पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१४८

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थैlitin S11 SLEE: + ३.१ ] नन्द लेई मुरली कर के नये ले कर कान्ह लखै परछाही 'पालम' ले अधरी परसे दिन ही छिन चाउमो माखन खाही गांकुल कान्ह थजार न जानन त्यो जननी पह पूछन जाही मैया रोज्यों बन की वंसुरी ऐसी मेरीयो वाँसुरी घाजतु नाही [३१. . दौरत गीर यहोरनं छाँह त घाम न योरि ययाग्नि साधे डोलत हैं जिनहीं नित बाल मगोधत फैलि रह्यो धन आधे कानरि. के हित सो फेरि पालमा प्रायत लै पछरू धरि काँधे हात छरीपनंहीं पग पति की सोस खुद करि कॉमरि काँधे ३१३ ] फालि के कान्ह कलिन्दी के कूल लये सँग बच्छ से बन में छतिया ग्रंकुलानि बिहातिनि गनि विद्धित तापतई तन में • कयि 'पालमा जीवन ओर भये पल लोचन सोचं घढ्यो मन में ताते असोधन है 'चली सोधन सोधन है गयो गोधन में साल पुंज के मध्य लाला दरसे परस रज'अंग रुचे निरखे कवि श्रीलम' पंगु भयो मनु रूप अपारहिं क्यों व रुचे नन नाहर यंक हिये हरि के. जटितम्मान में उपमादि मुचे विनये परिवा'दुतियागम सो मनों द्वेजे कला दिननाथ मुचे -..-rrr.mmmmm...me.amrounm.ma.mammar -गोपन = गायों स . । २-करमा फजरी गाय।