पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१६६

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अभिसार रेनि सरह सुधा विचयो उठि गानो छवि टारी [ ३७४ रेनि सरह सुधानिधि पर चढ्यो जग कालिम छाँह अडारी सैनि सहेट यदी निसि मैं विचस्यो उठि गौन कियो अभिसारी भूपन के मुकुता सति अंग सुकेस पुहुप्पनि सौ छवि टारी दुरावति छाँह मनो मुसुकाइ सुजाइ मिली मनमोहन प्यारी [ ३७५ ] माधव जू मधुमास मधुचन राधिका सो करि कोलि मुचे ते तहाँ रस के घसि आरस में मु गये तजि संगम सैन मुचे ते उरते उड़ि गो पट न्यारो उरोज सुबालम' हार के बीच रुचे ते मनोगिरि संधि के सिंगदुविच्च के वासनि श्रासन मध्य उचे ते [ ३७६ ] प्रोधि की टेक प्रबोधन को पिय सोधनकुंज गई सजनी फयि 'आलम पाल विलंवि भये कलपै मिलि सेज सँताप धनी - पगि पोटि प्रसून उठी छवि सों छतियाँ लगि कुंकुम स्वेद कनी विरहा हनी फोंक फवी उत है प्रगटी इत है मानो यान अनी [ ३७७ ] औधि टरी न हरी निरखे मुडरी तिय कुंजगली भए भारी कवि बालम' श्रासउदास लयेत्योत्यो स्वाँस भरैअस्त्रियाँभरिदारी हिये चौकी जराउ को भानन हे मधिछूट चली धवली जलधारी "सीय सुमेर की अंकम फाज मनो रवि को विधु चाँह पसारी