पृष्ठ:आकाश -दीप -जयशंकर प्रसाद .pdf/१७१

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ज्योतिष्मती
 


चारों पहर कभी बिना पलक लगे प्रिय की निश्छल चिन्ता में न बिताये हों उसे ज्योतिष्मती न छूनी चाहिए। इसे जङ्गल के पवित्र प्रेमी ही छूते हैं, ले आते हैं, तभी इसका गुण......

बनलता की इन बातों को बिना सुने हुए यह वलिष्ठ युवक अपनी तलवार की मूँठ दृढ़ता से पकड़कर बनस्पति की ओर अग्रसर हुआ।

बालिका ने छटपटाकर कहने लगी---"हाँ हाँ छूना मत, पिताजी की आँखें, आह!" तब तक साहसिक की लम्बी छाया ने ज्योतिष्मती पर पड़ती हुई चन्द्रिका को ढँक लिया। वह एक दीर्घ निश्वास फेंक कर जैसे सो गई। बिजली के फूल मेध में विलीन हो गये। चन्द्रमा खिसककर पश्चिमी शैल-माला के नीचे जा गिरा।

बनलता---झंझावात से भग्न होते हुए वृक्ष की बनलता के समान वसुधा का आलिङ्गन करने लगी और साहसिक युवक के ऊपर कालिमा की लहर टकराने लगी।


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