे की सलाखों से छेद रहे थे। यह अमर कवि होमर की प्रविछाया थी। वह इतना कष्ट झेलकर भी पीने से बाज न आई थी। उसके समीप ही अनकगोरस जिसके सिर के बाल गिर गये थे धूल में परकाल से शक्ले बना रहा था एक दैत्या उसके कानों में खौलता हुआ तेल डाल रहा था, पर उसकी एकाग्रता को भंग न कर सकता था। इनके अतिरिक्त पापनाशी को और कितनी ही आत्मायें दिखाई दी जो जलती हुई नदी के किनारे बैठी हुई उसी भांति पठन-पाठन,वाद-विवाद उपासनाध्यान में मग्न थी जैसे-यूनान के गुरुकुलों में गुरु-शिष्य किसी वृक्ष के छाया में बैठकर किया करते थे। वृद्ध दिमाक्लीज ही सबसे अलग-था और क्रांतिवादियों की भांति सिर हिला रहा था , एक दैत्य उसकी आँखों के सामने एक मशाल हिला हा था, किन्तु टिमान्तीज आंखे ही न खोलता था।