पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१७१

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१५०. .

  • श्रालम-कलि

दारिम दरकि गये पाके संमुहें न भये, . रवि की चमक किती चार मैं बखानो है। तनक हँसनि मैं दसन ऐसे देखियत, दीपत नछत्र मानो दामिनी दुरानी है ॥ - काम फलेसहि भेष फिरो सब कामहिं नेकु परै फल कैसे। 'आलम ए अलि नैन अली मुख बारिज यामु' रहे नहिं तैसे। सीना के सोक में तापन राम विलापन याप तयो तनु तैस । छोन मलीन अधीन दुखी दिन रैनि गये रजनी पति जैसे। M. ३६३ ] केस कुरहर२ अध जरे मानो फैला धरे, . कैनहाई कोयल करेजो जे खाति है । । फूली बन .घेली पै न फूली ही इकेली तन, - जैसी तलवेली औ सहेली ने सुहाति है। चहुँघा चकित चंचरीकनि की चारु चौप. . देख 'सेखा रातो कोप छाती खोप जाति है। होन आयो अंत तंत मंत पै न पायो फछू,. कंत सो यसाति ना यसंन लो बसाति है ॥ [ ३६४ ] रेनिगढ़ गूढ़ रही 'श्रालंम' अकास मिलि, चन्दुः गढ़पति जान अटल अादि है। दौरि दिनु लाग्यो नारि मेरु भरि सूर पागे, . .

गोला छूटि ,लाग्यो ताते पुछपौरि फुटि है।

१-वाम बिना, घगैर । २-काहर=चितकवर ( श्राधे काले भार्य लाल ।) ३ सो जाति है-घुस जाती है ।