पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१५५

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१३१' बालम-फलिहा " [ ३३६ ] पोहये जो तुम कुंज के रंध्रनि कालि पिलोको गोपाल के धोरें याजु अयानि है 'पाई है देखि मनो उन यातनि के तिन तोर चितये कच मैं विपरीति समै अलि सायफ से मधुमिस्र में डोरें गुलाल की लालकलो कलको मनो खेत कि लालको लाल भोर गोकुल ते गुपुलेसहि लै गयन्यो सुफलासुन है अधिकारी कयि पालम गोपगऊ गोपिका गन घोप भये सब दीन दुखारी नन्द पठै फिरि जो नँद-नंदहि दंद-उदेग उठ्यो जिय भारी डारि सरस्सु मारि मनै जैसे हारि चल कर झारि जुआरी [ ३३८ ] ए रे अहीर अजी कहि धौ हों तो जाऊँ तहाँ हैं जहाँ गिरिधागे कैसे फिस्यो मुख वारुख सौ सय गोकुल की मुख की निधिडारी हेरि कहै जसुदा पति सों कवि 'बालम' व्याकुल है जिय हारी शानंद चन्द गोविन्द बिना अय नन्द भई मति मन्द तुम्हारी [ ३३६ ] दोसत हैं दिसि और दसो जिय त्रास ससंक प्रकास दिसाकी . कार्यपालमाभंग लगैगज्यों श्रेयलायसिसंग बिसाल विसाकी . हिरदै अति ताप भई सुत के मुख सूखन है तिजि मानि तिसाकी नेमुबहन सौ कहि हो सखि धी निसि है कम जोन्हि निसाकी