पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१७०

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८ श्रागतपतिका [ ३-8.] - जोबन के फल घन फूलनि मिलनि चली. बीच मिले कान्ह सुधि बुधि बिसराई है। याँसुरी सुनत भई बाँसुरियो घाँसुरी सु, बाँसुरी की काहि ' सेख' आँसुनि अघाई है। । थकि थहराइ बहराइ वैठियो न कहूँ, . ' ठहराइ जीय ऐसी पुनि ठहराई है। । बारुनी बिरह पाक चाक बकवास लगी, गई हुती छाक दैन आपु छकि भार है। [ ३६० ] जहाँ ते निवारी जाइ नहाँ उठि परै धाइ, . हियो अति अफुलाइ लाज न करत हैं। देख्यौ चाहे बार बार मुरि नन्द के कुमार, अति ही वंसी बिहार प्राननि हरत हैं। देखे ते ह्र मुरझात बिनु देखें बिललात, दुख देत दुहूँ भाँति व्याकुल करत हैं। मारि मारि मीजि के मरूरन मरोरि डारी, . मेरे नैना मेरी माई मोही सो अरत है। [ ३६१ ] फुलि फुलवारी रही उपमा न जाइ कही, - कहा धौं सराहोताते जोति अधिकानी है। 'पालम' कहै हो धरी मोतिन की पाँति सरी, - हीरनि को काँति छयि देखि कै लजानी है।