पृष्ठ:आकाश -दीप -जयशंकर प्रसाद .pdf/११७

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वैरागी

पहाड़ की तहलटी में एक छोटा-सा समतल भूमि खंड था। मौलसिरी, अशोक, कदम और आम के वृक्षों का एक हरा-भरा कुटुम्ब उसे आबाद किये हुए था। दो-चार छोटे-छोटे फूलों के पौदे कोमल मृत्तिका के थालों में लगे थे। सब आद्र और सरस थे। तपी हुई लू और प्रभात का मलय-पवन, एक क्षण के लिये इस निभृत कुंज में विश्राम कर लेते! भूमि लिपी हुई स्वच्छ, एक तिनके का कहीं नाम नहीं, और सुन्दर वेदियों और लता-कुंजों से अलंकृत थी।

यह एक वैरागी की कुटी थी, और तृण-कुटीर---उस पर लतावितान, कुशासन और कम्बल, कमंडल और बल्कल उतने

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