पृष्ठ:आकाश -दीप -जयशंकर प्रसाद .pdf/१४९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
अपराधी
 


से बहती हुई बरसाती नदी की धारा में बुल्ले के समान बह गया। उसका हृदय विषय-शून्य हो गया। एक बार सचेत होकर, उसने देखा और पहचाना---अपना वही---"जीर्ण कौशेय उष्णीश"। कहा---"वन-पालिका!"

"राज"---कामिनी की आँखों में आँसू नहीं थे।

"यह कौन था?"

गम्भीर स्वर में सर नीचा किए वन-पालिका ने कहा---"अपराधी।"


_________

--- १४५ ---