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पृष्ठ:आदर्श हिंदू २.pdf/१५३

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(१४८)

"ऊधो जो तुम हृदय दृढ़ावत।
सो याँ भयो रहै पहले ही क्यों बकवाद बड़ावत॥
सब ठाँ से तुम कहत खैंचकर मनहि कृष्णा में जोड़ो।
सो यह गड़्यौ श्याम मूरत में निकसत नाहि निगोडो॥
लघु भोजन लघु नींद बताओ सो हम सब ही त्यागी।
प्रीतम आधरामृत की प्यासी नैनल हरि छबि लागी॥
देह गेह की ममता त्यागो सो हम सब ही कीन्हीं।
जब से लग्यो नेह मोहन सों सबै तिलांजुलि दीन्हीं॥
तुम जो कहत त्रिकाल न्हान की तोको सुना विचार।
रातन रहत रैन दिन भीगे बहत नैन जल धार॥
पंच अग्निकर कहत करो तप सो नहिं बुझत बुझाई।
प्रीतम बिरहानल की ज्वाला हम यह देह पँजाई॥
ब्रह्म रंध्र कर प्राण तजन की ये मन कभु न पढ़ैंगे।
पिय दख दशों द्वार तज जियरा हियरा फार कढ़ैंगे॥
अब कछु शेष रह्यो सो कहिए ताहि जपैं निसभोर।
सूरदास जो मिलैं आय के नागर नवलकिशोर॥"

इस पद को गाते गाते दंपती किस तरह भक्ति-रस में मतवाले बनकर देहाभिमान भूल गए, क्योंकर उनका अंत:- करण द्रवीभूत हो गया और कैसे उन्हें आत्मविस्मृति हो गई, सो पाठकों को समझाने की आवश्यकता नहीं। इस उपन्यास की टोन में आरूढ़ होकर जब से उन्होंने अपने नेत्रों के हर- कारे दंपती के पीछे पठाए तब से मथुरा में, प्रयाग में, काशी