पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/४२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


२१: नायककाता। आज ही मैं देखी कवि बालम अकेलीलाचाल, 1 चाँद सो. अर्धगो-अवै अाही ते उतरी। चितवन हूँ सो प्यारी हितावित यसिः करिः न I:चित में समाय. रही, चित्रा की.सी.पूतरी ॥१२॥ 15 h r : ... मुदिता सरोजे' समसभगोउरोज उर, चातुरी.. के चोज मैं मनोज-वेलि योगई ।। कमल से हाथ:.रम जंघा गौन हाथी को सो, हाथ ही हाथन सब स्यान मूसि ले गई। अलवेली लिममदन महा: मोहनी.,सी, मोतन: लगाइ पीरमहा मोहःदै गई। सिसुता की सानी यसरूप.की जुन्दाई जैसे, आधे ही निहार नैना श्राधे आध' के 'गई ॥६॥ तपहुँ.पठाई होमनाई जाय; आई हुती, उनहीं कह्यो जनाय जानी ऐसो. स्यान है। .'. अय हो जौ जाउँ.लीनो.नाउं दोनो:चाउ नहीं, उतर न पायो फिरि आई ऐसे मान है। 'आलमा सुकवि कांह कान:लागि कीनी ऐसी, माउ यलि ऐहै मतो। यह मेरे जान है। अनमने होहन अयोलेर कछु'याते काद..' पान भाँति कही मोहि रावरे को शान || १-प्राधेाध कै गई = दो टुकड़े कर गई। भार