पृष्ठ:आदर्श हिंदू २.pdf/२४५

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(२३८)

दोहा -- रावन क्रोध अनल निज, श्वास समीर प्रचंड।
जरत विभीषण राखेउ, दीन्हउ राज अखंड॥
जो संपद शिव रावणाहि, दोन्ह दिये दस माथ।
सो संपदा विभीषणहि, सकुचि दोन्ह रघुनाथ॥

पितामह भीष्म जैसे और भी भक्त अनेक होंगे जिनको अपनी हार दिखलाकर भगवान् ने जिताया है। परंतु याहाँ उससे कान पकड़कर राज्य करा लिया और सो भी उस समय राज्य दे दिया जब लंका का एका काँगूग भी नहीं टूटा था। वानरी सेना समुद्र ने इस पर पड़ी हुई टक्करें खा रही थी। धन्य! आपकी लीला अपार है। भला वे बाधाएँ बड़े बड़े भत्तों की हैं। उनके आगे मैं किस गिनती में! धरती में पड़ना और महलों का स्वप्न! छोटे मुँह बड़ी बात! खैर! महाराज जैसी आपकी इच्छा! मुझे राज्य नहीं चाहिए, स्वर्ग नहीं चाहिए, मोक्ष नहीं चाहिए और संसार का सुख नहीं चाहिए। जब जिस स्थिति में आपको मुझे रखना हो रखिए। केवल आपके चरणारविंदों में अव्यभिचारिणी भक्ति की अपेक्षा है और कृपासागर को अमोघ अमृत के एक बिंदु की।"

बस, इस प्रकार से जब पंडितजी मन ही विचार करते जाते थे "जगदीश महाराज की जय!" का स्वर इनके कानों में पड़ा और नील चक्र के दर्शन करते हुए यह अपने साथियों को लेकर पंडा महाराज के गुमाश्ते के साथ उनके मकान पर, ठहरने की जगह, जा पहुँचे।

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