पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/११

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it 1 सर्वया . . जा थल कीन्हें विहार अनेकन ताथल काँकरी बैठि चुन्यो करें जा रसना सो करी बहु यात सता रसना सौ चरित्र गुन्यो करें 'बालम' जौन से कुंजन में करी केलि तहाँ अब सीस धुन्यो करें नैनन में जो सदा रहते तिनकी अय कॉन' कहानी सुन्यो कर. ____ हमारे मित्र पुत्तलाल जी सारंगी भी बजाते थे। बरसात के दिनों में कभी कभी यह कवित्तं सारंगो पर गाया करते थे:--1 . . . ', ' .. . . . . फैधौं मोर सोर तजि गयेरी अनंत भाजि . कैधौं उत दादुरं न बोलत है, एई। "कैघों पिक चातक महीप का मारि डारे;" - कैचों बकपाँति उत अन्तर्गत "है गई। " 'आलम' कहै हो प्राली अजहूँ न पाये प्यारे, । कैधौं उत रोति विपरीत, बिधि ने ठई।.. मदन महीप की दोहाई किरिये ते रही, जूझि गये मेघ कैघों दामिनी सती भई । सेख ' का यह निम्नलिखित कषितं यहुत ही मस्त हो कर गाया करते थे:--- ... ... .... . रात के उनींदे अासाते मदमाते राते.; - "अति कजरारे दृगःतेरे या सोहात हैं। ".सीखी तीखी कोरनि करोरे लेतः काढ़े जीउ, - - - - - - • केते भये घायल. औ केते तलफात है। ज्यों ज्यों लै सलिल चख सेख' धौ धारधार : .... त्यो त्यो बल बुंदन के बार मुकिजात है। __, फैयर . के - भाले , फैधौं । नाहर नहनवाले, लोहू के पियासे कहूँ पानी ते अघात है। .