पृष्ठ:आग और धुआं.djvu/१६८

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बादशाह देखकर बोले-"खुदा की कसम यह तो दगा है। कादिर!"

"जहाँपनाह अगर खुशी से मेरी अर्जी कुबूल न करेंगे, तो खून-खराबी होगी। कम्पनी के बहादुर के गोरों ने महल घेर लिया है। अर्ज यही है कि सरकार चुपचाप चले चलें।"

बादशाह धम से बैठ गए। मालूम होता है, क्षणभर के लिए उनका नशा उतर गया। उन्होंने कहा-"तब तुम क्या मेरे दुश्मन होकर मुझे कैद करने आए हो?"

"मैं हुजूर का दोस्त, हर तरह हुजूर के आराम और फरहत का ख्याल रखता हूँ और हमेशा रखूँगा।"

बादशाह ने रूपा की ओर देखकर कहा-"रूपा! रूपा! यह क्या माजरा है? तुम भी क्या इस मामले में हो? एक प्याला–मगर नहीं, अब नहीं, अच्छा सब साफ-साफ सच कहो। कर्नल-मेरे दोस्त-नहीं- नहीं, अच्छा कर्नल उटरम। अब खुलासावार बयान करो।"

“सरकार, ज्यादा मैं कुछ नहीं कह सकता। कम्पनी बहादुर का खास परवाना लेकर खुद गवर्नर जनरल के अंडर सैक्रेटरी तशरीफ लाए हैं, वे आलीजाह से कुछ मशवरा किया चाहते हैं।"

"मगर यहाँ।"

“यह नामुमकिन है।"

बादशाह ने कर्नल की तरफ देखा। वह तना खड़ा था और उसका हाथ तलवार की मूठ पर था।

“समझ गया, सब समझ गया।" यह कहकर बादशाह कुछ देर हाथों से आँखें ढाँपकर बैठ गए। कदाचित् उनकी सुन्दर रसभरी आँखों में आँसू भर आए।

रूपा ने पास आकर कहा-"मेरे खुदाबंद, बाँदी..."

"हट जा ऐ नमकहराम रजील, बाजारू औरत।"

बादशाह ने यह कहकर उसे एक लात लगाई, और कहा-"तब चलो। मैं चलता हूँ। खुदा हाफिज।"

पहले बादशाह, पीछे कर्नल उटरम, उसके पीछे रूपा और सबके अन्त में एक-एक करके सिपाही उसी दरार में विलीन हो गए। महल में किसी

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