पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१०६

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राजिव नयन मेरे बालम रहे के ध्यान, । रोम की रहनि में प्रयझ कहा रूझे जू। प्रगटि सुगति जाहि जोजियतु ऐसी सुनि, भोग की भुगंति पायें जोग काहि सूझ जू ॥२११॥ सबद सुवास रस रूप परसन ही को, जाहि को न तोप पूजे ताहि को वियोग है। ' एक मग वंचिकै अनेक मग पंच कीने, पंचसर व्यापत सकल व्रज लोगु है। 'आलम' सुकवि ऐसी सुगुति खावे पापु तन को संजोगु कान्ह जोगिनि को जोगु है। अमित अगाध रस भोगिन को भोग दीनो, " सुन को संयोग पाये जोग ही में भोगु है ॥२१२॥ जुग है कि जाम ताको मरमु न जाने कोऊ. बिरही को घरी और प्रेमी कोजु पलु है। "सेख प्यारे कहियो सँदेसो ऊधो हरि आगे, व्रज : यारिये को घरी घरी घतु जलु है। ' . हाँसी नहीं नैसकु' उकासी देत जोग बन , ' ', विरह वियोग झार और .. दावानलु है। सिर सान सेले पग पेले न परे लौ जाय,

  • ..: गिरि ह ते भारो इहाँ विरह. सबलु है ॥२१३॥

rrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr-rrrrrhm झै हलमा २--उकासी = फुरसत । ३-सिरसों न खेल = म तो सिर पर भूतसा सवार रहता है। --परेलौ-दूर तक।