पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/४४

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६१२६ नायकी देसी 'पालम' सुआली वनमाली देखि चलि दुति, सुगः कनक कीसी रूपः,गुन, गाढ़ी है । देह की खनक वाफेचीर में चमक छाई, ' छोरनिधि मथि किधी 'चांदाचीहि काढ़ी है ॥६॥ TIME ऐसें कैसे कहीं ऐसीऔरनीकी नारि ना, नीके के निहारे अति नीकी करि जानिही । 'आलमोसुकवि हम कहा पहिचान नांथीमा 1. परंख तुम्हें. होसय पातनिाफ़ी खानि हो। जामिनी में :जात संवा कुंजे में उज्यारी होति दामिनी :कहोगे: कहे ?फामिनीन मानिही । . सनमुखहए , सौहे : डीठि, ठहराति नहीं दीडि परे पीठिा दएं आंखिन मैं मानिही ।।६।। ..अंग अंग जगै.जोति, जोद सो उज्यारो होति, " . उजरी उज्यारी प्यारी मानो चंद जैसी है। आलम': कहै. होमन -मन - लौ पढ़ेये यात, रूप, को, निकाई. ताकी तहां लगि तैसी है। और की पठाई हो सोधावति हो राघरे पै,... वा दिन की कुंज. कोऊ,ौरी नारि ऐसी हैं। वही भूली औरों भूलो सथ सुधि बुधि वाहि, . हो तो देसि रोझी तुम देख्यो कान्ह कैसी है ॥६॥ मामःफेलि येलि सो भोली कुंज. धाम-परी, यदन को आमा :जनु फूलतु फमल है।