पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१०७

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1- आलम-लि-T ". जोगु दीजै जोगिन संयोगिन को भोगु दीजै, . ___ राज भोग कान्हजी घड़ाई सय दोजिये। 'आलम' अलख मान मुकुति मुनिंद लेहि, देव कविलास' यस पेमहि पतीजिये। रूप रुकुमिनि रमै साई सत्यभामा के हो, कुपजा के परस परखे - कत छीजिये। बिनती इहाँ की इहै याही वंसीधरजू सों, हमें नेकु बाँसुरी बजाइ मया कीजिये ॥२१४॥ वे तो ऊधो. परम पुनीत पुन्य पाइयत,. भावन प्रशीन प्यारे पावन दरस जू । गाँव की अहीरी हम गोरंस की चास भरी, खरीये गँवारि गुन, रूप, ही ना रस जू। कहे कुबि 'बालम' विराजित चै राजा कान्ह, राजनि के राजा गुना पूरन. दरस जू। बिसरखो बलेरो धन बीथी अरु नजयासो, , अति मन, भाई पाई कुविजाः सरस जू ॥२.१५, सीत रितु भीत भई छाती राती ताती. तई, ... - ऐसे ताप, तिय ‘तन तये । हैं न तवंगे। 'पालमा अनिल, इतराय, कैकलिन मिलि, . . । ": दीन्हो है :फलेस सुधि पाये दूनो दवंगे।' r immr१३:२७, १७ दिसम्बर २०१९ (UTC)~ १--कविलास = स्वर्ग लोक । २- पतीनिये = विश्वास कीजिये ।।