पृष्ठ:आकाश -दीप -जयशंकर प्रसाद .pdf/८९

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कला
 


की तरह चिल्लाकर कहा---मैं असफल हूँ। मैं इस भाव को रूप न दे सकूँगा।" वह उठकर चला गया।

कंगाल रसदेव भी पीछे के मंच पर अपने एक साथी के साथ बैठा था। उसने कहा---"रसदेव, यह तो तुम्हारी बनाई हुई 'स्मृति' नाम की कविता गा रही है; तुम्हारी रसमयी भावुकता ही तो इस स्वर्गीय संगीत का केन्द्र है, आत्मा है। जैसे वर्णमाला पहनकर आलोक-शिखा नृत्य कर रही है।

संगीत में उस समय विश्राम था। अभिनेत्री ने वीणा और मृदंग को संकेत से रोक कर मूक अभिनय आरंभ कर दिया था। अपने झलमले अंचल को मायाजाल के समान फैलाकर स्मृति की प्रत्यक्ष अनभूति बन रही थी। कवि की मधुर वाणी उसे सुनाई पड़ी। कवि रसदेव ने अपने साथी से हँसते हुए कहा---"इसकी अंतिम और मुख्य पदावली यह भूल गई, उसका अर्थ है---"मेरी भूल ही तेरा रहस्य है, इसीलिये कितनी ही कल्पनाओं में तुझे खोजता हूँ, देखता हूँ, हे मेरे चिर सुन्दर!"

वह स्मृति में जैसे जग पड़ी। उसने सतृष्ण दृष्टि से उस कहने वाले को खोजा और अपने बधाई के फूल---विजयमाला---उस दूर खड़े कंगाल कवि के चरणों में श्रद्धांजलि के सदृश बिखेरने चाहे।

रसदेव ने गर्वस्फीत सर झुका दिया।

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