पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१४७

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आलम-केलि
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१२३ आलम लि-1 . ..यशोदा की उक्ति ।। . . , . :: .....! :-~~icer : ..... . [ ३० आटि धस्यो है दुराय दुहाई के प्यारे लला रचि सापय पीजे लोटत हार्य के भूपेन छूटतं रोयत हो यलित बल धोर्ज 'पालमध दही को मिठाई को मेषां को नाहि कगे कहा की कान्हर प्रार निवारियलाइ ल्यो आपनी माइविझाई न लाज [ ३० ] । अपने गृह माखन खाइयो जानो लाल नहीं कहूँ पर नेरे। घरज जननी कायि श्रांजम' यो बिलमी ४ कहूँन अयर संयरे ही पिवदेन सुनौ सुत स्थामन कस के सैन सबै मरि तेरे धाम रही निकसी न हूँ तुम रॉक'को सो धन कान्हर मेरे योर घड़े मुरली लघु बोरन माँगन है तुम देउ यता हो ही तो न देही न देन है माहि तू है मेरी प्रानंद चंदकला ही 'पालम' जान चले तित डोलत पोलतले जननी सुख लाहो जान दे सी कहा ले करैगो तू घार लै माखन पार लला दो -प्राइट । ३-ज्ञा = बलदेव नी।। .. -