पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/४७

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ays पालम केलिन 'सेख' कहै स्याम विधु न्यों को सो देखि मुख, + बुद्धिः विसरैगो थेगि सुधिन, सँभारिहौ। नभ केसे नखत दुरेंगे, नहीं न्यारे न्यारे, ..दीपक दुराय तवं. दीपति: निहारिही ॥ ७३ ।। देह में चन-सी है। लांक ह तनके सी है, -नूपुर झनक :सीह महा . धि बढ़ी है। चाल गति मन्द सो है लागै सुख कन्द सी है, 1 निरखे,ते;चन्दा सी है! कोककला पढ़ी है। 'पालमा के प्रभुघाके पटतर:- दीजै कौन तेरे: चित वली व घाके; सम गढ़ी है। आँगन में--पगु भरै सखी कंध बाँह धरै,

कंचन के खंभ, मानो चंप-लता चढ़ी है ।। ७४॥

चंद की-मरीचि भरि-साँचे दारी सीचि रस;:.' . कंचन जड़ित, जनु रतन की पाँति है। भूपण को-श्राभा, अंग सोभा, केशुभाइ मिलिम ..चाहे चेकचौधे चितुरधि को सी.काँति है । _ 'आलम' मुकवि ने छाँह के छुये ते कान्ह, . काम के संताप है की हाति सीरी साँति है। । घोलति 'चलति चितयेति ।मुसकातिः अति . । रूप की निकाई छवि औरै भोरै भाँति है ॥५॥ १-चनकै सुन्दर बनावट । २-जोर कटि । ३-मन्द = शान । (शनि की तरह बहुत मद ,गति से चलती है)। ४-पटतर-उपमा। ५-चाहेदेखने से । । - - -AAN