पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/२४

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दावन प्रौदा वर्णन सौरभ संफेलि मेलि फेलि ही की वैलि फोनहीं, __ सोभा की सहेली मु अकेली करतार की । जित दरक हो कान्ह तितही ठरकि जाय, ___ साँचे 'ही सुढारी सब अंगनि मुढार, की । तपनि हरति फयि पालम परस सोगे, यति ही रसिक रीति जाने रस-चार की। सति हूँ को रसु सानि सोने को सरूप लै के, अति ही सरस सो सँवारी घनसार, की ॥१६॥ पातरी अँगेठी थाँगी भंग ह सो लागी रहे। झलकतु अंग झोनी झलक दुकूल की । 'मालम' सुधारे. फच फारे सटकारे भारे, .. • डारे पाछे पाछे प्यारी स्याम सुखमुल की। काम के संजोग घाम दच्छ फटाछन फीने, आछो छवि सैनिक सँचारी युद्ध मूल की। का हूँ के फोर नैन मोरनि ली प्राय चले, कब हूँ फै धावै हुति भाभा झुतिफूल की ॥२०॥ गोरे आंक थोरे लांक थोरी पैस भोरी मति, घरी घरी और छवि अङ्ग अङ्गमैं जमे । . threemminerwwwwww.wamirrormerimmineminine १-मसार:फपुर। २-धंगेठी (अंग+ इट) अंग के लिये जितनी - चाहिये, ठीक वमान को, पुस्त। ३-म्रतिफल -(असिफूल) कर्णफल ।