पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१६८

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आगतपतिका [३१] डरिये इन्ह.सों जितनो हरि ये निसि में पटमोटनि खोलति है इत ईतर है इतराई चले फिरि छाँह चितै तन तोलति है कवि 'आलम' और तो मोगिरह परी यातो इते पर बोलति है रहि री मचलानु कहा कहिये माई आपने जी पर डोलति है [ ३२ ] लाज तजी जिहि.काजु सस्त्री इन लोगन में वसि आपु हँसाऊँ 'पालमा आतुरता अति ही तिहि लालचु हो तुम्हरे सँग पाऊँ कान्ह मिले तो मया, करि चाहत हों न कछू जिय ह की सुनाऊँ देखन को अखियान महा सुख जो असुवानि सो देखन पाऊँ । ३३ ) गोरस फेरि दुनासन के मिसि जाँपन ह हित जोवन जैये रूखे कै रोप नोराहनो ह-यहि लालच बोसक यान बनये सौरहु काज गये, कवि- 'बालम' 4 मोहि नंद गली होह थे फोनहु भाँति कछू छिन कान्हरु जो अखियाँ भरि देखन पैये [३४] जात चले कछु दोपु लगै तेउ बावरि रोस करै व्रज में यसि 'पालम' नैननि रीति यहै कुतकानि तजी पुतोरी मुँह में मसि जंद्यपि चूंघट ओट कियो हम कान्ह फहूँ चितयोफिरि के हँसि विकिनि छुटि गई तरको तनी लाज के संग चल्यो अँचरा वसि