पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/४६

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कहै कवि आलम' किसोरी चैस गोरी जगी, ।' जग की। उज्यारी प्यारी प्यारे, नंद-नन्द की। सभर नितंब जंघ रम्भा के से सम्भ चलि,

मन्द मन्द आवै गति मद के गयन्द की ।।७१।

• आठो. अंग निपट संठानि यानि 'ठानि ठई .. ...' गांठि से कठोर कुच जीवन की उठी है। गुन की गंभीर अति मारियां जघन जुग', । थोरे ही दिनन गोरी रूप रंग जेठी है। कहै कवि 'मालम:' दिखाई दुरिजाइ बारिता 1 घरी घरी मारि मारि मनहि अमेठी है। सखो सो फहत घात जगमग मुसकाति, s, ", कील के.से पात न पातरी अँगेठो है ॥२॥ सीसफल सीस घखो माल टोका लाल जयो, ' ' , ', कछु सुक्र मंगल में भेदु न विचारिही। येसरि को चूनी जोति खुटिला. की दूनी दुति, .', योरनि के नगन तरैयाँ ताकि वारिहौ। . .१-मुभर - पूर्व ' भरे हुए, पीन। २-धाडौ : अंग। यथाः- .: टो-पहिले जोरन, रूप, गुण, सील, प्रेम पहिचान । . कुल, पैमा, भूषण, बहुरि भाग अंग बखान ॥--, ३-टेटो-गंठ। ४-अंगेठी:(अंग+इट) अत्यंत सुन्दर । ५-~वीर : कर्णभूषण (हारें)।