पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१६२

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१४१ युगल मूर्ति [ ३६१ ] रजनो. चितई रति सी सजनी थिरके गये तजि चंचलमा कपि 'पालमा आलस ही जलप किसक कुच खोन भई कलता. किये वक्रित थाम हरी कंचुकी गई उच्चकियो छवि अंग लेता सकुच्यो सियार समोर लगे प्रगटी सरको मनो उज्जलता रजनी मधि राधिका गौन कियो निरखी अँखियाँ पति प्रेम भरी फयि 'आलम रंभन को ललचो रति लालच लै हिय लाई हरी खरेखीन हरे पर फो गिया दरकी प्रगटी कुच कोर सिरो' अरुझे जंग लाल सिघालनि मैन के चक्र की चंचुमनो निसरी Recian युगल मूर्ति .. [ ३६३ ] ग्रज भूपन भावति राधिके जू गुन् खप के साँचे सुशंग गढ़ी कवि 'बालम' अंग सुगंध सदा पर विरचै करि कोक पढ़ी कवनो भुज स्याम के कंध धरे रचनो मनो प्रीति को रीति बड़ी छविता तन स्याम की सुन्दरतामाना चालता नग नोज चढ़ी -सिरी% (श्री) शोमा । २-चक्र चक्रवाक ।