पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१७२

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१५१ . दिसि की उजारी जानी जोन्ह भौति भहरानी, हलमले द्विजराज जाम सौम छूट है। आपु चल्यो प्रकुलाइ छपति नछय पार्छ, दल भाजे जात प्रात पनहरी लुटि है। [.३६५ ] बरुनी कटीली भी है कुटिल कटारी सी हैं, ___ काम को विचित्र ऐसी काके पर डारिहै । अलक तिलक नैन अनग अनंग टीको, अनियारे औ उतंग उर पर दारिहै। 'आलम' कहे हो कहूँ कान्ह जू कितै है प्राइ, सोचति तब न. व रोझ न सँभारिहै । जोवन की माती ग्वारि अंचर सुधारि देह, देव को सँवारी काहू मानसहि मारिहै ।। शान्तरस . ( ३६६ ) अलि पतंग मृग मीन दीन छथि छीन नलिन पुनि । 'गज बाजी कुन्दनहिं हंस सारस कदली गुनि । कोकिल कीर कपोत कुन्द जो पटतर भापहिं । । . हो क्या यहि विधि कहीं बुद्धि अनचाहत नापहि । • वृषभान सुता सम कहन कहूँ, 'पालम मिभुवन में शुकछु, यह मन वन फ्रम कै जानियहु कहि कहियो सो सय तुछ ।