पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/३६

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मानिनी साधे राज हंस ते तौहीसनि हसाइगयो, ' ।ये रीतेरी गति देखि, फिरो गुन किरी' को। लांक की. लचक लसे लहँगा की दिगदुरै, ।। "चूरी, ही में चाहि चूर भयो वाही घरी फो। "बालम अजहु आदि रस यस पखो जो लो, जग्यो नहीं जोग:चा यियोग-विस-परी को। रुप गुन' आगरी तू नागरी ते आगे है के, ते तु डग भरी डगमग्यो मन हरी को ।।४।। जोगी कैसे फेरनि यियोगी श्रावै यार यार, जोगी है है तो लगि वियोगी बिललातु है। जा छिन ते निरखि किसोरीहरि लियो हेरि , .. ता,: छिन ते खरोई, धरोई पियरातु: है । 'सेरा प्यारे ;अति. ही बिहाल होइ हाय हाय, " पल पल अंग की मरोंरे मुरछातु है । श्रान चाल होति तिहि न प्यारी.चलि चाहि .: बिरही जरनि ते पिरह जखो जातु है ॥४६॥ ' __ नीर', सों; रचैन :रसकन को, दुरै न ऐसे, पेम परतछ ज्यो पुरैन को सो पातु है । , नेक डीठि जोरतही चोरी भई चातुरी की, गोरी गुन श्रागरी, गरतु:याही गात है । -करी (करि) हाथी । २-गि गोट; संजाफा-दुरै 'थासत दोगया। प्रांगे हवै के बढ़ कर । ५-चाल दशा।६-बाहि देख ले। NAMAMA