पृष्ठ:आनन्द मठ.djvu/३८

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दसवां परिच्छेद


भवा०-"मार भगायेंगे?"

महेन्द्र-"तुम क्या अकेले ही थप्पड़ मारकर भगा दोगे?" डाकूने फिर गाया,

तील कोटि सुत जाके गजित दुगुन करन करवाल उठाये कौन कहत तोहि अबला जननी, प्रबल प्रताप चहूं दिसि छाये।

महेन्द्र -"पर मैं तो देखता हूं, कि तुम अकेले ही हो।"

भवा०-"क्यों? अभी तो तुमने दो सौ आदमी देखे हैं?"

महेन्द्र-"क्या वे सभी सन्तान ही हैं?"

भवा०-"हां, सबके सब सन्तान ही हैं।"

महेन्द्र-“और कितने लोग हैं?"

भवा-“ऐसे हजारों हैं। धीरे धीरे और भी हो जायेंगे।"

महेन्द्र-“मान लिया, कि दस बीस हजार आदमी इकट्ठे? ही हो गये, तो क्या होगा? क्या इसीसे मुसलमानोंको मार भगाओगे?"

भवा०—“पलासी में अंग्रेजोंके पास कितनी फौज थी"

महेन्द्र-"अंग्रेजों और बंगालियोंकी क्या तुलना?"

भवा० -“क्यों नहीं? देहके जोरसे क्या होता है? देहमें अधिक जोर होनेसे क्या अधिक गोली चलाई जा सकती है?"

महेन्द्र-"फिर मुसलमानों और अंग्रेजोंमें इतना फर्क क्यों?"

भवा०-“देखो, अंग्रेज प्राण जानेपर भी मैदानसे नहीं भागते और मुसलमान देहमें आंच लगते ही भाग जाते हैं और शरवत पानीकी धुनमें लग जाते हैं। इसके सिवा अंग्रेजोंमें दृढ़ता होती है, वे जिस कामको उठा लेते हैं, उसे पूरा किये बिना नहीं छोड़ते। पर मुसलमान महा आलसी हैं। बिचारे सिपाहीरुपयेके लिये प्राण देते हैं, फिर भी बिचारोंको ठीक ठीक वेतन नहीं मिलता। इसके सिवाय साहस चाहिये। तोपका गोला एक