पृष्ठ:आदर्श हिंदू १.pdf/२५०

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न आने दूँ तो मेरा अधिकार है।" जिस समय प्रेमदा इस तरह का निश्चय कर चुकी थी होनहार से उसी समय मथुरा दुपट्टे में कुछ मिठाई, एक चिट्ठी और दवा की कोई पुड़िया छिपाए वहाँ आ पहुँची। सुखदा के पास पहुँच कर जिस समय उसकी आवभागत होने लगी प्रेमदा घसमसाती हुई दाल भात में मूसलचंद की तरह उनमें जा घुसी। उसकी उमर ढल जाने पर भी विपत्ति पर विपत्ति पड़ने पर भी उसकी पुरानी हड्डियों में अभी तक ताकत थी। उसके एक ही झटके से मिठाई धरती पर बिखर गई और लपका झपकी में पव और पुड़िया उसके हाथ आ गई। जब वह पढ़ी लिखी नहीं थी तब क्या जान सकती थी कि चिट्ठी में क्या है किंतु पुड़िया खोल कर देखते ही उसके तन मन में आग लग गई। वह कड़क कर बोली―

"क्यों री राँड! हरामजादी! मुझे मारने के लिये यह संखिया लाई है? निकल मेरे घर में से। खबरदार फिर कभी मेरी चौखट पर पैर रक्खा तो तेरे पैर काट डालूँगी। राँड मेरी भोली बेटी को बिगाड़ने आई है।" अपनी जननी के मुख से ऐसे बचन सुनते ही लज्जित होने की जगह सुखदा आग बबूला हो गई। उसने पत्र और पुड़िया मा के हाथ में से छीनते हुए "आवेगी हमारे पास। बीच खेत आवेगी। देखूँ तो इसे रोकनेवाली कौन है?" कह कर खूब ही गालियों की पक्ष पुष्पांजलि से अपनी जन्मदावी जननी का पूजन किया। माता ने क्रोध को आवेश में जब