पृष्ठ:आदर्श हिंदू १.pdf/२४७

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अपने बनाव सिंगार में और कभी कभी मथुरा से घंटों तक घुसपुस घुसपुस बातें करने में बीतता है। उस दिन की बात चीत पूरी सुन लेने पर भी, माता के आते ही इन दोनों की बातें बंद हो जाने पर भी अब किसी तरह से प्रेमदा को पता लग गया है कि यह हरामजादी मथुरा सुखदा का सत्यानाश करके दोनों कुलों की लाज धूल में मिला देना चाहती है। बस प्रेमदा को जितना दुःख पति परमेश्वर के वियोग का नहीं है, जितना कष्ट धन लुट कर दारिद्री हो जाने का नहीं है, उतना सुखदा की ओर से है, क्योंकि संसार का यह नियम ही है कि आदमी गए हुए की अपेक्षा होनहार से अधिक डरता है। इस कारण कहना पड़ता है कि सुखदा केवल अपनी ससुरालवालों के लिये ही दुखदा न निकली बरन अपनी प्यारी माता के लिये भी, उस जननी के लिये भी, जिसने बेटी का मन मैला न करने के लिये अपनी हथेली पर थुकाया था, दुखदा बन गई।

अब प्रेमदा दिन रात इसी चिंता में है कि किसी न किसी तरह सुखदा को उसकी ससुरालवाले लिवा ले जाँय तो मैं इसी घोर विपत्ति के समय भी मेहनत मजदूरी से अपना पेट पाल लूँ और ऐसे अपने घटते दिन पूरे कर लूँ। जब आदमी पर आपदा पर आपदा पड़ती है तब मौत माँगने पर भी कोसो दूर भाग जाती है। इसकी कई बार जहर नाकर मर मिटने की इच्छा होती है किंतु प्रथम तो मरने