पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१४५

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१२४ बालग केलिT [ ३०१ ] कोक कला खनी रति नागर केलि ठटे संबो रैन सिराई प्रात "समै सिंथलत्तन मुन्दरि अंगरही पसि आलसताई जागि चली कर अाली के कंध दै है कवि 'लिम ऊपम पाई चंदनं खंभ के अंकम मानहु डोली चम्पक माल सोहाई [ ३०२ ] अति मुहित है प्रमदा मन में मधुसूदन को मधु मोद लये कवि 'पालमा लालस श्रीलसुडारि चली सुप्रती तजि योद लये कर पल्लव दीप दुराये भई दुति पानि में रैनि बिनोद लये . कर्षिता परने छषि ताहि मनो सयिता सुत पारिज गोद लये [ ३०३ 1 नवला'म लोचन रोचन के पल मोचन पूरि रही जल सों कवि श्रालमै केलि कला हरिजू रिझई न फैछु खिझई पल सों तिहिंको भाज्या रवि अंग को अँगयोन पनलिनी दले सी कले कोमल पाल कलेवर यो अति काईलहोत कुलादल.सी . [ ३०४ ] कंचुकी नील लसै कुसुंभी मुकता लरे कंठ में कुंतल छोरे नैन बिसाल मंगलं कोसी गति याल रसाल चहिम थोरे नेकुचितै हरियों५ कपि'मालम' चंचले चाल चली चित चोरे जोयन रूप जगामंग सो'को या मंग नारि गई तन गोरे १-कै अंकम= अंकपार में लेकर । २-मह=भार । ३-भैगयो न पोसँभाला नही माता । ४-वहिकम थोरे -धोदी उम्रको (नवला)। ५-रयों-तरफा NARA