पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१५८

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[ ३१७ ] रुप सुधा मकरन्द पिये ते तऊ अलि फंट पियोग अरे है 'सेख' फहै हरि सो कहियो अलि ध्यान प्रतच्छ समान करे हैं ____ जो मन भूरति के निरखे हम देखत हो गिरि गात गरे हैं . जोति प्रसंग पतंग जरे इक झाँई के झूमत तेल तरे हैं [ ३४% ] पंगु कियो पिलवान को पौरुपुले चल्यो कुंजर कोटिक पेलि ज्यों 'पालमादती,कदंत हिलायकै हाथ लिये कियो खेल सोखेलिज्यों कान्ह वली तनथोन की छंच लसैं अति जग्योपवीत सोमेलिज्यों नील नगप्पर इंदुबधू घनसार गिरिप्पर बिगुम वेलि ज्यों [ ३४ ] कर पोथो लै पंथी के पंथ चले छिन ठाढ़े है पूछति है.कह दो 'गुन वैदके चेदन चाँह ग़हो विरहा बर को गुन कौन यतैहो • जोतखी हो तो चलो घर भोतर घोपि, घस्यो सुधरी दिन हो . 'मालमा आजु धनोधन हे धन के उनये तु घनो दुख पैहो [ ३५०. ] धरि रूप सुधा को पियूप मिले बिनु जीभ के स्वाद कहा चिये फयि 'श्रालमा घास को बास नहीं मन भृग नुवाद भले सचिये जस्ल में जल के गुन जाने नहीं भये श्रन्धर अच्छर क्यों चिये. मुफुतै न फाडू जुगुतै- जयलो.ऽय सुतौ भगर्ते भगत चिये , बलीपलदेजी।