पृष्ठ:आकाश -दीप -जयशंकर प्रसाद .pdf/१२७

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बनजारा
 

"हाँ, लौट जाओ; जब तक ओस की बूँदों से ठंडी धूल तुम्हारे पैरों में लगे उतने ही समय में अपना पथ समाप्त कर लो!"

“मैं लादना छोड़ दूँगा मोनी!"

"ओह! यह क्यों? मैं इस पहाड़ी पर निस्तब्ध प्रभात में घंटियों के मधुर स्वर की आशा में अनमनी बैठी रहती हूँ। वह पहुँचने का, बोझ उतारने के व्याकुल विश्राम का अनुभव करके सुखी रहती हूँ। मैं नहीं चाहती कि किसी को लादने के लिए मैं बोझ इकट्ठा करूँ! नन्दू!"

नन्दु हताश था। वह अपने बैल की खाली पीठ पर हाथ धरे चुपचाप अपने पथ पर चलने लगा।


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